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    सूरए अनआम, आयतें 37-39, (कार्यक्रम 202)

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    आइये सूरए अनआम की 37वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।وَقَالُوا لَوْلَا نُزِّلَ عَلَيْهِ آَيَةٌ مِنْ رَبِّهِ قُلْ إِنَّ اللَّهَ قَادِرٌ عَلَى أَنْ يُنَزِّلَ آَيَةً وَلَكِنَّ أَكْثَرَهُمْ لَا يَعْلَمُونَ (37)और (अनेकेश्वरवादी) कहते हैं कि उनके पास उनके पालनहार की ओर से (ऐसी) कोई निशानी क्यों नहीं आती जैसी (हम) चाहते हैं? (हे पैग़म्बर! उनसे) कह दीजिए कि ईश्वर (ऐसी) निशानी भेजने में सक्षम है (जो तुम चाहते हो) परंतु (इन बहानेबाज़ों में से) अधिकांश लोग नहीं समझते। (6:37)इतिहास में वर्णित है कि जब क़ुरैश के बड़े-2 व्यक्ति जो अनेकेश्वरवादी थे, क़ुरआन का उत्तर लाने में अक्षम रहे तो उन्होंने कहा कि क़ुरआन तो चमत्कार नहीं हो सकता। यदि तुम सत्य बोलते हो तो ऐसे चमत्कार लाओ जैसे हज़रत ईसा और मूसा इत्यादि लाए थे, ताकि हम तुम्हारी बात स्वीकार करें।स्पष्ट है कि उनकी यह बात सत्य स्वीकार करने हेतु नहीं थी बल्कि वे क़ुरआन और हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम की पैग़म्बरी को स्वीकार करने से बचने के लिए ऐसे बहाने बना रहे थे और यदि पैग़म्बरे इस्लाम पिछले पैग़म्बरों की भांति कोई चमत्कार ले भी आते, तब भी वे किसी दूसरे चमत्कार की मांग करते क्योंकि वे सत्य को समझने का प्रयास ही नहीं कर रहे थे। वे अन्य पैग़म्बरों के काल के लोगों की ही भांति चमत्कार को जादू टोना, और ईश्वरीय पैग़म्बर को जादूगर कहते। यदि कोई सो रहा है तो एक बार या कई बार आवाज़ देने से जाग जाता है परंतु यदि कोई सोने का ढोंग किए हो तो उसे चाहे जितनी आवाज़ दी जाए वह नहीं जागता क्योंकि वह उठना ही नहीं चाहता। सत्य की आवाज़ के संबंध में भी दो प्रकार के लोग होते हैं। कुछ सत्य की आवाज़ सुनते ही निश्चेतना की निद्रा से जाग उठते हैं और सही मार्ग पर आ जाते हैं परंतु दूसरे सोने का ढोंग करके पड़े रहते हैं और सत्य स्वीकार करना नहीं चाहते। हम चाहे जितने भी रूप में सत्य को उनके सामने पेश करें, वे सही मार्ग पर नहीं आएंगे।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वरीय चमत्कार का लक्ष्य, किसी व्यक्ति की पैग़म्बरी को सिद्ध करना तथा लोगों के समक्ष अपनी ओर से तर्क प्रस्तुत करना है, न कि हठधर्मी लोगों की अनंत इच्छाओं की पूर्ति करना।ईश्वर हर काम की क्षमता रखता है परंतु उसकी क्षमता उसकी तत्वदर्शिता से जुड़ी हुई है। वह लोगों द्वारा इच्छित सभी चमत्कार दिखा सकता है परंतु यह उसकी तत्वदर्शिता से मेल नहीं खाता और इतिहास ने भी दर्शाया है कि निरंतर चमत्कार भी हठधर्मियों के मार्गदर्शन का कारण नहीं बनते हैं।आइये अब सूरए अनआम की 38वीं आयत की तिलावत सुनते हैंوَمَا مِنْ دَابَّةٍ فِي الْأَرْضِ وَلَا طَائِرٍ يَطِيرُ بِجَنَاحَيْهِ إِلَّا أُمَمٌ أَمْثَالُكُمْ مَا فَرَّطْنَا فِي الْكِتَابِ مِنْ شَيْءٍ ثُمَّ إِلَى رَبِّهِمْ يُحْشَرُونَ (38)और धरती में कोई भी रेंगने वाला जीव और (आकाश में) दोनों परों से उड़ने वाला कोई भी पक्षी ऐसा नहीं है, जिसकी तुम्हारी ही भांति जातियां न हों। हमने (अपनी) किताब में किसी भी वस्तु (के वर्णन) में कोई कमी नहीं की है। इसके बाद सभी को उनके पालनहार के समक्ष पेश किया जाएगा। (6:38)यह आयत मनुष्य को सचेत करती है कि वह अन्य जीवों को बुद्धि विहीन न समझे बल्कि सभी जीव चाहे वे धरती पर चलने वाले पशु हों या आकाश में उड़ने वाले पक्षी, सबके मनुष्यों की भांति ही गुट और जाति होते हैं और वे एक प्रकार की बुद्धि रखते हैं। जैसा कि क़ुरआने मजीद में हज़रत सुलैमान की घटना में चींटी और हुदहुद के बात करने का वर्णन किया गया है।