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    सूरए अनआम, आयतें 4-9, (कार्यक्रम 195)

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    आइये पहले सूरए अनआम की चौथी और पांचवीं आयतों की तिलावत सुनें।وَمَا تَأْتِيهِمْ مِنْ آَيَةٍ مِنْ آَيَاتِ رَبِّهِمْ إِلَّا كَانُوا عَنْهَا مُعْرِضِينَ (4) فَقَدْ كَذَّبُوا بِالْحَقِّ لَمَّا جَاءَهُمْ فَسَوْفَ يَأْتِيهِمْ أَنْبَاءُ مَا كَانُوا بِهِ يَسْتَهْزِئُونَ (5)और उनके पास उनके पालनहार की जो भी निशानी आई, उन्होंने (स्वीकार करने के स्थान पर उसका इन्कार कर दिया और) उससे मुंह मोड़ लिया। (6:4) निसंदेह उन्होंने अपने पास सत्य आने के पश्चात उसे झुठलाया तो शीघ्र ही, जिसका वे परिहास करते थे, उसकी ख़बर आने वाली है। (6:5)पिछली आयतों में ईश्वर ने आकाशों, धरती तथा मनुष्य की सृष्टि में अपनी कुछ निशानियों का उल्लेख किया और मनुष्य को संसार में उसके सीमित जीवन का ध्यान दिलाया। यह आयत कहती है। कुछ लोग संसार और स्वयं अपने अस्तित्व में ईश्वर की निशानियों को देखने के बावजूद, उसे स्वीकार करने और ईमान लाने के स्थान पर इन्कार और झुठलाने की पद्धति अपनाते हैं।दूसरे शब्दों में कुछ लोगों को ऐसा नहीं है कि सत्य की निशानियाँ नहीं मिलती बल्कि वे सत्य को स्वीकार करने का इरादा ही नहीं रखते ठीक उस व्यक्ति की भांति जो अपने को सोता हुआ दिखाना चाहता है, उसे जितनी भी आवाज़ दी जाए बल्कि हाथों से हिलाया भी जाए तब भी वह नहीं उठता और यही दर्शाता है कि वह सो रहा है।परंतु जो व्यक्ति स्वाभाविक रूप से सो रहा है वह आवाज़ देने से ही उठ जाता है। पहले प्रकार के लोगों की स्थिति स्थाई नहीं है और एक दिन ऐसा आता है जब उनके बुरे कर्मों और बुरी सोच के कुपरिणाम उन्हें अपनी लपेट में ले लेते हैं तथा वे अपनी बनावटी नींद से जाग जाते हैं परंतु तब देर हो चुकी होती है और कोई लाभ नहीं होता।इन आयतों से हमने सीखा कि सत्य को स्वीकार न करने की ठाने हुए ज़िद्दी और हठधर्मी लोगों के लिए आयत और तर्क के प्रकार में कोई अंतर नहीं है, वे सभी को रद्द कर देते हैं।ज़िद्दी और हठधर्मी लोगों का कोई तर्क नहीं होता बल्कि उनकी पद्धति ईमान वालों और उनकी आस्थाओं के परिहास और अनादर पर आधारित होती है। आइये अब सूरए अनआम की छठी आयत की तिलावत सुनते हैं।أَلَمْ يَرَوْا كَمْ أَهْلَكْنَا مِنْ قَبْلِهِمْ مِنْ قَرْنٍ مَكَّنَّاهُمْ فِي الْأَرْضِ مَا لَمْ نُمَكِّنْ لَكُمْ وَأَرْسَلْنَا السَّمَاءَ عَلَيْهِمْ مِدْرَارًا وَجَعَلْنَا الْأَنْهَارَ تَجْرِي مِنْ تَحْتِهِمْ فَأَهْلَكْنَاهُمْ بِذُنُوبِهِمْ وَأَنْشَأْنَا مِنْ بَعْدِهِمْ قَرْنًا آَخَرِينَ (6)क्या उन्होंने नहीं देखा कि हमने उनसे पहले के कितने वंशों को तबाह करके समाप्त कर दिया। हमने धरती में उन्हें वह सत्ता व क्षमता प्रदान की थी कि जो तुम्हें भी नहीं दी है। हमने आकाश से उनके लिए मूसलाधार वर्षा