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    सूरए अनआम, आयतें 40-45, (कार्यक्रम 203)

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    आइये सूरए अनआम की 40वीं और 41वीं आयतों की तिलावत सुनते हैंقُلْ أَرَأَيْتَكُمْ إِنْ أَتَاكُمْ عَذَابُ اللَّهِ أَوْ أَتَتْكُمُ السَّاعَةُ أَغَيْرَ اللَّهِ تَدْعُونَ إِنْ كُنْتُمْ صَادِقِينَ (40) بَلْ إِيَّاهُ تَدْعُونَ فَيَكْشِفُ مَا تَدْعُونَ إِلَيْهِ إِنْ شَاءَ وَتَنْسَوْنَ مَا تُشْرِكُونَ (41)(हे पैग़म्बर! काफ़िरों से) कह दीजिए कि यदि तुम सच बोलते हो तो उस समय तुम क्या करोगे जब ईश्वर का दंड आ पहुंचेगा या प्रलय की घड़ी आ पहुंचेगी? क्या तुम ईश्वर के अतिरिक्त किसी और को पुकारोगे? (6:40) (नहीं) बल्कि तुम केवल उसी को पुकारोगे और जिसे तुम उसका समकक्ष ठहराते हो उसे भूल जाओगे और ईश्वर भी यदि चाहे तो तुम्हारी समस्या को समाप्त कर सकता है। (6:41)हमने बताया था कि कुफ़्र और इन्कार का अस्ली कारण द्वेष और हठधर्म है और काफ़िरों के पास ईश्वर के अस्तित्व के इन्कार का कोई तर्क नहीं है और वे ईमान वालों का तर्क स्वीकार करने के लिए भी तैयार नहीं हैं।ये आयतें ऐसे लोगों को जागृत करने के लिए कहती हैं। ईश्वर के स्थान पर अन्य लोगों या वस्तुओं को पूज्य मानने वाले तुम लोग दुर्घटनाओं और भूकंप जैसी आपदाओं के समय किसको पुकारते हो? क्या ऐसे अवसरों पर भी तुम उन्हीं की शरण में जाते हो? क्या ऐसे समय में वे तुम्हारी सहायता कर सकते हैं और तुम्हारी जान बचा सकते हैं? क्या तुमने कभी सोचा है कि यदि प्रलय सत्य हुआ तो उस समय तुम क्या करोगे?ये आयतें ऐसे लोगों की अंतरात्मा को संबोधित करते हुए कहती हैं। सत्य यह है कि ऐसे अवसरों पर तुम केवल ईश्वर ही को पुकारते हो और दूसरों को, चाहे वह जो कोई और जो कुछ हो, भूल जाते हो। ईश्वर ही है जो तुम्हारी कठिनाइयों और समस्याओं को समाप्त कर सकता है, अलबत्ता यदि यह बात उसकी तत्वदर्शिता से अनुकूल हुई तो।इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वर का अस्तित्व और उसका होना एक स्वाभाविक बात है तथा हर मनुष्य ईश्वर की खोज में रहता है परंतु सांसारिक बखेड़े उसे इस स्वाभाविक बात की ओर से निश्चेत रखते हैं तथा दुर्घटनाएं और कठिनाइयां निश्चेतना समाप्त होने तथा ईश्वर की खोज की प्रवृत्ति के स्पष्ट होने का कारण बनती हैं।ऐसी किसी वस्तु से दिल नहीं लगाना चाहिए जो कठिनाइयों के समय काम न आए और जिसे स्वयं हमारी भांति किसी शरण की आवश्यकता हो।आइये अब सूरए अनआम की 42वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।وَلَقَدْ أَرْسَلْنَا إِلَى أُمَمٍ مِنْ قَبْلِكَ فَأَخَذْنَاهُمْ بِالْبَأْسَاءِ وَالضَّرَّاءِ لَعَلَّهُمْ يَتَضَرَّعُونَ (42)और निसंदेह हमने आपसे पहले की जातियों की ओर भी पैग़म्बर भेजे और उन्हें कठिनाइयों और संकटों में ग्रस्त किया कि शायद वे (हमारे सामने) गिड़गिड़ाएं (और सत्य को स्वीकार कर लें।) (6:42)यह आयत कहती है कि सदै ही ईश्वर की परंपरा रही है कि उसने लोगों के मार्गदर्शन के लिए पैग़म्बर भेजे हैं तथा लोगों के जीवन में कठिनाइयां डाली हैं ताकि उनकी सच्ची प्रकृति जागृत हो जाए और पैग़म्बरों की बातें स्वीकार करने का मार्ग प्रशस्त हो जाए। उनके मन और हृदय में बैठी हुई धूल और ज़ंग साफ़ हो और उनका हृदय एक स्वच्छ दर्पण की भांति बन जाए ताकि वे उसमें सत्य के प्रकाश को देखकर अपने अस्तित्व को प्रज्वलित कर लें।इस आयत से हमने सीखा कि प्रशिक्षण के मार्ग में कड़ाई और दबाव भी आवश्यक है तथा कठिनाइयां प्रकृति को जागृत करने और ईश्वर की ओर उन्मुख होने का एक मार्ग हैं।ईश्वर के समक्ष रोना और गिड़गिड़ाना हृदय को कोमल बनाता है तथा सत्य स्वीकार करने की भूमि समतल करता है।