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    सूरए अनआम, आयतें 71-74, (कार्यक्रम 210)

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    आइये सूरए अनआम की आयत नंबर 71 और 72 की तिलावत सुनते हैंقُلْ أَنَدْعُو مِنْ دُونِ اللَّهِ مَا لَا يَنْفَعُنَا وَلَا يَضُرُّنَا وَنُرَدُّ عَلَى أَعْقَابِنَا بَعْدَ إِذْ هَدَانَا اللَّهُ كَالَّذِي اسْتَهْوَتْهُ الشَّيَاطِينُ فِي الْأَرْضِ حَيْرَانَ لَهُ أَصْحَابٌ يَدْعُونَهُ إِلَى الْهُدَى ائْتِنَا قُلْ إِنَّ هُدَى اللَّهِ هُوَ الْهُدَى وَأُمِرْنَا لِنُسْلِمَ لِرَبِّ الْعَالَمِينَ (71) وَأَنْ أَقِيمُوا الصَّلَاةَ وَاتَّقُوهُ وَهُوَ الَّذِي إِلَيْهِ تُحْشَرُونَ (72)(हे पैग़म्बर! उनसे) कह दीजिए कि क्या हम ईश्वर को छोड़कर ऐसी वस्तुओं को पुकारें जो न हमें लाभ पहुंचा सकती हैं और न ही हानि? और हम, ईश्वर द्वारा मार्गदर्शन कर दिए जाने के बाद, पीछे पलट जाएं और काफ़िर हो जाएं? उस व्यक्ति की भांति जिसे शैतान ने धरती में बहका दिया हो और वह इधर-उधर घूमता फिरे (और) उसके कुछ साथी हों जो उसे मार्गदर्शन की ओर बुला रहे हों कि हमारे पास आ जाओ। कह दीजिए कि (वास्तविक) मार्गदर्शन, ईश्वर का मार्गदर्शन है और हमें आदेश दिया गया है कि केवल पूरे ब्रह्मांड के पालनहार के समक्ष नतमस्तक रहें। (6:71) और नमाज़ क़ायम करो और ईश्वर से डरते रहो कि वही है जिसके पास तुम सबको जाना है। (6:72)इससे पहले हमने कहा था कि काफ़िर और अनेकेश्वरवादी, नये मुसलमानों को उनके ईमान से विचलित करने के लिए सदैव उन्हें अपनी विचारधारा की ओर अमंत्रित करते रहते थे तथा पैग़म्बरे इस्लाम सलल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम व क़ुरआन की शिक्षाओं को तुच्छ बताकर उन्हें अपने साथ मिलाने का प्रयास करते थे।ये आयतें पैग़म्बर को आदेश देती है कि वे उन्हें बड़ा ठोस और स्पष्ट उत्तर दें और उनकी अंतरात्मा से प्रश्न करें कि क्या हमें ईश्वर के स्थान पर ऐसे लोगों या वस्तुओं की उपासना करनी चाहिए जो न हमें लाभ पहुंचा सकते हैं कि हम उस लाभ के कारण उनकी उपासना करें और न वे हमें कोई हानि पहुंचा सकते हैं कि हम उस हानि के कारण उनसे डरें।इसके अतिरिक्त यह नवमुस्लिम अपनी आयु का एक भाग मूर्तिपूजा में बिता चुके हैं और आज इन्होंने एक क़दम आगे बढ़ाते हुए भौतिक वस्तुओं की उपासना छोड़ दी है, अतः मूर्तिपूजा की ओर उनकी वापसी कोई प्रगति और परिपूर्णता नहीं मानी जाएगी।अनपढ़ व अज्ञानी अरब यह सोचते थे कि जो लोग रेगिस्तान और मरुस्थल में रास्ता भटक जाते हैं, उन्हें शैतान और भूत-प्रेत, रास्ते से भटकाते हैं, क़ुरआन उनकी इसी आस्था का उदाहरण देते हुए कहता है, एकेश्वरवाद से अनेकेश्वरवाद की ओर वापसी, एक ऐसे अंधकारमय और ख़तरनाक मार्ग पर जाता है जहां शैतान घात लगाए बैठा रहता है।अंत में आयत कहती है कि पथभ्रष्टता और भटकावे से मुक्ति का एकमात्र मार्ग ईश्वर तथा उसके आदेशों के समक्ष नतमस्तक रहना है क्योंकि हमें अंततः ईश्वर के पास ही जाना है तथा उसकी प्रसन्नता की, मनुष्य के कल्याण व मोक्ष में महत्त्वपूर्ण भूमिका है।इन आयतों से हमने सीखा कि जब ईश्वर के अतिरिक्त कोई भी वस्तु हमें लाभ या हानि नहीं पहुंचा सकती तो ईश्वर के अतिरिक्त किसी की उपासना का कोई कारण नहीं है।