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    सूरए अनआम, आयतें 33-36, (कार्यक्रम 201)

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    आइये सूरए अनआम की 33वीं और 34वीं आयतों की तिलावत सुनते हैंقَدْ نَعْلَمُ إِنَّهُ لَيَحْزُنُكَ الَّذِي يَقُولُونَ فَإِنَّهُمْ لَا يُكَذِّبُونَكَ وَلَكِنَّ الظَّالِمِينَ بِآَيَاتِ اللَّهِ يَجْحَدُونَ (33) وَلَقَدْ كُذِّبَتْ رُسُلٌ مِنْ قَبْلِكَ فَصَبَرُوا عَلَى مَا كُذِّبُوا وَأُوذُوا حَتَّى أَتَاهُمْ نَصْرُنَا وَلَا مُبَدِّلَ لِكَلِمَاتِ اللَّهِ وَلَقَدْ جَاءَكَ مِنْ نَبَإِ الْمُرْسَلِينَ (34)हम जानते हैं कि जो कुछ वे कहते हैं वह आपको दुख पहुंचाता है (परंतु) जान लीजिए कि वे आपको झुठलाते हैं बल्कि वे ऐसे अत्याचारी हैं जो ईश्वर की निशानियों का इन्कार करते हैं। (6:33) और निसंदेह आपसे पहले भी पैग़म्बरों को झुठलाया गया तो उन्होंने झुठलाए जाने और यातनाएं पहुंचाए जाने पर संयम से काम लिया यहां तक कि उन तक हमारी सहायता पहुंच गयी। यह ईश्वरीय परंपरा है और ईश्वर के शब्दों (तथा परंपराओं) को कोई परिवर्तित करने वाला नहीं है। और निसंदेह (पिछले) पैग़म्बरों के समाचार (तो) आप तक पहुंच ही चुके हैं। (अतः आप भी धैर्य रखिए।) (6:34)पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम सदैव तर्कसंगत बातों द्वारा, अनेकेश्वरवादियों को सत्य का निमंत्रण देते थे परंतु वे केवल स्वीकार नहीं करते थे बल्कि अपने द्वेष और हठधर्म के कारण उनका अनादर भी करते थे। पैग़म्बर उनके इस व्यवहार से बहुत दुःखी होते थे। अतः ईश्वर क़ुरआन की अनेक आयतों में पैग़म्बर को सांत्वना देता है और कहता है। यदि ये लोग तुम्हें झुठलाते हैं तो दुखी मत हो क्योंकि ये ईश्वर और उसकी निशानियों को भी झुठलाते हैं।आगे चलकर ईश्वर कहता है। इसके अतिरिक्त तुम ऐसे पहले पैग़म्बर नहीं हो जिसे झुठलाया गया है बल्कि पूरे मानव इतिहास में सदैव ही पैग़म्बरों के विरोधियों ने उन्हें झुठलाया और यातनाएं दी हैं। विरोधियों की पद्धति ही यह है परंतु उनकी इस पद्धति के मुक़ाबले में ईश्वर की परंपरा सत्य की सहायता करना है शर्त यह है कि सत्य वाले अपने ईमान और कर्मों पर डटे रहें।इन आयतों से हमने सीखा कि सत्य के इन्कार और ईश्वरीय निशानियों के झुठलाए जाने से सत्य और ईश्वरीय निशानियों को कोई हानि नहीं होती बल्कि वस्तुतः यह स्वयं पर अत्याचार है कि मनुष्य सत्य के चिन्ह देखने से वंचित हो जाता है।सत्य का मार्ग कभी भी समतल और बिना कठिनाइयों के नहीं रहा है। पैग़म्बरों के लक्ष्यों की पूर्ति में सदैव कठिनाइयां सहन करनी पड़ती है।ईश्वरीय नेताओं को यह आशा नहीं रखनी चाहिए कि सभी लोग उनकी बातें सुनकर स्वीकार कर लेंगे और उनका आज्ञापालन करने लगेंगे।आइये अब सूरए अनआम की 35वीं आयत की तिलावत सुनते हैंوَإِنْ كَانَ كَبُرَ عَلَيْكَ إِعْرَاضُهُمْ فَإِنِ اسْتَطَعْتَ أَنْ تَبْتَغِيَ نَفَقًا فِي الْأَرْضِ أَوْ سُلَّمًا فِي السَّمَاءِ فَتَأْتِيَهُمْ بِآَيَةٍ وَلَوْ شَاءَ اللَّهُ لَجَمَعَهُمْ عَلَى الْهُدَى فَلَا تَكُونَنَّ مِنَ الْجَاهِلِينَ (35)और यदि इन (काफ़िरों और अनेकेश्वरवादियों) का अनदेखी करना और मुंह मोड़ना आपके लिए भारी है तो यदि आपके अधिकार में हो तो धरती में सुरंग बना दें या आकाश में सीढ़ी लगाकर इनके लिए कोई निशानी ले आएं (परंतु जान लीजिए कि ये ईमान लाने वाले नहीं