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    सूरए अनआम, आयतें 29-32, (कार्यक्रम 200)

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    आइये सूरए अनआम की 29वीं और 30वीं आयत की तिलावत सुनते हैंوَقَالُوا إِنْ هِيَ إِلَّا حَيَاتُنَا الدُّنْيَا وَمَا نَحْنُ بِمَبْعُوثِينَ (29) وَلَوْ تَرَى إِذْ وُقِفُوا عَلَى رَبِّهِمْ قَالَ أَلَيْسَ هَذَا بِالْحَقِّ قَالُوا بَلَى وَرَبِّنَا قَالَ فَذُوقُوا الْعَذَابَ بِمَا كُنْتُمْ تَكْفُرُونَ (30)और अनेकेश्वरवादियों ने कहाः हमारे लिए इस सांसारिक जीवन के अतिरिक्त कोई जीवन नहीं है और (मरने के पश्चात) हम उठाए जाने वाले नहीं हैं। (6:29) और यदि आप उस समय देखते जब उन्हें उनके पालनहार के समक्ष खड़ा किया जाएगा। ईश्वर कहेगा क्या यह (पुनः जीवित करके उठाया जाना) सत्य नहीं है? वे कहेंगेः क्यों नहीं, हमारे पालनहार की सौगंध (ये सब सत्य है) तो ईश्वर कहेगा। तो अब अपने कुफ़्र के दंड का मज़ा चखो। (6:30)पिछली आयतों में, पैग़म्बरों और आस्मानी किताबों के बारे में अनेकेश्वरवादियों की आस्थाओं के वर्णन के पश्चात, इन आयतों में ईश्वर, प्रलय के बारे में उनकी ग़लत आस्था की ओर संकेत करते हुए कहता है। वे अपने जीवन को केवल एक सांसारिक जीवन तक ही सीमित मानते हैं जिसका अंत मृत्यु से होता है। वे प्रलय के इन्कार का कोई तर्क पेश किए बिना कहते हैं। इस जीवन के अतिरिक्त कोई जीवन नहीं है।अगली आयत पैग़म्बर को संबोधित करते हुए कहती है। यही लोग जब प्रलय में ईश्वरीय न्यायालय के कटघरे में खड़े होंगे तो इतने व्याकुल और हतप्रभ होंगे कि सौगंध खाकर कहेंगे, प्रलय सत्य है परंतु अब कोई लाभ नहीं होगा क्योंकि ये स्वीकारोक्ति भय और व्याकुलता के कारण और वो भी प्रलय के दौरान होगी जिसकी कोई मान्यता नहीं है अतः उनकी यह स्वीकारोक्ति ईश्वरीय दंड को नहीं रोक सकेगी।इन आयतों से हमने सीखा कि विद्वान होने का दावा करने के बावजूद काफ़िर और अनेकेश्वरवादी, बाह्य स्वरूप देखने वाले तथा भौतिकवादी होते हैं और सोचते हैं कि आध्यात्मिक बातों और प्रलय का इन्कार करने से ये बातें समाप्त हो जाएंगी।प्रलय में सबसे बड़ा न्यायाधीश ईश्वर होगा।आइये अब सूरए अनआम की 31वीं आयत की तिलावत सुनते हैंقَدْ خَسِرَ الَّذِينَ كَذَّبُوا بِلِقَاءِ اللَّهِ حَتَّى إِذَا جَاءَتْهُمُ السَّاعَةُ بَغْتَةً قَالُوا يَا حَسْرَتَنَا عَلَى مَا فَرَّطْنَا فِيهَا وَهُمْ يَحْمِلُونَ أَوْزَارَهُمْ عَلَى ظُهُورِهِمْ أَلَا سَاءَ مَا يَزِرُونَ (31)निश्चित ही वे लोग घाटे में रहे जिन्होंने (प्रलय में) ईश्वर से मिलने को झुठलाया परंतु जब सहसा ही (प्रलय की) घड़ी आ जाएगी तो वे, ऐसी स्थिति में कि अपने पापों का भारी बोझ उठाए हुए होंगे, कहेंगेः खेद कि हमने प्रलय के बारे में बड़ी कमी और कोताही की। जान लो कि वे बहुत बुरा बोझ उठाए होंगे। (6:31)प्रलय के दिन, धन, संपत्ति, पद और परिजनों, सबसे मनुष्य का रिश्ता टूट जाएगा और वह प्रलय तथा ईश्वरीय दंड के दृश्य देखकर, ईश्वर के एकमात्र प्रभुत्व को समझ लेगा, इस प्रकार से कि वह पूरे अस्तित्व से ईश्वर की शक्ति को ऐसे जान लेगा, मानो उसने ईश्वर से भेंट की हो।