पूरा ब्रह्मांड ईश्वर के समक्ष नतमस्तक है और हमें भी उसके सामने नतमस्तक रहना चाहिए ताकि हम ब्रह्मांड से अलग न दिखें।आइये अब सूरए अनआम की आयत नंबर 73 की तिलावत सुनते हैं।وَهُوَ الَّذِي خَلَقَ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ بِالْحَقِّ وَيَوْمَ يَقُولُ كُنْ فَيَكُونُ قَوْلُهُ الْحَقُّ وَلَهُ الْمُلْكُ يَوْمَ يُنْفَخُ فِي الصُّورِ عَالِمُ الْغَيْبِ وَالشَّهَادَةِ وَهُوَ الْحَكِيمُ الْخَبِيرُ (73)वही है जिसने आकाशों और धरती की सत्य के साथ रचना की और जैसे ही किसी चीज़ को होने का आदेश देता है तो वह हो जाती है। उसकी बात सत्य है और जिस दिन सूर फूंका जाएगा उस दिन पूरा अधिकार और सत्ता उसकी ही होगी। वह गुप्त और प्रत्यक्ष सभी का जानने वाला है और वह तत्वदर्शी तथा जानकार है। (6:73)पिछली आयतों में क़ुरआने मजीद ने ईश्वर तथा उसके आदेशों के समक्ष नतमस्तक रहने पर बल दिया था। यह आयत इस बात के तर्क के रूप में कहती है। क्या तुम नहीं मानते कि संसार का आरंभ और अंत ईश्वर के हाथ में है। उसी ने आकाशों और धरती की सृष्टि की है और वही प्रलय लाने वाला है। उसी ने संसार की रचना की है और पूरे संसार की हर वस्तु से पूर्णतः अवगत है। यदि ऐसा है तो तुम्हें उसका आज्ञापालन करना चाहिए ताकि उसके मार्ग पर क़दम बढ़ा सको। उसने सत्य के आधार पर संसार की रचना की है, उसकी बात सत्य है और वो सत्य के आधार पर ही फ़ैसला करने वाला है।इस आयत से हमने सीखा कि संसार की रचना, लक्ष्यपूर्ण और तत्वदर्शिता के आधार पर है और ईश्वर ने तत्वदर्शिता के आधार पर हर वस्तु और जीव की सृष्टि की है।आइये अब सूरए अनआम की आयत नंबर 74 की तिलावत सुनते है।وَإِذْ قَالَ إِبْرَاهِيمُ لِأَبِيهِ آَزَرَ أَتَتَّخِذُ أَصْنَامًا آَلِهَةً إِنِّي أَرَاكَ وَقَوْمَكَ فِي ضَلَالٍ مُبِينٍ (74)और जब इब्राहीम ने अपने पिता आज़र से कहा कि क्या तुम मूर्तियों को अपना ईश्वर मानते हो? मैं तुम्हें और तुम्हारी जाति को खुली पथभ्रष्टता में देखता हूं। (6:74)यह आयत पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम को संबोधित करते हुए कहती है कि यह मत सोचिए कि मूर्तिपूजा केवल मक्के के लोगों की पद्धति है, ऐसा नहीं है बल्कि हज़रत इब्राहीम के काल में भी कुछ लोग मूर्तियों की पूजा करते थे। तथा हज़रत इब्राहीम ने अपने अभिभावक से कि जो विदित रूप से, क़बीले और जाति का सरदार भी था, कहा कि किस प्रकार तुम इन निर्जीव मूर्तियों अपना ईश्वर मानकर उनकी उपासना करते हो? तुम्हारा यह काम स्पष्ट रूप से पथभ्रष्टता है।अलबत्ता आज़र, हज़रत इब्राहीम का चाचा था न कि पिता, परंतु चूंकि वह उनका अभिभावक था और पिता समान था, अतः उसे इस आयत में हज़रत इब्राहीम का पिता कहा गया है।इस आयत से हमने सीखा कि संतान के लिए आवश्यक नहीं है कि वे अपने माता पिता की आस्थाओं को स्वीकार करें बल्कि उसे तर्क और बुद्धि से काम लेते हुए, अपनी ग़लत आस्थाओं को छोड़ देना चाहिए और न केवल छोड़ देना चाहिए बल्कि उनको भी नसीहत करनी चाहिए।ग़लत संस्कार, रीतियां और आस्थाएं यद्यपि कई हज़ार वर्षों से कुछ जातियों में प्रचलित हैं परंतु चूंकि तर्क से मेल नहीं खातीं इसलिए स्वीकार्य नहीं हैं। सत्य का मानदंड, तर्क है न कि संख्या।