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    सूरए अनआम, आयतें 66-70, (कार्यक्रम 209)

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    आइये सूरए अनआम की आयत नंबर 66 और 67 की तिलावत सुनते हैं।وَكَذَّبَ بِهِ قَوْمُكَ وَهُوَ الْحَقُّ قُلْ لَسْتُ عَلَيْكُمْ بِوَكِيلٍ (66) لِكُلِّ نَبَإٍ مُسْتَقَرٌّ وَسَوْفَ تَعْلَمُونَ (67)(हे पैग़म्बर!) आपकी जाति ने इस क़ुरआन को झुठलाया जबकि यह सत्य (कथन है) उनसे कह दीजिए कि मैं तुम्हारे (ईमान लाने का) उत्तरदायी नहीं हूं। (6:66) (ईश्वर ने तुम्हें जो कुछ दिया है) उसकी हर वस्तु के लिए समय निर्धारित है और तुम सब शीघ्र ही समझ जाओगे। (6:67)इससे पहले हमने कहा था कि पैग़म्बर, लोगों को ईश्वरीय आदेशों के विरोध से रोकते थे, और संसार तथा प्रलय में उसके ख़तरनाक परिणामों की ओर से उन्हें चेतावनी देते थे। ये आयतें कहती हैं कि हे पैग़म्बर! क़ुरैश जाति आपकी इन बातों को स्वीकार नहीं करती और प्रलय का इन्कार करती है कि जो सत्य है और क़ुरआन सदैव उसकी ओर संकेत करता है। आप उनसे कह दीजिए कि मेरा दायित्व केवल ईश्वर का संदेश पहुंचाना है न कि ईमान लाने पर विवश करना। अब इसका निर्णय तुम्हें करना है कि तुम मेरी बात को स्वीकार करते हो या उसे रद्द कर देते हो।आगे चलकर आयत कहती है कि दंड के संबंध में जो वस्तु ईश्वर या उसके पैग़म्बर ने तुम्हें दी है वह अपने निर्धारित समय पर होकर रहेगी और तुम शीघ्र ही उसे देखोगे तो इतनी जल्दी मत करो और यह न सोचो कि आसमानी वास्तविकता का इन्कार करते ही तुम पर दंड और प्रकोप आ जाएगा, ऐसा नहीं है क्योंकि ईश्वर सदैव अपने बंदों को अवसर देता है ताकि वापसी का मार्ग खुला रहे।इन आयतों से हमने सीखा कि जो पैग़म्बर की सत्यता को समझने के बावजूद उसका इन्कार करे उसे कड़े परिणाम की प्रतीक्षा में रहना चाहिए।विरोधियों के झुठलाने या इन्कार करने से क़ुरआन की सत्यता कम नहीं होती चाहे विरोधी कितने ही अधिक हों।आइये अब सूरए अनआम की आयत नंबर 68 की तिलावत सुनते हैं।وَإِذَا رَأَيْتَ الَّذِينَ يَخُوضُونَ فِي آَيَاتِنَا فَأَعْرِضْ عَنْهُمْ حَتَّى يَخُوضُوا فِي حَدِيثٍ غَيْرِهِ وَإِمَّا يُنْسِيَنَّكَ الشَّيْطَانُ فَلَا تَقْعُدْ بَعْدَ الذِّكْرَى مَعَ الْقَوْمِ الظَّالِمِينَ (68)(हे पैग़म्बर!) जब भी आप ऐसे लोगों को देखिए कि जो हमारी आयतों (के बारे) में (परिहास के लक्ष्य से) खोजबीन कर रहे हैं तो उनसे अलग हो जाइये, यहां तक कि वे दूसरी बात में लग जाएं। और यदि शैतान भुला दे तो याद आने के पश्चात इस अत्याचारी जाति के साथ मत बैठिए। (6:68)यह आयत जिसके संबोधन के पात्र पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम और मुसलमान हैं, पैग़म्बर को संबोधित करती है ताकि विषय के