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    सूरए अनआम, आयतें 57-60, (कार्यक्रम 207)

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    आइये सूरए अनआम की 57वी और 58वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।قُلْ إِنِّي عَلَى بَيِّنَةٍ مِنْ رَبِّي وَكَذَّبْتُمْ بِهِ مَا عِنْدِي مَا تَسْتَعْجِلُونَ بِهِ إِنِ الْحُكْمُ إِلَّا لِلَّهِ يَقُصُّ الْحَقَّ وَهُوَ خَيْرُ الْفَاصِلِينَ (57) قُلْ لَوْ أَنَّ عِنْدِي مَا تَسْتَعْجِلُونَ بِهِ لَقُضِيَ الْأَمْرُ بَيْنِي وَبَيْنَكُمْ وَاللَّهُ أَعْلَمُ بِالظَّالِمِينَ (58)(हे पैग़म्बर! अनेकेश्वरवादियों से) कह दीजिए कि मेरे पास अपने पालनहार का खुला हुआ तर्क है जिसे तुमने झुठलाया है। मेरे पास वह (दंड) नहीं है जिसकी तुम्हें जल्दी है। आदेश केवल ईश्वर ही के हाथ में है जो सत्य को बयान करता है वही सत्य और असत्य के बीच सबसे अच्छा निर्णय करने वाला है। (6:57) (हे पैग़म्बर) कह दीजिए कि यदि मेरे पास वह (दंड) होता जिसकी तुम्हें जल्दी है तो निसंदेह मेरे और तुम्हारे बीच फ़ैसला हो चुका होता और ईश्वर अत्याचारियों से, सबसे अधिक अवगत है। (और जब उचित समझेगा, उन्हें दंडित करेगा।) (6:58)पिछली आयतों में कहा गया कि अनेकेश्वरवादियों ने पैग़म्बर से कहा कि वे उनके धर्म पर आ जाएं, यह आयत पैग़म्बर को संबोधित करते हुए कहती है कि वे उनसे कह दें कि तुम्हारी बात तर्कसंगत नहीं है कि मैं उसे स्वीकार कर लूं, परंतु मैं अपने पालनहार की ओर से जो क़ुरआन पेश करता हूं वह बड़े ही स्पष्ट और पूर्ण ढंग से सत्य और असत्य को अलग करने वाला है परंतु तुमने उसे स्वीकार नहीं किया और झुठला दिया और न केवल झुठलाया बल्कि मुझसे कहा कि यदि तुम ईश्वर के पैग़म्बर हो तो हमारे लिए दंड भेजो, जबकि जिस दंड की तुम्हें जल्दी है वह मेरे हाथ में नहीं बल्कि ईश्वर के नियंत्रण में है और ईश्वर ने सत्य का तुम्हारे लिए वर्णन करके उसे असत्य से अलग कर दिया है।इसके अतिरिक्त यदि दंड भेजना मेरे हाथ में होता तो अब तक तुम्हारा अस्तित्व बाक़ी न बचता। यह तो ईश्वर की दया और कृपा है कि वह काफ़िरों और अनेकेश्वरवादियों को मोहलत देता है ताकि उनके पास वापसी का मार्ग रहे। यही कारण है कि वह उन्हें दंडित करने में जल्दी नहीं करता।इन आयतों से हमने सीखा कि पैग़म्बरों का निमंत्रण तर्क के आधार पर होता है न कि विचारों और अंधविश्वासों के आधार पर। जबकि इन्कार करने वालों का तर्क आंतरिक इच्छाओं पर आधारित होता है।पैग़म्बर का दायित्व धर्म का प्रचार करना है न कि काफ़िरों और पापियों को दंडित करना।ईश्वर की ओर से दंड में विलम्ब पर काफ़िरों को घमंड नहीं करना चाहिए और यह नहीं सोचना चाहिए कि उन्हें भुला दिया गया है।आइये अब सूरए अनआम की 59वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।وَعِنْدَهُ مَفَاتِحُ الْغَيْبِ لَا يَعْلَمُهَا إِلَّا هُوَ وَيَعْلَمُ مَا فِي الْبَرِّ وَالْبَحْرِ وَمَا تَسْقُطُ مِنْ وَرَقَةٍ إِلَّا يَعْلَمُهَا وَلَا حَبَّةٍ فِي ظُلُمَاتِ الْأَرْضِ وَلَا رَطْبٍ وَلَا يَابِسٍ إِلَّا فِي كِتَابٍ مُبِينٍ (59)गुप्त ख़ज़ाने केवल ईश्वर ही के पास हैं जिन्हें उसके अतिरिक्त कोई नहीं जानता। और जो कुछ धरती और समुद्र में है वह उसका जानने वाला है और (पेड़ से) जो पत्ता भी गिरता है उसे उसका ज्ञान होता है। धरती के अंधकारों में कोई दाना और कोई गीली या सूखी (वस्तु) ऐसी नहीं है जो (ईश्वर की) स्पष्ट किताब में न हो। (6:59)पिछली आयतों में अनेकेश्वरवादियों के उत्तर में यह कहने के पश्चात कि पूरा ब्रह्मांड केवल ईश्वर ही के आदेश से चलता है, इस आयत में क़ुरआन कहता है, धरती और आकाशों में जो कुछ तुम्हारी दृष्टि से छिपा हुआ है, और जो कुछ तुम्हारी दृष्टि में महत्त्वहीन है, जैसे पेड़ से किसी पत्ते का गिरना या धरती से किसी दाने का उगना, ये सबके सब ईश्वर के निकट अत्यंत स्पष्ट है और हर एक में कोई न कोई तत्वदर्शिता है।