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    सूरए अनआम, आयतें 50-52, (कार्यक्रम 205)

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    आइये सूरए अनआम की 50वीं आयत की तिलावत सुनते हैंقُلْ لَا أَقُولُ لَكُمْ عِنْدِي خَزَائِنُ اللَّهِ وَلَا أَعْلَمُ الْغَيْبَ وَلَا أَقُولُ لَكُمْ إِنِّي مَلَكٌ إِنْ أَتَّبِعُ إِلَّا مَا يُوحَى إِلَيَّ قُلْ هَلْ يَسْتَوِي الْأَعْمَى وَالْبَصِيرُ أَفَلَا تَتَفَكَّرُونَ (50)(हे पैग़म्बर!) कह दीजिए कि मैं यह दावा नहीं करता कि मेरे पास ईश्वर के ख़ज़ाने हैं। मैं यह (भी) नहीं कहता कि मुझे ग़ैब अर्थात ईश्वर का गुप्त ज्ञान आता है और न ही मैं यह दावा करता हूं कि मैं फ़रिश्ता हूं। मैं केवल उसका आज्ञापालन करता हूं जो कुछ मुझे ईश्वरीय संदेश, वहि द्वारा आदेश दिया जाता है। (हे पैग़म्बर!) कह दीजिए कि क्या अंधा और देखने वाला, समान हो सकता है? क्या तुम चिंतन नहीं करते? (6:50)बहुत से लोग सोचते हैं कि केवल वह व्यक्ति पैग़म्बर हो सकता है जिसके हाथों से पूरे संसार का संचालन हो और वह अपने गुप्त ज्ञान से सभी समस्याओं का समाधान कर सकता हो। वो जो चाहे, तुरंत हो जाए, और जो कोई उसका विरोध करे उसका विनाश हो जाए। अतः इस आयत में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम को आदेश दिया गया है कि वे लोगों को बताएं कि एक पैग़म्बर का दायित्व कुछ और है। वो लोगों को ईश्वर की ओर बुलाने और उन्हें ईश्वरीय संदेश सुनाने का दायित्व रखता है। उसके पास गुप्त ज्ञान नहीं होता कि लोग ये आशा रखें कि वो उनके अतीत और भविष्य की बातें बताएगा, और न ही वह फ़रिश्ता होता है कि, उसे भोजन और अन्य वस्तुओं की आवश्यकता न हो।पैग़म्बर जो चमत्कार दिखाते हैं वह भी ईश्वर की इच्छा और इरादे के परिप्रेक्ष्य में होते हैं न कि लोगों की इच्छाओं और मांगों के अनुसार, कि जो कुछ वे चाहें, उसे पूरा करना, पैग़म्बरों का दायित्व हो।अंत में आयत लोगों से कहती है कि वे देखी व सुनी हुई बातों पर भरोसा करने और विचित्र बातें देखने की आशा रखने के स्थान पर अपनी बुद्धि से काम लें और विचार तथा चिंतन द्वारा सत्य को स्वीकार करें क्योंकि यदि चिंतन न हो तो हठधर्मी व्यक्ति देखने के बाद भी स्वीकार नहीं करता और अंधों की भांति इन्कार कर देता है।इस आयत से हमने सीखा कि लोगों के साथ पैग़म्बरों का व्यवहार सत्यतापूर्ण होता है, यदि उनमें कोई शक्ति मौजूद नहीं होती तो वे उसकी घोषणा कर देते हैं।अतिशयोक्ति और अंधविश्वास से मुक़ाबला करना, पैग़म्बरों के कार्यक्रम में शामिल है।आइये अब सूरए अनआम की आयत संख्या 51 की तिलावत सुनते हैंوَأَنْذِرْ بِهِ الَّذِينَ يَخَافُونَ أَنْ يُحْشَرُوا إِلَى رَبِّهِمْ لَيْسَ لَهُمْ مِنْ دُونِهِ وَلِيٌّ وَلَا شَفِيعٌ لَعَلَّهُمْ يَتَّقُونَ (51)(हे पैग़म्बर!) आप इस (क़ुरआन) द्वारा उन लोगों को डराइये जिन्हें अपने पालनहार के पास पहुंचने का भय है (क्योंकि) ईश्वर के अतिरिक्त उनके लिए न कोई सहायक है और न ही कोई सिफ़ारिश करने वाला, शायद उनमें ईश्वर का भय पैदा हो जाए। (6:51)पिछली आयत में ये कहने के पश्चात कि देखने वाले और अंधे एकसमान नहीं होते और सत्य स्वीकार करने के लिए सोच विचार तथा चिंतन आवश्यक है, इस आयत में ईश्वर कहता है। यद्यपि पैग़म्बर सभी लोगों को सत्य की ओर बुलाते हैं और उनके बुरे कर्मों के परिणामों से डराते हैं, परंतु सभी लोग स्वीकार नहीं करते बल्कि केवल वही लोग डरते हैं जिनकी आत्मा सत्य स्वीकार करने के लिए तैयार हो या जो कम से कम इस बात को मानते हों कि एक दिन हिसाब-किताब होगा और उन्हें अपने कर्मों का जवाब देना होगा।