हैं) और यदि ईश्वर चाहता तो इन सबको मार्गदर्शन पर एकत्रित कर देता (परंतु ईश्वर की परंपरा ज़ोर जबरदस्ती क मार्गदर्शन की नहीं है) अतः आप कदापि अज्ञानियों में से न हों। (6:35)पिछली आयतों में पैग़म्बरों की तर्कसंगत बातों के मुक़ाबले में विरोधियों की ग़लत पद्धतियों का वर्णन करने के पश्चात इस आयत में ईश्वर पैग़म्बरे इस्लाम को संबोधित करते हुए कहता है। यह मत सोचिए कि यदि वे ईमान नहीं लाते तो इसमें आपकी शिक्षाओं में कोई कमी है या आपके निमंत्रण की पद्धति ग़लत है बल्कि कमी उनमें है जो सत्य स्वीकार करना नहीं चाहते और आप भी उन्हें सत्य स्वीकार करने के लिए विवश नहीं कर सकते।आयत कहती है कि ईश्वर ने भी सत्य स्वीकार करने के लिए किसी को विवश नहीं किया है और यदि वह चाहता तो सभी लोग सत्य के समक्ष नतमस्तक होने पर विवश होते परंतु ईश्वर ने लोगों को चयन का अधिकार दिया है और वह चाहता है कि लोग अपनी इच्छा से अपने मार्ग का चयन करें।आगे चलकर आयत विरोधियों द्वारा झुठलाए जाने पर हर प्रकार की व्याकुलता और असहिष्णुता को, इस ईश्वरीय परंपरा से अनभिज्ञता की निशानी बताती है और पैग़म्बर को संबोधित करते हुए सभी ईमान वालों से कहती है कि ऐसा न करो अन्यथा तुम अज्ञानियों में से होगे।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर ने लोगों के मार्गदर्शन के साधन उपलब्ध कर दिए हैं और वो चाहता है कि सभी का मार्गदर्शन हो जाए परंतु उसकी तत्वदर्शिता की मांग है कि मनुष्य स्वतंत्र रहे और अपनी इच्छा से मार्गदर्शन को स्वीकार करे।बहाने बनाने वालों की इच्छाओं की पूर्ति करना, एक अज्ञानतापूर्ण कार्य है क्योंकि वे कभी भी सत्य को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होंगे।सूरए अनआम की 36वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।إِنَّمَا يَسْتَجِيبُ الَّذِينَ يَسْمَعُونَ وَالْمَوْتَى يَبْعَثُهُمُ اللَّهُ ثُمَّ إِلَيْهِ يُرْجَعُونَ (36)(हे पैग़म्बर!) आपके निमंत्रण को केवल वही लोग स्वीकार करते हैं, जो सुनते हैं (और काफ़िर तो, मरे हुए लोगों की भांति, बहरे हैं।) और ईश्वर (प्रलय में) मरे हुए लोगों को उठाएगा फिर वे उसी की ओर पलटाए जाएंगे। (6:36)क़ुरआने मजीद ने विभिन्न आयतों में सत्य बात को न सुनने वालों को बहरा, और जो सत्य बात से प्रभावित नहीं होते उन्हें मरा हुआ बताया है क्योंकि वह व्यक्ति जिसके कान है परंतु सत्य सुनने के लिए तैयार नहीं है वह बहरों की भांति है। इसी प्रकार जो व्यक्ति बुद्धि और हृदय रखने के बावजूद सत्य बात से प्रभावित नहीं होता वह उस मरे हुए व्यक्ति की भांति है जिसमें सोचने समझने की क्षमता नहीं है।परंतु जब प्रलय के दिन ईश्वर, ऐसे मुर्दों को उठाएगा तो वे प्रलय के दृश्य देखकर, निश्चेतना की निंद्रा से जाग जाएंगे और ईमान ले आएंगे, परंतु उस दिन के ईमान का कोई लाभ नहीं होगा क्योंकि समय बीत चुका होगा।इस आयत से हमने सीखा कि हठधर्मी और काफ़िर, जीवित दिखाई देने वाले ऐसे मुर्दे हैं कि मौत उनकी चेतना का कारण बनेगी।मनुष्य का मूल्य उसके आत्मिक व आध्यात्मिक जीवन में है, खाने और सोने के अर्थ वाला जीवन तो पशुओं के पास भी है।हमारा दायित्व केवल लोगों के बारे में है जिनका हृदय सत्य स्वीकार करने के लिए लिए तैयार हो। सत्य को स्वीकार न करने वाले काफ़िरों का मामला ईश्वर के हाथ में है तथा धर्म के संबंध में उन्हें विवश करने का हमें अधिकार नहीं है।