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    सूरए अनआम, आयतें 75-79, (कार्यक्रम 211)

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    आइये सूरए अनआम की आयत नंबर 75 की तिलावत सुनते हैं।وَكَذَلِكَ نُرِي إِبْرَاهِيمَ مَلَكُوتَ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَلِيَكُونَ مِنَ الْمُوقِنِينَ (75)और इस प्रकार हमने इब्राहीम को आकाशों और धरती की सत्ता और अधिकार दिखा दिए ताकि वे विश्वास करने वालों में से हो जाएं। (6:75)इससे पहले हमने कहा था कि हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने बुद्धि और तर्क द्वरा अपनी जाति के लोगों की ग़लत धारणाओं और आस्थाओं का मुक़ाबला किया और मूर्तिपूजा को अनुचित सिद्ध कर दिया।इस आयत में ईश्वर कहता है कि मूर्तिपूजा के मुक़ाबले में इब्राहीम का डट जाना, इस बात का कारण बना कि हम उन्हें धरती और आकाशों के बारे में महत्त्वपूर्ण वास्तविकताओं से अवगत कराएं ताकि वो सृष्ट के वास्तविक रूप से को देख सकें और इस बात पर विश्वास करें कि हर वस्तु पर ईश्वर का स्वामित्व है और वास्तविक सत्ता व स्वामित्व ईश्वर से विशेष है।इस आयत से हमने सीखा कि जो कोई सत्य को समझ लेता है तथा अन्य लोगों को उसकी ओर आमंत्रित करता है, ईश्वर उसके मार्गदर्शन में वृद्धि कर देता है तथा उसे वस्तुओं को उनके वास्तविक स्वरूप में देखने वाली दृष्टि प्रदान करता है।हमें केवल संसार व वस्तुओं के बाह्य रूप को नहीं देखना चाहिए तथा ईश्वर व मनुष्य के साथ सृष्टि के संबंध को भूलना नहीं चाहिए।आइये अब सूरए अनआम की आयत नंबर 76 की तिलावत सुनते हैं।فَلَمَّا جَنَّ عَلَيْهِ اللَّيْلُ رَأَى كَوْكَبًا قَالَ هَذَا رَبِّي فَلَمَّا أَفَلَ قَالَ لَا أُحِبُّ الْآَفِلِينَ (76)और फिर जब उन पर रात का अंधकार छा गया और उन्होंने एक तारे को चमकते हुए देखा तो कहा कि यह मेरा पालनहार है, फिर जब तारा डूब गया तो उन्होंने कहा कि मैं डूब जाने वालों को पसंद नहीं करता। (6:76)हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के काल में मूर्तिपूजा के अतिरिक्त सूर्य और चांद तारों पर भी अत्यधिक ध्यान दिया जाता था और लोग इन्हें अपने भाग्य के संबंध में प्रभावी मानते थे, जैसा कि आजकल भी कुछ लोग कहते हैं कि अमुक व्यक्ति के भाग्य का सितारा बहुत ऊंचाई पर है, या अमुक व्यक्ति का सितारा गर्दिश में है।हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने इस प्रकार के विचारों के मुक़ाबले में एक विशेष प्रकार की पद्धति अपनाई और स्वयं को अन्य लोगों की भांति दर्शाना आरंभ किया और सितारों, चांद तथा सूर्य पर अधिक ध्यान देना आरंभ किया। परंतु चूंकि तारे, चांद और सूरज सदैव ही डूबते और निकलते रहते हैं, अतः हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने कहा कि जो वस्तु अस्त हो सकती हो और डूब जाए वह उपासना के योग्य नहीं है। दूसरे शब्दों में इस प्रकार का ईश्वर स्वयं प्रकृति के क़ानूनों के अधीन है और प्रकृति पर उसका शासन नहीं है कि वह मेरे भाग्य और भविष्य पर प्रभाव डाल सके।इस आयत से हमने सीखा कि निमंत्रण की पद्धतियों में से एक पथभ्रष्ट लोगों के साथ मिलना और उन्हीं की स्वाभाविक बुद्धि और तर्क से उन्हें संतुष्ट करना है।