आइये सूरए अनआम की 43वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।فَلَوْلَا إِذْ جَاءَهُمْ بَأْسُنَا تَضَرَّعُوا وَلَكِنْ قَسَتْ قُلُوبُهُمْ وَزَيَّنَ لَهُمُ الشَّيْطَانُ مَا كَانُوا يَعْمَلُونَ (43)तो जब हमारी ओर से उनपर कठिनाइयां आईं तो वे क्यों न गिड़गिड़ाएं बल्कि (वास्तविकता यह है कि) उनके हृदय कठोर हो गये हैं और जो कुछ वे (बुरे कर्म) करते थे, उन्हें शैतान ने उनको अच्छा बनाकर दिखाया है। (6:43)यह आयत कहती है कि ईश्वर का इन्कार करने वाले जागृत नहीं हुए और उन्होंने पाठ नहीं सीखा। उनकी निश्चेतना के दो कारण थे। एक पाप के दलदल में घुसने के कारण हृदय में आने वाली कठोरता और दूसरे अपने बुरे कर्मों को अच्छा समझना। वे जो भी ग़लत काम करते थे, उसे ठीक समझते थे।इस आयत से हमने सीखा कि हठधर्मी लोगों पर न सदुपदेश, प्रभाव डालता है और न ही दंड। वे न समझना चाहते हैं और न स्वीकार करना। मनुष्य जब तक स्वयं न चाहे, न समझता है न स्वीकार करता है।मनुष्य प्राकृतिक रूप से सौन्दर्य को पसंद करता है। यहां तक कि शैतान भी इसी प्रकृति से ग़लत लाभ उठाकर बुरे कर्मों को मनुष्य को सुन्दर बनाकर दिखाता है।आइये अब सूरए अनआम की आयत नंबर 44 और 45 की तिलावत सुनते हैं।فَلَمَّا نَسُوا مَا ذُكِّرُوا بِهِ فَتَحْنَا عَلَيْهِمْ أَبْوَابَ كُلِّ شَيْءٍ حَتَّى إِذَا فَرِحُوا بِمَا أُوتُوا أَخَذْنَاهُمْ بَغْتَةً فَإِذَا هُمْ مُبْلِسُونَ (44) فَقُطِعَ دَابِرُ الْقَوْمِ الَّذِينَ ظَلَمُوا وَالْحَمْدُ لِلَّهِ رَبِّ الْعَالَمِينَ (45)फिर जब वे उन नसीहतों को भूल गये जो उन्हें याद दिलाई गयी थीं तो हमने (परीक्षा स्वरूप) हर वस्तु के द्वार उनके लिए खोल दिए, यहां तक कि जब वे उन विभूतियों से प्रसन्न हो गये जो उन्हें दी गयी थीं तो सहसा ही हमने उन्हें (अपनी) पकड़ (में ले) लिया और वे निराश हो गये। (6:44) तो अत्याचारियों की जड़ें काट दी गयीं और (सारी) प्रशंसाएं उस ईश्वर के लिए हैं जो पूरे ब्रह्मांड का पालनहार है। (6:45)लोगों के मार्गदर्शन के लिए ईश्वर विभिन्न मार्गों का प्रयोग करता है। सत्य के प्रचार के लिए वे पैग़म्बरों को लोगों के बीच भेजता है, यदि प्रभाव न हुआ तो विभिन्न मार्गों से, इन्कार करने वालों को सचेत करता है और उन्हें कठिनाइयों और दबाव में डालता है कि शायद वे निश्चेतता की निंद्रा से जाग जाएं। और यदि फिर भी प्रभाव न हो तो ईश्वर उन्हें उनके हाल पर छोड़ देता है और उन्हें विभिन्न प्रकार की विभूतियां देता है।ऐसा इस लिए है कि ईश्वर का क़ानून है कि लोगों को सांसारिक विभूतियों से लाभान्वित होना चाहिए। परंतु लंबे समय तक ऐसा नहीं हो सकता और जब उनके पापों और बुराइयों का घड़ा भर जाता है, ईश्वर का सांसारिक दंड अचानक आ पहुंचता है और उन्हें तबाह कर देता है।पैग़म्बरे इस्लाम सलल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम कहते हैं कि जब भी तुम ये देखो कि संसार पापियों से भरा हुआ है और वे विभिन्न प्रकार की विभूतियों से लाभान्वित हो रहे हैं तो निराश मत हो कि ये उनकी तबाही की निशानी है।हज़रत अली अलैहिस्सलाम कहते हैं कि यदि ईश्वर निरंतर तुम्हें विभूतियां दे रहा है परंतु तुम पाप किए जा रहे हो तो सावधान हो जाओ और डरो कि इन विभूतियों का अंत अच्छा नहीं है।इन आयतों से हमने सीखा कि सांसारिक लाभ, विभूति भी हो सकते हैं और दंड भी। यदि ईमान, पवित्रता और ईश्वर से भय के पश्चात प्राप्त हो तो विभूति है और यदि पाप और उद्दंडता के पश्चात मिले तो ईश्वरीय दंड है। प्रत्येक दशा में सांसारिक ऐश्वर्य सदैव ईश्वरीय कृपा की निशानी नहीं होता बल्कि कभी ये दंड की भूमिका भी होता है।अत्याचार कभी भी सदैव नहीं रहता, अत्याचारियों की तबाही निश्चित है।