महत्त्व और उसकी संवेदनशीलता का पता चले। इस आयत में ईश्वर कहता है कि जब भी तुम किसी ऐसी बैठक में जाओ जहां ईश्वरीय आयतों का परिहास किया जा रहा हो तो यदि तुम बात का विषय बदल सकते हो तो ऐसा ही करो वरना उस बैठक से निकल जाओ और इस बात की अनुमति मत दो कि विरोधी तुम्हारी उपस्थिति में ईश्वर के धर्म का परिहास करें। और यदि तुम यह बात भूल गये और बैठक में सम्मलित हो गये तो जैसे ही याद आए तुरंत बैठक से निकल जाओ और यह मत सोचो कि यदि मैं बैठक के बीच से निकल गया तो लोग क्या कहेंगे।यह आयत हम सभी को पापियों के साथ बैठने और ऐसी बैठक में सम्मलित होने से, जिसमें पाप हो रहा हो, रोकते हुए कहती है, यदि तुम्हें पहले से ज्ञान नहीं था या तुम ध्यान दिए बिना ऐसी बैठक में शामिल हो गये तो या तो उस बैठक का विषय बदल दो या आपत्ति स्वरूप बैठक से निकल जाओ, चाहे वे लोग तुम्हारे परिजन की क्यों न हों।इस आयत से हमने सीखा कि अपनी धार्मिक मान्यताओं के प्रति संवेदनशील होना चाहिए ताकि शत्रु उनका परिहास न कर सकें।पाप की बैठकों का बहिष्कार तथा पापियों के साथ नकारात्मक व्यवहार, बुराइयों से संघर्ष का एक मार्ग है।आइये अब सूरए अनआम की आयत नंबर 69 की तिलावत सुनते हैंوَمَا عَلَى الَّذِينَ يَتَّقُونَ مِنْ حِسَابِهِمْ مِنْ شَيْءٍ وَلَكِنْ ذِكْرَى لَعَلَّهُمْ يَتَّقُونَ (69)और जो लोग ईश्वर से डरते हैं उन पर (पापियों के) हिसाब का कोई दायित्व नहीं परंतु यह उनके लिए एक उपदेश है कि शायद वे भी ईश्वर से डरने लगें। (6:69)पिछली आयत में पाप की बैठकों से बचने का आदेश देने के पश्चात इस आयत में ईश्वर कहता है। अलबत्ता जो लोग, पापियों को समझाने या उन्हें उपदेश देने के लिए ऐसी बैठकों में भाग लें, वे उनके पाप में शामिल नहीं हैं क्योंकि उनका लक्ष्य पाप में शामिल होना नहीं था।स्वाभाविक है कि हर कोई यह नहीं कह सकता कि मैं पापियों को सुधारने के लिए उनकी बैठक में भाग लेता हूं क्योंकि संभव है कि वो स्वयं उन्हीं में घुल मिलकर उन्हीं जैसा हो जाए। अतः सुधार के लक्ष्य से ऐसे लोगों को पापियों की बैठक में जाने का अधिकार है जिनमें ईश्वर का भय भी हो और जिनकी, पापियों से प्रभावित होने की संभावना भी न हो।इस आयत से हमने सीखा कि पापियों और झूठे लोगों के साथ बैठने से बचना चाहिए और उनसे दूर रहना चाहिए, इस प्रकार मनुष्य पापों से बच सकता है।पवित्र लोगों के एक गुट को पथभ्रष्टों का उत्तर देने के लिए स्वयं को तैयार करना चाहिए और उनकी बैठकों में भाग नहीं लेना चाहिए।आइये अब सूरए अनआम की 70वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।