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    सूरए अनआम, आयतें 53-56, (कार्यक्रम 206)

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    आइये सूरए अनआम की 53वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।وَكَذَلِكَ فَتَنَّا بَعْضَهُمْ بِبَعْضٍ لِيَقُولُوا أَهَؤُلَاءِ مَنَّ اللَّهُ عَلَيْهِمْ مِنْ بَيْنِنَا أَلَيْسَ اللَّهُ بِأَعْلَمَ بِالشَّاكِرِينَ (53)और इस प्रकार हमने उनमें से कुछ की कुछ दूसरों के साथ परीक्षा ली ताकि वे कहें कि क्या यही लोग हैं जिन्हें ईश्वर ने हमारे बीच (से चुना है और इन पर) उपकार किया? क्या ईश्वर, कृतज्ञ लोगों को बेहतर ढंग से पहचानने वाला नहीं है? (6:53)हमने कहा था कि अनेक लोगों को अपेक्षा थी कि पैग़म्बर फ़रिश्तों की भांति होंगे और उन्हें उन बातों की आवश्यकता नहीं होगी जो सामान्य लोगों के लिए आवश्यक हैं। उनकी दृष्टि में पैग़म्बरों को भविष्यवाणी करने वालों की भांति लोगों के अतीत और भविष्य की सूचना देनी चाहिए और सदैव चमत्कार जैसे विचित्र काम करने चाहिए।यह आयत भी लोगों की एक अन्य अपेक्षा की ओर संकेत करते हुए कहती है। धन संपत्ति की दृष्टि से समाज में अपना एक ऊंचा स्थान रखने वाले कुछ लोगों ने जब पैग़म्बर का अत्यंत सादा और हर प्रकार के ऐश्वर्य से दूर, जीवन देखा तो कहने लगेः क्या हम लोगों के होते हुए, ईश्वर इस प्रकार के लोगों के पास वहि भेजेगा? यदि वहि आने वाली ही है तो हमें इन पर वरीयता प्राप्त है।इस प्रकार के विचारों के उत्तर में क़ुरआने मजीद कहता है। किसी पर ईश्वरीय संदेश वहि आने की शर्त धन, संपत्ति और पद नहीं है कि तुम स्वयं को उसके लिए अधिक उपयुक्त समझो, बल्कि उसकी शर्त योग्यता और क्षमता है और इन बातों को ईश्वर, अपने बंदों से कहीं अधिक जानता है। उसे भलिभांति ज्ञात है कि किसमें विशेषताएं मौजूद हैं।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वरीय परीक्षा का एक मार्ग सामाजिक अंतर है। धनवानों की दरिद्रों के माध्यम से, और दरिद्रों की धनवानों के माध्यम से परीक्षा ली जाती है।कितने ही ऐसे दरिद्र हैं जो ईश्वर के प्रति कृतज्ञ रहते हैं और इसी कृतज्ञता के कारण ईश्वरीय कृपा के पात्र बनते हैं और कितने ही ऐसे धनवान हैं जो धन दौलत के कारण घमंडी और अहंकारी हो जाते हैं तथा अपनी कृतघ्नता के कारण धिक्कार के पात्र बनते हैं।आइये अब सूरए अनआम की आयत नंबर 54 और 55 की तिलावत सुनते हैं।وَإِذَا جَاءَكَ الَّذِينَ يُؤْمِنُونَ بِآَيَاتِنَا فَقُلْ سَلَامٌ عَلَيْكُمْ كَتَبَ رَبُّكُمْ عَلَى نَفْسِهِ الرَّحْمَةَ أَنَّهُ مَنْ عَمِلَ مِنْكُمْ سُوءًا بِجَهَالَةٍ ثُمَّ تَابَ مِنْ بَعْدِهِ وَأَصْلَحَ فَأَنَّهُ غَفُورٌ رَحِيمٌ (54) وَكَذَلِكَ نُفَصِّلُ الْآَيَاتِ وَلِتَسْتَبِينَ سَبِيلُ الْمُجْرِمِينَ (55)और (हे पैग़म्बर!) जब भी आपके पास वे लोग आएं जो हमारी आयतों पर ईमान रखते हैं तो उनसे कहिए सलामुन अलैकुम अर्थात तुम पर शांति हो, तुम्हारे पालनहार ने दया और कृपा को अपने लिए अनिवार्य कर लिया है, तो तुम में से जो कोई अज्ञानता के कारण कोई बुरा कार्य कर बैठे और उसके पश्चात तौबा करके सुधार कर ले तो निसंदेह ईश्वर क्षमाशील और दयावान है। (6:54) और हम इसी प्रकार अपनी निशानियों का सविस्तार वर्णन करते हैं ताकि पापियों का मार्ग स्पष्ट हो जाए। (6:55)ये आयतें पैग़म्बर को आदेश देती हैं कि वे ईमान वाले