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    सूरए अनआम, आयतें 61-65, (कार्यक्रम 208)

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    आइये सूरए अनआम की 61वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।وَهُوَ الْقَاهِرُ فَوْقَ عِبَادِهِ وَيُرْسِلُ عَلَيْكُمْ حَفَظَةً حَتَّى إِذَا جَاءَ أَحَدَكُمُ الْمَوْتُ تَوَفَّتْهُ رُسُلُنَا وَهُمْ لَا يُفَرِّطُونَ (61)और वही (ईश्वर) है जो अपने बंदों पर वर्चस्व रखता है और तुम सबके लिए रक्षक (फ़रिश्ते) भेजता है, यहां तक कि जब तुम से किसी की मृत्यु (का समय) आ जाता है तो हमारे फ़रिश्ते उसकी जान ले लेते हैं और वो (अपने काम में) कोई कमी या ढिलाई नहीं करते। (6:61)इससे पूर्व हमने कहा था कि मनुष्य का सोना और जागना, ईश्वर के हाथ में है तथा ईश्वर ने हर एक के लिए एक समय निर्धारित किया है जिसे उसे बिताना ही होता है। इस आयत में क़ुरआने मजीद कहता है कि तुम्हारे जीवन और मृत्यु का मामला ऐसे फ़रिश्तों के हाथ में है जिन्हें ईश्वर ने नियुक्त किया है।फ़रिश्तों का एक गुट दुर्घटनाओं से मनुष्य की रक्षा करता है जबकि एक अन्य गुट उसके कर्मों को लिखता जाता है। इसी प्रकार मृत्यु के समय, जान लेने का दायित्व रखने वाले फ़रिश्ते कार्यवाही करते हैं और क़ुरआने मजीद के शब्दों में वे अपने काम में कोई कमी या ढिलाई नहीं करते, अर्थात न एक क्षण की जल्दी करते हैं न एक क्षण की देरी करते हैं।यह आयत याद दिलाती है कि संसार के सभी मनुष्यों पर ईश्वर का पूर्ण नियंत्रण और वर्चस्व है और उसके मुक़ाबले में मनुष्य के पास किसी भी प्रकार के प्रतिरोध की क्षमता नहीं है।इस आयत से हमने सीखा कि हमारे ऊपर ईश्वर का पूर्ण नियंत्रण है और यदि उसने हमें स्वतंत्र रखा हो तो यह उस मोहलत के कारण है जो उसकी कृपा की निशानी है।ईश्वर ने संसार के संचालन और लोगों तथा जीव जन्तुओं के देखभाल का दायित्व फ़रिश्तों को दे रखा है।आइये अब सूरए अनआम की 62वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।ثُمَّ رُدُّوا إِلَى اللَّهِ مَوْلَاهُمُ الْحَقِّ أَلَا لَهُ الْحُكْمُ وَهُوَ أَسْرَعُ الْحَاسِبِينَ (62)फिर सब ईश्वर की ओर पलटाए जाएंगे जो उनका वास्तविक स्वामी है। जान लो कि फ़ैसलों का अधिकार केवल उसी को है और वह सबसे जल्दी फ़ैसला करने वाला है। (6:62)यह आयत संसार में मनुष्य की मृत्यु और प्रलय में उसकी उपस्थिति की ओर संकेत करते हुए कहती है। मृत्यु के पश्चात सभी मनुष्य ईश्वर की ओर लौटेंगे ताकि उन्होंने जो कुछ संसार में किया है उसके आधार पर उनका हिसाब करके उन्हें स्वर्ग या नरक में डाला जाए।