अलबत्ता स्पष्ट है कि बुद्धि और समझ के कई चरण होते हैं तथा मनुष्य सबसे ऊपरी चरण में है जबकि पशु पक्षी सबसे निचले चरण में हैं। जिस प्रकार से कि स्वयं मनुष्यों में, अपने जन्म के पहले वर्ष में बालक की बुद्धि और समझ बहुत कम होती है और साधारणतः उसे बुद्धिहीन कहा जाता है।जीवों में बुद्धि के विषय का वर्णन करने के पश्चात यह आयत, उनके प्रलय में उठाए जाने की ओर संकेत करते हुए कहती है कि वे भी प्रलय में उठाए जाएंगे और अपने पालनहार के समक्ष पेश होंगे जैसा कि क़ुरआने मजीद के सूरए तकवीर की पांचवीं आयत में कहा गया कि واذا الوحوش حشرت अर्थात और जब जानवरों को एकत्रित किया जाएगा।पैग़म्बरे इस्लाम और उनके परिजनों के कथनों में भी, प्रलय में पशुओं के उठाए जाने की ओर संकेत किया गया है तथा एक दूसरे पर उनके अत्याचारों और प्रलय में उन्हें मिलने वाले दंड के उदाहरणों का उल्लेख किया गया है।अलबत्ता पशुओं की बुद्धि इस स्तर की नहीं है कि उन पर भी मनुष्यों की भांति दायित्व डाले जाएं बल्कि आयत का तात्पर्य यह है कि जितनी उनकी बुद्धि है उसी हिसाब से उन्हें दंड या पारितोषिक दिया जाएगा।जिस प्रकार से कि एक बारह वर्षीय बालक को भी, जो हत्या की बुराई समझने के बावजूद किसी की हत्या कर दे तो हर देश में वहां के दंडात्मक क़ानून के अंतर्गत दंड दिया जाता है। जितनी उसकी समझ होती है उसी हिसाब से वह उत्तरदायी होता है।इस आयत से हमने सीखा कि सामाजिक व सामूहिक जीवन की व्यवस्था मनुष्यों से विशेष नहीं है बल्कि जानवरों में भी एक प्रकार के सामाजिक समूह होते हैं।जानवरों पर अत्याचार नहीं करना चाहिए। हमारी ही भांति उन्हें भी जीवन का अधिकार है और वे भी किसी सीमा तक बुद्धि और समझ रखते हैं।सृष्टि ईश्वर से आरंभ हुई और उसी पर समाप्त होगी। सभी जीव ईश्वर की ओर बढ़ रहे हैं और उसके पालनहार होने का एक उदाहरण है।आइये अब सूरए अनआम की 39वीं आयत की तिलावत सुनते हैंوَالَّذِينَ كَذَّبُوا بِآَيَاتِنَا صُمٌّ وَبُكْمٌ فِي الظُّلُمَاتِ مَنْ يَشَأِ اللَّهُ يُضْلِلْهُ وَمَنْ يَشَأْ يَجْعَلْهُ عَلَى صِرَاطٍ مُسْتَقِيمٍ (39)और जिन लोगों ने हमारी आयतों को झुठलाया वे बहरे और गूंगे अंधकारों में पड़े हुए हैं। ईश्वर जिसे चाहता है पथभ्रष्ठ कर देता है जिसे चाहता है, सीधे रास्ते पर डाल देता है। (6:39)यह आयत ईश्वरीय आयतों को झुठलाने का स्रोत उस द्वेष और हठधर्म को मानती है जिसने इन्कार करने वालों के हृदय में घर कर लिया है।ऐसा हठधर्म जो उन्हें सत्य को सुनने और उसे स्वीकार करने की अनुमति नहीं देता। स्वार्थ और आत्मप्रेम ने उन्हें ऐसासे अंधकारों में ढकेल दिया है कि वे सत्य और वास्तविकताओं को देखने से भी वंचित हो गये हैं।आगे चलकर आयत कहती है कि लोगों का मार्गदर्शन और पथभ्रष्टता ईश्वर के हाथ में है परंतु स्पष्ट है कि ईश्वर ने मार्गदर्शन के साधन की जो बुद्धि और पैग़म्बरी है, सभी मनुष्यों के अधिकार में दिए हैं किन्तु जो कोई इस आरंभिक मार्गदर्शन को स्वीकार नहीं करता वह अगले मार्गदर्शन के द्वार अपने ऊपर बंद कर लेता है।दूसरे शब्दों में बुरे कर्म और उन पर आग्रह इस बात का कारण बनता है कि मनुष्य सत्य स्वीकार करने के मार्ग से विचलित हो जाए। जिस प्रकार से कि अच्छे कर्म सत्य स्वीकार करने का कारण बनते हैं।इस आयत से हमने सीखा कि कुफ़्र और द्वेष ऐसा अंधकार है जिसके कारण मनुष्य सत्य को समझने से वंचित हो जाता है।संसार में ईश्वरीय निशानियों को झुठलाने का दंड, सांसारिक जीवन में पथभ्रष्टता है।