लोगों को, भले ही उन्होंने पाप किया हो, न केवल अपने से दूर न करें बल्कि बड़े प्रेम व उत्साह से उन्हें स्वीकार करें और उनके लिए शांति की कामना करें तथा तौबा करने की स्थिति में उन्हें ईश्वर की ओर से क्षमा किए जाने की शुभ सूचना दें। मूल रूप से इस्लामी समाज में लोगों का, एक दूसरे से तथा अपने नेता से संबंध, प्रेम और निष्ठा के आधार पर होना चाहिए, जिस प्रकार से कि ईश्वर ने बंदों पर दया व कृपा को आधार बनाया है और वह पापियों तक को क्षमा और तौबा स्वीकार होने की शुभ सूचना देता है। पैग़म्बर का दायित्व है कि लोगों के लिए शांति की कामना करें और उन्हें अपने पास आने दें। इसी प्रकार लोगों का भी दायित्व है कि वे अपने पैग़म्बर को सदैव सलाम किया करें और उन्हें अच्छे शब्दों से याद किया करें।स्वाभाविक है कि जनता और नेता के बीच इस प्रकार का संबंध समाज को हर प्रकार के द्वेष और शत्रुता से दूर रखेगा और पापी भी, समाज से अलग किए जाने के बजाए, तौबा और सुधार की स्थिति में क्षमा के पात्र बनेंगे और उन्हें समाज में स्वीकार किया जाएगा। अलबत्ता ऐसे पापी जिन्होंने अज्ञानता के कारण और अपनी आंतरिक इच्छाओं के बहकावे में आकर पाप किया हो, न कि ऐसे पापी जो जानबूझ कर पाप करते हैं और सदैव अपने पापों पर आग्रह करते रहते हैं।इन आयतों से हमने सीखा कि पैग़म्बर की ज़ियारत अर्थात दर्शन, ईश्वरीय कृपा प्राप्त करने का एक मार्ग है, जो कोई पैग़म्बर के पास पहुंचता है वह उनकी विशेष प्रार्थना का पात्र बनता है।यदि पाप, अज्ञानता और मूर्खता के कारण हो न कि हठधर्म और आग्रह के कारण, तो क्षमा योग्य है।वह तौबा स्वीकार होती है जो प्रायश्चित और ग़लतियों के सुधार के साथ हो।ईश्वर ने अपने लिए दया व कृपा को अनिवार्य कर रखा है परंतु उसकी प्राप्ति का मार्ग, पापों से दूरी और तौबा से ही प्रशस्त होता है।आइये अब सूरए अनआम की 56वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।قُلْ إِنِّي نُهِيتُ أَنْ أَعْبُدَ الَّذِينَ تَدْعُونَ مِنْ دُونِ اللَّهِ قُلْ لَا أَتَّبِعُ أَهْوَاءَكُمْ قَدْ ضَلَلْتُ إِذًا وَمَا أَنَا مِنَ الْمُهْتَدِينَ (56)(हे पैग़म्बर! लोगों से) कह दीजिए कि मुझे उनकी उपासना से रोका गया है जिन्हें तुम अल्लाह को छोड़कर पुकारते हो। और कह दीजिए कि मैं तुम्हारी (अनुचित) इच्छाओं का पालन नहीं कर सकता कि इस स्थिति में मैं पथभ्रष्ट हो जाऊंगा और मार्गदर्शन प्राप्त कर चुके लोगों में नहीं रह सकूंगा। (6:56)पैग़म्बरे इस्लाम की ओर से एकेश्वरवाद के निमंत्रण के मुक़ाबले मे अनेकेश्वरवादी भी उन्हें मूर्तिपूजा का निमंत्रण देते थे और उनसे कहते थे कि वे अपनी बातें छोड़ कर क़ुरैश के पूर्वजों के धर्म की ओर आ जाएं। यह आयत पैग़म्बर से कहती है कि वे अनेकेश्वरवादियों से स्पष्ट रूप से कह दें कि मैं कदापि तुम्हारे धर्म की ओर नहीं आऊंगा। तुम जिनकी पूजा और उपासना करते हो मैं कदापि उनकी उपासना नहीं करूंगा तथा तुम्हारी इस इच्छा को स्वीकार नहीं करूंगा क्योंकि मैं इस काम को मार्गदर्शन से दूरी और पथभ्रष्टता की ओर पतन का कारण समझता हूं।इस आयत से हमने सीखा कि विरोधियों की तर्कहीन मांगों का स्पष्ट रूप से नकारात्मक उत्तर देना चाहिए और विरक्तता की घोषणा करनी चाहिए ताकि हर प्रकार की सांठ-गांठ मार्ग बंद हो जाए।धर्म के प्रचारक को, लोगों की तर्कहीन मांगों को पूरा करने के लिए उनमें शामिल नहीं होना चाहिए।