यहां पर यह प्रश्न मन में आता है कि पूरे मानव इतिहास में आने वाले इतने सारे मनुष्यों का हिसाब किताब किस प्रकार संभव है? उत्तर स्पष्ट है, क्योंकि सभी के कर्मों को पहले ही लिखा जा चुका है और उनका अंत स्पष्ट है। प्रलय में प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्मों से अवगत होगा और कर्मों के आधार पर उसे स्वर्ग या नरक में भेजा जाएगा।पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम और उनके परिजनों के कथनों में आया है कि ईश्वर एक ही समय में सबका हिसाब करेगा, जिस प्रकार से कि वो एक ही समय में सबको रोज़ी देता है और कोई उसे नहीं देखता।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर ही को लोगों पर शासन और फ़ैसले का अधिकार है क्योंकि वो स्वामी है और दूसरे उसके बंदे।वास्तविक स्वामी केवल ईश्वर है और अन्य लोगों को मनुष्यों पर स्वामित्व प्राप्त नहीं है, सिवाय इसके कि स्वयं ईश्वर ने उन्हें स्वामित्व दिया हो जैसे माता-पिता, पैग़म्बर और ईश्वरीय प्रतिनिधि।आइये अब सूरए अनआम की आयत नंबर 63 और 64 की तिलावत सुनते हैं।قُلْ مَنْ يُنَجِّيكُمْ مِنْ ظُلُمَاتِ الْبَرِّ وَالْبَحْرِ تَدْعُونَهُ تَضَرُّعًا وَخُفْيَةً لَئِنْ أَنْجَانَا مِنْ هَذِهِ لَنَكُونَنَّ مِنَ الشَّاكِرِينَ (63) قُلِ اللَّهُ يُنَجِّيكُمْ مِنْهَا وَمِنْ كُلِّ كَرْبٍ ثُمَّ أَنْتُمْ تُشْرِكُونَ (64)(हे पैग़म्बर! अनेकेश्वरवादियों से) कह दीजिए कि कौन तुम्हें धरती और समुद्र के अंधकारों से मुक्ति दिलाने वाला है, जिसे तुम गिड़गिड़ाकर और छुपकर पुकारते हो (और कहते हो कि) यदि वह हमें इस (अंधकार) से मुक्ति दे देगा तो हम कृतज्ञों में से हो जाएंगे। (6:63) (हे पैग़म्बर! इनसे) कह दीजिए कि ईश्वर की तुम्हें इन अंधकारों और हर मुसीबत से मुक्ति देता है परंतु फिर भी तुम किसी को उसका समकक्ष ठहराते हो। (6:64)चूंकि मनुष्य अंधकार से डरता है उसे भयावह तथा आतंकित करने वाला समझता है अतः इस आयत में क़ुरआने मजीद कहता है। बहुत से अवसरों पर तुम भयभीत और आतंकित हो जाते हो, चाहे तुम उस समय धरती पर हो या समुद्र में। ऐसे समय में तुम अन्य लोगों की ओर से पूर्णतः निराश हो जाते हो, सांसारिक मामले तुम्हारी मुक्ति का कोई मार्ग पेश नहीं करते, तब तुम प्रकृति के आधार पर ईश्वर की ओर उन्मुख होते हो और उससे सहायता मांगते हो। कभी मन ही मन में कहते हो कभी अपनी बात ज़बान पर ले आते हो, यहां तक कि तुम ईश्वर को वचन देते हो कि यदि मेरी कठिनाई का समाधान हो जाए और मुझे मुक्ति मिल जाए तो मैं इसपर कृतज्ञ रहूंगा और कुफ़्र छोड़ दूंगा।परंतु अनुभवों से पता चलता है कि ईश्वर ने जितनी बार भी मनुष्य को मुक्ति दी है, उसने कठिनाई से निकलने के पश्चात ईश्वर को भुला दिया है और दूसरों की शरण में चला गया है मानो वह उन्हें सृष्टि के संचालन में ईश्वर के समकक्ष के रूप में देखता है।