وَذَرِ الَّذِينَ اتَّخَذُوا دِينَهُمْ لَعِبًا وَلَهْوًا وَغَرَّتْهُمُ الْحَيَاةُ الدُّنْيَا وَذَكِّرْ بِهِ أَنْ تُبْسَلَ نَفْسٌ بِمَا كَسَبَتْ لَيْسَ لَهَا مِنْ دُونِ اللَّهِ وَلِيٌّ وَلَا شَفِيعٌ وَإِنْ تَعْدِلْ كُلَّ عَدْلٍ لَا يُؤْخَذْ مِنْهَا أُولَئِكَ الَّذِينَ أُبْسِلُوا بِمَا كَسَبُوا لَهُمْ شَرَابٌ مِنْ حَمِيمٍ وَعَذَابٌ أَلِيمٌ بِمَا كَانُوا يَكْفُرُونَ (70)और उन लोगों को छोड़ दीजिए जिन्होंने अपने धर्म को खिलवाड़ बना रखा है और सांसारिक जीवन ने उन्हें धोखा दे रखा है। और ऐसे लोगों को आवश्यक सीमा तक उपदेश और चेतावनी देते रहिए ताकि कोई अपने पापों पर ऐसे (दंड) में ग्रस्त न हो जाएं कि ईश्वर के अतिरिक्त कोई सहायक और सिफ़ारिश करने वाला न रहे। और यदि वह (व्यक्ति दंड से बचने के लिए) अपने पापों के सारे बदले या तावान भी दे तो उन्हें स्वीकार न किया जाए। यही वे लोग हैं जिन्हें उनके (बुरे) कर्मों के कारण दंडित किया गया है। इनके लिए पीने को खौलता हुआ पानी और कुफ़्र के बदले में अत्यंत पीड़ादायक दंड है। (6:70)पिछली आयतों में पथभ्रष्ठों और उनकी बैठकों से दूर रहने का उल्लेख करने के पश्चात इस आयत में क़ुरआने मजीद पैग़म्बर को संबोधित करते हुए कहता है। इस प्रकार के लोगों से संबंध विच्छेद कर लीजिए और उनके कर्मों पर अपनी विरक्तता और घृणा व्यक्त कीजिए। अलबत्ता इससे पूर्व आवश्यक सीमा तक उन्हें उपदेश देते रहिए और सत्य बात उनके कानों में डालते रहिए परंतु यदि उन्होंने हठधर्मी और द्वेष से काम लिया और किसी भी प्रकार अपने ग़लत कर्मों को त्यागने पर तैयार न हुए तो उन्हें छोड़ दीजिए। रोचक बात यह है कि धर्म का पालन करने वालों की दृष्टि में संसार का लोभ और संसार का प्रेम खेल और खिलवाड़ है जबकि संसार का प्रेम रखने वाले धर्म और उसके उपदेशों को खिलवाड़ समझते हैं। ये लोग अपनी प्रवृत्ति के साथ भी खेल करते हैं और ईश्वर तथा पैग़म्बर के कथनों का भी परिहास करते हैं और अपने काम के परिणाम से नहीं डरते।कुछ लोगों का मानना है कि यह आयत, बताती है कि इन अनेकेश्वरवादियों ने कुछ ऐसी बातों और मामलों को अपना धर्म बना रखा है जो खेल और खिलवाड़ से, अधिक समानता रखते हैं। ये लोग सत्य बात को सुनने के लिए तैयार नहीं हैं।प्रत्येक दशा में, ऐसे लोगों से जो सत्य को समझते हैं परंतु उसे स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है, ईमान वालों को दूर रहना चाहिए ताकि उन पर उनकी पथभ्रष्ठता का प्रभाव न पड़ने पाए।इस आयत से हमने सीखा कि इस्लामी समाज में ऐसे लोगों का बहिष्कार होना चाहिए जो धर्म का परिहास करते हैं। यदि उनका बहिष्कार होगा तो वे समाज में अपने पथभ्रष्ठ विचार नहीं फैला पाएंगे।संसार का प्रेम और लोग, धर्म और उसके आदेशों के परिहास और खिलवाड़ का कारण बनता है। यहां तक कि कभी मनुष्य, ईश्वर के आदेश का ही इन्कार कर देता है और कभी उसका औचित्य दर्शा कर फ़रार का मार्ग अपनाता है।