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    सूरए अनआम, आयतें 46-49, (कार्यक्रम 204)

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    आइये सूरए अनआम की 46वीं आयत की तिलावत सुनते हैंقُلْ أَرَأَيْتُمْ إِنْ أَخَذَ اللَّهُ سَمْعَكُمْ وَأَبْصَارَكُمْ وَخَتَمَ عَلَى قُلُوبِكُمْ مَنْ إِلَهٌ غَيْرُ اللَّهِ يَأْتِيكُمْ بِهِ انْظُرْ كَيْفَ نُصَرِّفُ الْآَيَاتِ ثُمَّ هُمْ يَصْدِفُونَ (46)(हे पैग़म्बर!) कह दीजिए कि क्या तुमने सोचा है कि यदि ईश्वर तुम्हारी सुनने और देखने की शक्ति को छीन ले और तुम्हारे हृदयों पर ठप्पा लगा दे तो अल्लाह के अतिरिक्त कौन सा ईश्वर तुम्हें यह सब लौटा सकता है? देखिए कि हम किस प्रकार आयतों (और निशानियों) का विभिन्न प्रकार से उल्लेख करते हैं फिर भी वे (ईमान लाने के स्थान पर) मुंह मोड़ लेते हैं। (6:46)पिछले कार्यक्रमों में क़ुरआने मजीद का संबोधन अनेकेश्वरवादियों से था और ईश्वर ने कई आयतों में अनेकेश्वरवादियों को चिंतन का निमंत्रण दिया था ताकि उनकी वास्तविक प्रकृति जाग उठे और उनके मन तथा आत्मा पर पड़े हुए निश्चेतना के पर्दे हट जाएं।यह आयत भी इस पद्धति को जारी रखते हुए पैग़म्बर से कहती है कि वे ईश्वर द्वारा दी गयी विभूतियों के बारे में अनेकेश्ववादियों को सोच विचार के लिए प्रोत्साहित करें और पूछें कि यदि ईश्वर तुम्हारी देखने और सुनने की शक्ति छीन ले और तुम वास्तविकताओं को पहचानने और समझने की क्षमता खो बैठो तो क्या ये मूर्तियां या वे वस्तुएं जिन्हें तुम पूजते हो, इन्हें वापस लौटा सकती हैं? बल्कि इससे भी महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या इनके पास आंख, कान और बुद्धि है जो यह तुम्हें दे सकें?आगे चलकर आयत कहती है कि क़ुरआन तर्कों को विभिन्न ढंग से प्रस्तुत करता है कि संभवतः ये लोग जागृत हो जाएं और उसे स्वीकार कर लें परंतु साम्प्रदायिक्ता और हठधर्म उन पर इतना छा चुका है कि वे पुनः मुंह मोड़ लेते हैं और स्वीकार नहीं करते।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वरीय अनुकंपाओं के महत्त्व और उनके छीने जाने के बारे में चिंतन, ईश्वर को पहचानने के मार्गों में से एक है।सृष्टि भी ईश्वर के हाथ में है और अनुकंपाओं को बाक़ी रखना तथा उनकी उपयोगिता भी ईश्वर के हाथ में है।आइये अब सूरए अनआम की आयत संख्या 47 की तिलावत सुनते हैंقُلْ أَرَأَيْتَكُمْ إِنْ أَتَاكُمْ عَذَابُ اللَّهِ بَغْتَةً أَوْ جَهْرَةً هَلْ يُهْلَكُ إِلَّا الْقَوْمُ الظَّالِمُونَ (47)(हे पैग़म्बर!) कह दीजिए कि क्या तुमने सोचा है कि यदि ईश्वरीय दंड अचानक और खुल्लमखुल्ला आ जाए (तो ऐसे में तुम क्या करोगे) क्या अत्याचारी गुट के अतिरिक्त कोई अन्य तबाह होने वाला है। (6:47)पिछली आयत में यह कहने के पश्चात कि यदि ईश्वर अपनी विभूतियां और अनुकंपाएं छीन ले तो तुम कुछ नहीं कर सकते, इस आयत में ईश्वर कहता है कि हम तुम्हारे लिए यदि दंड भी भेजें तो तुम में उसको रोकने की क्षमता नहीं है और न ही तुम उससे बच सकते हो तो यह स्वीकार कर लो कि जिन वस्तुओं को तुम पूज्य मानते हो वह न तुम्हें अनुकंपाएं दे सकती है और न किसी ख़तरे तथा क्षति को तुम से दूर कर सकती है, अतः तुम ईश्वर को छोड़कर उन्हें क्यों पूज्य मानते हो। आगे चलकर यह आयत सत्य के मुक़ाबले में इस प्रकार के हठधर्मी व्यवहार को स्वयं व समाज पर एक प्रकार का अत्याचार बताती है। आयत कहती है कि इस प्रकार का अत्याचार संसार में भी ईश्वरीय दंड की भूमि समतल करता है, अतः सचेत रहो।