इन आयतों से हमने सीखा कि जीवन की कठिनाइयों और समस्याओं का एक परिणाम, ईश्वर की ओर मनुष्य का उन्मुख होना तथा कुफ़्र व अनेकेश्ववाद से दूर होना है, जिस प्रकार से सुख और ऐश्वर्य, ईश्वर तथा उसकी अनुकंपाओं को भुलाने का कारण बनता है।मनुष्य, ईश्वर के संबंध में अपने वादों के प्रति बेवफ़ा है और यह बुरी अकृतज्ञता है।आइये अब सूरए अनआम की आयत नंबर 65 की तिलावत सुनेंقُلْ هُوَ الْقَادِرُ عَلَى أَنْ يَبْعَثَ عَلَيْكُمْ عَذَابًا مِنْ فَوْقِكُمْ أَوْ مِنْ تَحْتِ أَرْجُلِكُمْ أَوْ يَلْبِسَكُمْ شِيَعًا وَيُذِيقَ بَعْضَكُمْ بَأْسَ بَعْضٍ انْظُرْ كَيْفَ نُصَرِّفُ الْآَيَاتِ لَعَلَّهُمْ يَفْقَهُونَ (65)(हे पैग़म्बर!) कह दीजिए कि केवल ईश्वर ही इस बात में सक्षम है कि तुम्हारे ऊपर से या पैरों के नीचे से दंड भेज दे या तुम्हें गुट-2 करके एक दूसरे से टकरा दे और तुम्हें लड़ाई का स्वाद चखा दे। देखिए कि हम किस प्रकार अपनी आयतों को उलट-पलट कर बयान करते हैं कि शायद यह लोग (सोच विचार करके) समझ जाएं। (6:65)पिछली आयत में, मनुष्य की कठिनाइयों के समाधान में ईश्वर की दया व कृपा का वर्णन करने के पश्चात इस आयत में क़ुरआन ईश्वर के प्रकोप की ओर संकेत करते हुए कहता है। ईश्वरीय दया व प्रकोप एक साथ है, यदि तुम उसे पुकारों और उसका सामिप्य प्राप्त करो तो उसके प्रेम व दया के पात्र बनोगे परंतु यदि तुम उससे मुंह मोड़ लोग और अनेकेश्ववाद की ओर जाओ तो ईश्वर का दंड और प्रकोप तुम्हें आ लेगा और यह दंड ऊपर, नीचे और दाएं बाएं हर ओर से आएगा।एकेश्वरवाद से दूरी, तुम्हारी एकता को छीनकर और तुम्हें एक दूसरे से दूर करके, तुम्हारे बीच मतभेद उत्पन्न कर देती है, जिसके परिणाम स्वरूप युद्ध और रक्तपात होता है। जिस प्रकार से कि ईश्वर और उसके आदेशों से दूरी समाज को इस प्रकार की कठिनाइयों में डाल देती है जिसका सबसे स्पष्ट उदाहरण समाज का वर्गीकरण है और धनवान, सत्ता अपने हाथ में लेकर दरिद्रों को कुचलते हैं जबकि दरिद्र, ग़रीबी से मुक्ति के लिए विद्रोह और आंदोलनों का सहारा लेकर धनवानों की नींद उड़ा देते हैं।आज हम देख रहे हैं कि जो समाज एकेश्वरवाद के मार्ग से विचलित हो गये हैं वे ऊपरी वर्गों के अत्याचारों में भी ग्रस्त हैं और निचले वर्ग की दायित्वहीनता का भी शिकार हैं। स्वार्थ ने सत्ता, शक्ति और धन को अपनी सेवा में लेकर समाज को भीतर से फूट का शिकार बना दिया है।इस आयत से हमने सीखा कि हमें ईश्वर की शक्ति को भूलना और अपनी शक्ति पर घमंड नहीं करना चाहिए क्योंकि यदि ईश्वर का प्रकोप आ जाए तो किसी में भी उसे सहन करने की शक्ति नहीं है।फूट, अनेकेश्वरवाद का कुपरिणाम है कि जो समाज की व्यवस्था को बिगाड़कर युद्ध तथा रक्तपात की भूमि समतल करता है।