यह आयत कहती है कि प्रलय के इन्कार से ईश्वर का कोई घाटा नहीं है बल्कि इससे स्वयं झुठलाने वाले का घाटा होता है क्योंकि पहले तो यह कि वह उन बातों के विचार में नहीं रहता जो प्रलय में लाभ पहुंचाएंगी और दूसरे यह कि पाप करके उसने अपने लिए एक ऐसा बोझ तैयार कर लिया है जिसके कारण उसकी कमर झुकी जा रही है।इस आयत से हमने सीखा कि जो मृत्यु को जीवन का अंत समझता है उसने वस्तुतः इस नश्वर संसार से अपने जीवन का सौदा कर लिया है और यह बहुत बड़ा घाटा है।प्रलय, खेद और पछतावे का दिन होगा परंतु उस दिन पछतावे का कोई परिणाम नहीं निकेलेगा।आइये सूरए अनआम की 32वीं आयत की तिलावत सुनते हैंوَمَا الْحَيَاةُ الدُّنْيَا إِلَّا لَعِبٌ وَلَهْوٌ وَلَلدَّارُ الْآَخِرَةُ خَيْرٌ لِلَّذِينَ يَتَّقُونَ أَفَلَا تَعْقِلُونَ (32)संसार का जीवन खेल तमाशे के अतिरिक्त कुछ नहीं और परलोक, ईश्वर से डरने वालों के लिए सबसे अच्छा ठिकाना है। क्या तुम चिंतन नहीं करते? (6:32)पिछली कुछ आयतों में हमने पढ़ा कि संसारप्रेमी अपने जीवन को केवल इसी संसार तक सीमित समझते हैं और परलोक के जीवन का इन्कार करते हैं। यह आयत उनकी इसी ग़लत आस्था के उत्तर में कहती हैः वे संसार और सांसारिक लक्ष्यों के लिए जीते हैं। बड़े होने के बाद वे ऐसे बच्चों की भांति हैं जो धन दौलत, पद और घर-बार के बारे में ही सोचते हैं। वे नाटक में काम करने वाले ऐसे कलाकारों की भांति हैं जिनमें से एक राजा की भूमिका निभाता है और दूसरा रंक की परंतु थोड़े ही समय के पश्चात सभी वस्त्र और भूमिकाएं समाप्त हो जाती हैं और सब जानते हैं कि राजा या रंक का शीर्षक एक विचार से अधिक कुछ नहीं था। बिना परलोक के संसार भी, खेल तमाशों के अतिरिक्त कुछ नहीं।यहां इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि यह आयत और क़ुरआने मजीद की ऐसी ही अन्य आयतें, संसार को पूर्णतः नहीं नकारतीं और उसकी हर दृष्टि से आलोचना नहीं करतीं क्योंकि यदि ऐसा होता तो ईश्वर संसार की रचना ही न करता। इस प्रकार की आयतें, परलोक के बिना संसार को एक तुच्छ और खेल तमाशे की बात, बताती हैं। परंतु यदि संसार परलोक की भूमिका और खेती हो तो न केवल यह कि बुरा नहीं है बल्कि ऐसी व्यापक और विभिन्न प्रकार की फ़स्लों वाली खेती है जिसमें सभी भले और पवित्र लोग अपने अच्छे कर्मों के बीज बो कर, अपने परलोक को सुनिश्चित बनाते हैं।खेद के साथ कहना पड़ता है कि जीवन को केवल इस संसार तक ही सीमित समझने के दृष्टिकोण के मुक़ाबले में कुछ लोग संसार से बिल्कुल ही कट जाते हैं तथा लोगों को संसार से मुंह मोड़ लेने का निमंत्रण देते हैं, यहां तक कि वे विवाह जैसे वैध कार्य को भी स्वयं के लिए वर्जित कर लेते हैं। उन्हें इस बात का ज्ञान नहीं होता कि सांसारिक अनुकंपाओं और विभूतियों को ईश्वर ने मनुष्य द्वारा लाभ उठाने के लिए बनाया है और उनकी अनदेखी एक प्रकार की अकृतज्ञता है।इस आयत से हमने सीखा कि संसार की गतिविधियां हमें, परलोक से वंचित न कर दें वरना वृद्घ अवस्था में भी हम बच्चे ही हैं।संसार प्रेमियों के मुक़ाबले में धर्म, ईमान वालों को सोच विचार का निमंत्रण देता है ताकि वे संसार के धोखे में न आएं और अपने अंत की ओर से निश्चेत न हो जाएं।ईश्वर का भय और सोचविचार एक दूसरे के पूरक हैं। बुद्धि सदैव मनुष्य को पवित्रता और अच्छे कर्मों का निमंत्रण देती है तथा सोच विचार व चिंतन, मनुष्य के विचारों को बुराइयों और पथभ्रष्टता से रोकता है।