भेजी और उनके पैरों के नीचे से नहरें बहा दीं परंतु उनके पापों के दंड स्वरूप हमने उन सबको (तबाह करके) समाप्त कर दिया और उनके पश्चात एक नया वंश ले आए। (6:6)यह आयत ज़िद और हठधर्म के कारण सत्य के स्वीकार करने पर तैयार न होने वालों को संबोधित करते हुए कहती हैः क्या तुमने इतिहास का अध्ययन नहीं किया है? क्या तुम्हें ऐसी जातियों और सभ्यताओं का ज्ञान नहीं है जो तुमसे पूर्व थीं और अब समाप्त हो चुकी हैं? क्या तुम यह सोचते हो कि तुम उनसे अधिक शक्तिशाली हो और तुम्हें अधिक संभावनाएं दी गयी हैं कि तुम हमारी सत्ता और नियंत्रण से बाहर निकल सकते हो?जान लो कि उनमें से कुछ जातियों को तुमसे अधिक क्षमताएं दी गयी थीं परंतु चूंकि उन्होंने ईश्वरीय विभूतियों और अनुकंपाओं का दुरुपयोग किया और उन्हें पाप और उद्दंडता के मार्ग में प्रयोग किया अतः हमने उन्हें तबाह कर दिया और उनके स्थान पर दूसरों को ले आए।जी हां, मनुष्यों के अतिरिक्त, जिनमें से प्रत्येक के कर्मों का हिसाब किताब होगा और उसी के अनुकूल उसे दंड या पारितोषिक दिया जाएगा, मानव समाजों का भी एक भविष्य व परिणाम होता है जो उन समाजों की बहुसंख्या के क्रियाकलापों पर निर्भर होता है। यह परिणाम अटल होता है और इससे बचा नहीं जा सकता।इस आयत से हमने सीखा कि इतिहास का अध्ययन और पिछली जातियों के अंजाम से पाठ सीखना प्रशिक्षण का एक अच्छा मार्ग है तथा क़ुरआन और ईश्वरीय मार्गदर्शकों ने इसकी सिफ़ारिश की है।लोगों का व्यवहार और क्रियाकलाप, ऐतिहासिक घटनाओं और परिवर्तनों का कारण होता है और पाप में डूबे हुए समाजों को तबाह करना पूरे मानव इतिहास में ईश्वर की एक अटल परंपरा रही है।भौतिक संभावनाएं, सफलता और कल्याण का रहस्य नहीं हैं बल्कि यह निश्चेतना, घमंड और अत्याचार का कारण बन सकती हैं जिनसे व्यक्ति और समाज तबाह हो सकता है। आइये अब सूरए अनआम की सातवीं आयत की तिलावत सुनते हैं।وَلَوْ نَزَّلْنَا عَلَيْكَ كِتَابًا فِي قِرْطَاسٍ فَلَمَسُوهُ بِأَيْدِيهِمْ لَقَالَ الَّذِينَ كَفَرُوا إِنْ هَذَا إِلَّا سِحْرٌ مُبِينٌ (7)और यदि हम (आप पर) काग़ज़ पर लिखी हुई किताब भी उतार देते और ये उसे अपने हाथों से छू भी लेते तो काफ़िर (यही) कहते कि यह खुले हुए जादू के अतिरिक्त कुछ नहीं। (6:7)इतिहास की पुस्तकों में वर्णित है कि मक्के के अनेकेश्वरवादियों के गुट ने पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम से कहा कि हम उस स्थिति में आप पर ईमान लाएंगे जब आप ईश्वरीय कथनों को लिखित रूप में एक काग़ज़ पर हमारे लिए उतारें, उसी प्रकार जैसे ईश्वर ने हज़रत मूसा पर तौरैत को शिलालेख क रूप में उतारा और वे तौरैत के शिलालेखों को तूर नामक पर्वत से लेकर लोगों के पास आए।क़ुरआन उत्तर में कहता है कि यदि ऐसा ही होता तब भी वे कोई दूसरा बहाना बनाते और कहते कि यह ईश्वरीय चमत्कार नहीं है बल्कि जादू है, जिस प्रकार से कि तौरैत के शिलालेख देखने के बाद भी बहुत से लोग हज़रत मूसा पर ईमान नहीं लाए और उन्होंने उन्हें जादूगर कहा।