आगे चलकर आयत कहती है कि प्रलय में मनुष्य का एकमात्र सहारा, ईश्वर है, और कोई भी वस्तु या व्यक्ति मनुष्य को मुक्ति नहीं दे सकता। यह दृष्टिकोण मनुष्य को पाप से दूर रखता है और उसके भीतर ईश्वर का भय पैदा करता है।इस आयत से हमने सीखा कि केवल सहानुभूति रखने वाले प्रशिक्षकों का अस्तित्व और प्रशिक्षण के उचित कार्यक्रम पर्याप्त नहीं हैं बल्कि सत्य स्वीकार करने और उसे खोजने की भावना रखने वाले मनुष्य भी आवश्यक हैं।प्रलय पर आस्था और उस दिन सबके साथ न्याय होने पर ईमान, ईश्वर से भय का कारण है।आइये अब सूरए अनआम की 52वीं आयत की तिलावत सुनते हैंوَلَا تَطْرُدِ الَّذِينَ يَدْعُونَ رَبَّهُمْ بِالْغَدَاةِ وَالْعَشِيِّ يُرِيدُونَ وَجْهَهُ مَا عَلَيْكَ مِنْ حِسَابِهِمْ مِنْ شَيْءٍ وَمَا مِنْ حِسَابِكَ عَلَيْهِمْ مِنْ شَيْءٍ فَتَطْرُدَهُمْ فَتَكُونَ مِنَ الظَّالِمِينَ (52)(हे पैग़म्बर!) जो लोग सुबह शाम अपने पालनहार को पुकारते हैं और केवल उसी को प्रसन्न करना चाहते हैं, उन्हें अपने पास से मत भगाइये। न उनके हिसाब का दायित्व आप पर है और न आपके हिसाब का दायित्व उन पर है कि आप उन्हें अपने पास से भगा दें और इस प्रकार अत्याचारियों में से हो जाएं। (6:52)इस्लामी इतिहास में वर्णित है कि मक्का नगर के कुछ धनवान अनेकेश्वरवादियों ने पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को प्रस्ताव दिया कि यदि वे अपने पास से अम्मारे यासिर और बिलाले हब्शी जैसे दरिद्रों को हटा दें तो वे इस्लाम स्वीकार कर लेंगे, इस प्रकार अन्य मुसलमानों की आर्थिक सहायता भी होगी। उसी समय ईश्वर ने ये आयत भेजी और पैग़म्बर को संबोधित करते हुए कहा कि अन्य लोगों को आकृष्ट करने के लिए कदापि सच्चे ईमान वालों को अपने से दूर मत कीजिए कि यह एक प्रकार का अत्याचार है।वस्तुतः यह आयत समाज में हर प्रकार के भेदभाव को रद्द करते हुए उसे धर्म की आत्मा के विपरीत बताती है कि जो समानता और भाईचारा है। किसी को भी किसी पर श्रेष्ठता प्राप्त नहीं है और धन दौलत तथा शक्ति व सत्ता के कारण किसी गुट को विशिष्टता नहीं दी जा सकती। हर व्यक्ति का हिसाब किताब ईश्वर के ज़िम्मे है और वह अपने ज्ञान के आधार पर काम करता है। ईश्वर के द्वारा बदला दिए जाने का आधार ईमान और भला कर्म है न कि धन दौलत और पद तथा शक्ति।इस आयत से हमने सीखा कि निष्ठावान और संघर्षकर्ता लोगों को अपने पास बचाए रखना, चाहे वे दरिद्र ही क्यों न हों, काफ़िर धनवानों को आकृष्ट करने से बेहतर है।इस्लाम हर प्रकार के भेदभाव, जातीयता, विशिष्टताप्रेम और समाज के वर्गीकरण से मुक़ाबले का धर्म है।लोगों के कर्मों का हिसाब केवल ईश्वर के हाथ में है, यहां तक कि पैग़म्बर भी दूसरों के कर्मों के उत्तरदायी नहीं हैं, अतः हमें किसी के बारे में यह कहने का अधिकार नहीं है कि वह स्वर्ग में जाएगा या नरक में।वह दुआ और प्रार्थना मूल्यवान है जो ईश्वर का सामिप्य प्राप्त करने और उसे प्रसन्न करने की भावना से की गई हो। केवल कर्म काफ़ी नहीं है बल्कि उसकी भावना महत्त्वपूर्ण है।