इस आयत से हमने सीखा कि, ईश्वर ने अपना दंड भेजने के संबंध में जो मोहलत दी है, उस पर घमंड नहीं करना चाहिए क्योंकि शायद ईश्वरीय दंड अचानक आ जाए।हठधर्मी करने वालों के सामने, निमंत्रण की सबसे अच्छी पद्धति वास्तविकताओं को प्रश्न के रूप में पेश करना है ताकि वे, स्वयं उनके बारे में सोचें और विचार करें, हो सकता है कि वे जागृत हो जाएं और उन्हें स्वीकार कर लें।आइये अब सूरए अनआम की आयत संख्या 48 और 49 की तिलावत सुनते हैंوَمَا نُرْسِلُ الْمُرْسَلِينَ إِلَّا مُبَشِّرِينَ وَمُنْذِرِينَ فَمَنْ آَمَنَ وَأَصْلَحَ فَلَا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَ (48) وَالَّذِينَ كَذَّبُوا بِآَيَاتِنَا يَمَسُّهُمُ الْعَذَابُ بِمَا كَانُوا يَفْسُقُونَ (49) और हम पैग़म्बरों को केवल शुभ सूचना देने वाले और डराने वाले बनाकर भेजते हैं, तो जो कोई ईमान ले आए और स्वयं में सुधार कर ले तो ऐसे लोगों के लिए भय नहीं है और न वे दुखी होंगे। (6:48) और जिन लोगों न हमारी निशानियों को झुठलाया तो (हमारा) दंड उन्हें, उनकी अवज्ञा के कारण अपनी लपेट में ले लेगा। (6:49)पिछली आयतों में कहा गया है कि पैग़म्बर को, अनेकेश्वरवादियों को उनके अंत से डराना चाहिए ताकि वे जागृत हो जाएं। यह आयतें कहती हैं कि पैग़म्बरों को भेजने का मूल लक्ष्य, लोगों को नरक से डराना और स्वर्ग की शुभ सूचना देना है ताकि व्यवहारिक और वैचारिक पथभ्रष्टता को रोका जा सके। पैग़म्बर लोगों को अच्छे कर्मों का निमंत्रण और उन्हें कल्याण और ईश्वरीय पारितोषिक की शुभ सूचना देते थे।पैग़म्बरों की शुभ सूचनाओं में से एक यह है कि ईमान और अच्छे कर्म करने वाले, उस भय और दुख से दूर हैं जो संसार का प्रेम रखने वालों को, सांसारिक मामलों की समाप्ति की ओर से सताता रहता है। ईमान वाले सदैव सुदृढ़ मनोबल के साथ, प्राकृतिक समस्याओं और वर्चस्ववादी मानवीय शक्तियों का मुक़ाबला करते हैं। परंतु इसके विपरीत सत्य और वास्तविकताओं को झुठलाने वाले काफ़िर सदैव अवज्ञा, उद्दडंता और पाप करते रहते हैं कि जिसका परिणाम संसार में ईश्वर के गुप्त व प्रत्यक्ष दंड और प्रलय में कड़ा बदला है।इन आयतों से हमने सीखा कि पैग़म्बरों का काम लोगों का मार्गदर्शन करना है न कि सही बात को स्वीकार करने केलिए उन्हें विवश करना। यही कारण है कि कुछ लोग ईमान ले आते हैं जबकि कुछ काफ़िर हो जाते हैं।प्रशिक्षण, भय और आशा के दो आधारों पर होना चाहिए ताकि लोग घमंड या निराशा में ग्रस्त न हो जाएं।न कर्म के बिना ईमान का कोई लाभ है और न ही ईमान के बिना कर्म लाभदायक हो सकता है।मानसिक स्वास्थ्य, ईश्वर पर ईमान की छाया में ही संभव है। आज के काल में भी मनुष्य के मानस और आत्मा के महत्त्वपूर्ण रोग अर्थात भय और निराशा, ईश्वर और ईमान से दूरी के परिणाम हैं।