ईश्वर इस संसार के प्रत्यक्ष और परोक्ष से अवगत है। सभी गुप्त बातों का नियंत्रण उसके पास है। पूरे ब्रह्मांड के सभी मामले ईश्वर की सृष्टि और युक्ति की किताब में दर्ज और अंकित है। और स्पष्ट तथा तर्कसंगत सिद्धांतों के आधार पर पूरे ब्रह्मांड का कारोबार चलाया जाता है। जो ब्रह्मांड, ईश्वरीय ज्ञान के अंतर्गत अस्तित्व में आया है और ये कभी भी ईश्वर के ज्ञान से बाहर नहीं निकलत। सभी जीव जंतुओं की मृत्यु और उनका जीवन, उसकी इच्छा के बिना संभव नहीं है और उसके ज्ञान के बिना व्यवहारिक नहीं होता।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर को न केवल पूरे ब्रह्मांड की मूल बातों और सिद्धांतों का ज्ञान है बल्कि हर छोटी से छोटी बात भी उसके ज्ञान में है। गुप्त ज्ञान या ग़ैब, ईश्वर से विशेष है और उसकी इच्छा के बिना किसी को भी ग़ैब का ज्ञान नहीं हो सकता।पूरा ब्रह्मांड एक पूर्णतः संपूर्ण और पूर्वनियोजित कार्यक्रम के अंतर्गत आगे बढ़ रहा है और कोई भी वस्तु ईश्वर के नियंत्रण से बाहर नहीं है।आइये अब सूरए अनआम की 60वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।وَهُوَ الَّذِي يَتَوَفَّاكُمْ بِاللَّيْلِ وَيَعْلَمُ مَا جَرَحْتُمْ بِالنَّهَارِ ثُمَّ يَبْعَثُكُمْ فِيهِ لِيُقْضَى أَجَلٌ مُسَمًّى ثُمَّ إِلَيْهِ مَرْجِعُكُمْ ثُمَّ يُنَبِّئُكُمْ بِمَا كُنْتُمْ تَعْمَلُونَ (60)और वही ईश्वर है जो रात में (सोते समय) तुम्हें (एक प्रकार की) मृत्यु दे देता है और जो कुछ तुम दिन में कर चुके हो उससे अवगत है। फिर वह तुम्हें दिन में उठा देता है ताकि (जीवन का) निर्धारित समय पूरा हो सके। इसके बाद तुम सबको उसी की ओर लौटना है (और) फिर वह तुम्हें, तुम्हारे कर्मों से अवगत कराएगा। (6:60)पिछली आयेतों में यह कहने के पश्चात कि पूरे ब्रह्मांड की हर वस्तु पूर्ण रूप से ईश्वर के नियंत्रण में है, इस आयत में क़ुरआने मजीद कहता हैः वो ईश्वर जो धरती से उगने वाले दानों और पेड़ों से गिरने वाले पत्तों से अवगत है वो दिन और रात के किसी भी भाग में किए गये तुम्हारे हर प्रकार के कर्मों से भी भलिभांति अवगत है और प्रलय के दिन तुम्हें उनकी ख़बर देगा।ईश्वर न केवल तुम्हारे कर्मों से अवगत है बल्कि दिन और रात भी उसी के नियंत्रण में हैं। वही तुम्हें सुलाता है और वही तुम्हें जगाता है और ये प्रक्रिया जारी है ताकि तुम अपनी आयु पूरी कर सको।ईश्वर ने इस आयत में नींद को मृत्यु बताकर लोगों को ये समझाने का प्रयास किया है कि जिस प्रकार वो तुम्हें संसार में नींद से जगाता है, तुम स्वयं अपने आपको नहीं जगा सकते, उसी प्रकार प्रलय में भी तुम्हें मृत्यु के पश्चात उठाना उसके लिए अत्यंत सरल है। इस प्रकार ईश्वर ने मृत्यु के बाद उठाए जाने का उदाहरण प्रतिदिन हर मनुष्य के जीवन में रख दिया है।इस आयत से हमने सीखा कि क़ुरआने मजीद की दृष्टि में नींद, मौत और जाग उठना, प्रलय की एक निशानी है।हमें स्वयं को, प्रलय में अपने कर्मों का उत्तर देने के लिए तैयार करना चाहिए और अपनी सीमित आयु से भरपूर लाभ उठाना चाहिए।