आइये सूरए अनआम की आठवीं और नवीं आयत की तिलावत सुनते हैं।وَقَالُوا لَوْلَا أُنْزِلَ عَلَيْهِ مَلَكٌ وَلَوْ أَنْزَلْنَا مَلَكًا لَقُضِيَ الْأَمْرُ ثُمَّ لَا يُنْظَرُونَ (8) وَلَوْ جَعَلْنَاهُ مَلَكًا لَجَعَلْنَاهُ رَجُلًا وَلَلَبَسْنَا عَلَيْهِمْ مَا يَلْبِسُونَ (9)और (बहाने बाज़ काफ़िरों ने) कहा (यदि मुहम्मद पैग़म्बर हैं) तो फिर उनपर कोई फ़रिश्ता क्यों नहीं उतरता (हम उसे देख सकें) जबकि यदि हम फ़रिश्ते को उतार देते (और वह तब भी ईमान न लाते) तो उनका काम हो जाता और उन्हें किसी प्रकार की मोहलत न दी जाती। (6:8) और यदि हम पैग़म्बर को फ़रिश्ता भी बनाते तो निसंदेह हम उन्हें पुरुष ही बनाते और वही पहनाते जो पुरुष पहनते हैं। (6:9)ईश्वर पर ईमान लाने हेतु बहानेबाज़ों की एक अन्य मांग, ईश्वरीय संदेश अर्थात वहि लाने वाले फ़रिश्ते कत देखना या स्वयं पैग़म्बर का फ़रिश्ता होना है कि इसके उत्तर में ईश्वर इन आयतों में कहता है। यदि तुम फ़रिश्ते को देखना चाहते हो तो इसके लिए आवश्यक था कि हम उसे मनुष्य के रूप में लाते, उस स्थिति में भी उसके फ़रिश्ते होने का निर्धारण तुम्हारे लिए कठिन था और तुम कहते कि यह तो हमारी ही भांति एक मनुष्य है।इसके अतिरिक्त तुम यह समझ जाते कि वो फ़रिश्ता है तो उस पर ईमान लाने पर विवश होते और तुम्हारे पास कोई बहाना न बचता, जबकि तुम्हारी बहाने बाज़ी और हठधर्मी की हमें जो पहचान है उसके अंतर्गत तुम फिर भी ईमान नहीं लाते और उस स्थिति में ईश्वरीय दंड का आना निश्चित होता और तुम सब मारे जाते। अतः ईश्वर ने तुम्हारी यह मांग स्वीकार न करके तुम्हारे ऊपर कृपा की है।यह आयतें स्पष्ट रूप से दर्शाती हैं कि कुछ लोगों का घमंड और अहंकार उन्हें इस बात की अनुमति नहीं देता था कि वे अपने समान किसी मनुष्य का अनुसरण करें और उसकी पैग़म्बरी को स्वीकार करें। वे सोचते थे कि पैगम्बर को फ़रिश्ता होना चाहिए, जबकि पैग़म्बर केवल वहि पहुंचाने का उत्तरदायी नहीं होता बल्कि वास्तव में वह मनुष्य के लिए कर्म और व्यवहार का आदर्श होता है। कोई भी फ़रिश्ता मनुष्य का आदर्श नहीं हो सकता क्योंकि मनुष्य की इच्छाएं, आवश्यकताएं और प्रकृति पूर्णतः फ़रिश्तों से भिन्न होती है।इन आयतों से हमने सीखा कि यदि मनुष्य सत्य स्वीकार करने की इच्छा रखता हो तो छोटे से तर्क और चमत्कार से भी जाग उठता है और सत्य को स्वीकार कर लेता है परंतु यदि वह बहानेबाज़ और हठधर्मी हो तो आकाश से उतरे हुए फ़रिश्ते को देखने के बाद भी इन्कार का मार्ग खोज लेता है।फ़रिश्तों के निमंत्रण की पद्धति, ईश्वरीय संदेश वहि पेश करना और लोगों को सत्य स्वीकार करने के लिए समय देना है परंतु यदि लोगों के आग्रह पर ईश्वर की ओर से कोई चमत्कार आए तो फिर उनके लिए कोई समय नहीं बचता, एकमात्र मार्ग ईमान का होता है वरना तबाही।