ईश्वर को मनुष्य का प्रिय होना चाहिए क्योंकि उपासना मनुष्य के हृदय से संबंधित है न कि उसकी बुद्धि और इंद्रियों से।अब सूरए अनआम की आयत नंबर 77 और 78 की तिलावत सुनते हैं।فَلَمَّا رَأَى الْقَمَرَ بَازِغًا قَالَ هَذَا رَبِّي فَلَمَّا أَفَلَ قَالَ لَئِنْ لَمْ يَهْدِنِي رَبِّي لَأَكُونَنَّ مِنَ الْقَوْمِ الضَّالِّينَ (77) فَلَمَّا رَأَى الشَّمْسَ بَازِغَةً قَالَ هَذَا رَبِّي هَذَا أَكْبَرُ فَلَمَّا أَفَلَتْ قَالَ يَا قَوْمِ إِنِّي بَرِيءٌ مِمَّا تُشْرِكُونَ (78)फिर जब उन्होंने चांद को चमकते देखा तो कहा कि यह मेरा पालनहार है परंतु जब वह डूब गया तो कहा यदि मेरा पालनहार मेरा मार्गदर्शन न करता तो मैं भटके हुए लोगों में से होता। (6:77) फिर जब सूर्य को चमकते देखा तो कहा कि ये मेरा पालनहार है, ये अधिक बड़ा है परंतु जब सूर्य (भी) डूब गया तो कहाः हे मेरी जाति (वालो!) निसंदेह मैं उनसे विरक्त हूं जिन्हें तुम ईश्वर का समकक्ष ठहराते हो। (6:78)पिछली आयत में सितारों की पूजा और उसे नकारने की पद्धति की ओर संकेत करने के पश्चात, ईश्वर इन आयतों में चंद्रमा और सूर्य की पूजा की ओर संकेत करते हुए कहता है। हज़रत इब्राहीम ने चंद्रमा और सूर्य को देखने के पश्चात अन्य लोगों की भांति उन्हें पालनहार कहा बल्कि अधिक बड़ा होने के कारण सूर्य को अधिक महत्त्व दिया परंतु जब वे डूबने लगे तो उन्होंने लोगों से कहा कि उदय और अस्त होने वाली वस्तुओं में ईश्वर होने की योग्यता नहीं है।हज़रत इब्राहीम ने लोगों को सचेत किया कि यह पद्धति ग़लत है और यदि मैं तुम्हारी ही भांति इनकी उपासना करूं तो मैं पथभ्रष्टता में रहूंगा। तुम किस प्रकार इन्हें, सृष्टि के संचालन में ईश्वर का समकक्ष मानते हो जबकि इनके पास अपनी कोई शक्ति नहीं है।इन आयतों से हमने सीखा कि लोगों की प्रकृति और विचार शक्ति को जागृत करना, ईश्वरीय पैग़म्बरों के निमंत्रण की एक पद्धति है।पथभ्रष्ट विचारों और व्यवहार के मुक़ाबले में धीरे-2 क़दम उठाना चाहिए। हज़रत इब्राहीम की भांति, जिन्होंने पहले तारे के पालनहार होने का इन्कार किया, फिर चंद्रमा का और फिर सूर्य का।आइये अब सूरए अनआम की आयत नंबर 79 की तिलावत सुनते हैं।إِنِّي وَجَّهْتُ وَجْهِيَ لِلَّذِي فَطَرَ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ حَنِيفًا وَمَا أَنَا مِنَ الْمُشْرِكِينَ (79)मैंने अपना मुख निष्ठापूर्वक उसकी ओर कर लिया है जिसने आकाशों और धरती की रचना की है और मैं अनेकेश्वरवादियों में से नहीं हूं। (6:79)हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम मूर्तियों तथा तारों, चंद्रमा तथा सूर्य की पूजा करने वालों के समक्ष अपने तर्क पेश करते हुए अंत में कहते है कि इन वस्तुओं में से कोई भी मेरा पालनहार नहीं हो सकता बल्कि मेरा पालनहार तो वह है जिसने इन वस्तुओं तथा आकाशों और धरती की रचना की है। मैंने कि जो सत्य और सीधे मार्ग की खोज में हूं, बिना किसी पथभ्रष्टता और अनेकेश्वरवाद के निष्ठापूर्वक अपना मुख उसकी ओर कर लिया है।इस आयत से हमने सीखा कि जब भी सत्य हमारे समक्ष स्पष्ट हो जाए तो हमें दृढ़तापूर्वक उसकी घोषणा करनी चाहिए और असत्य से विरक्त हो जाना चाहिए।अनेकेश्वरवाद से दूरी इस प्रकार से होनी चाहिए कि सभी कार्यों में मनुष्य का लक्ष्य और दिशा ईश्वर की ओर हो। ईश्वर के अतिरिक्त किसी भी वस्तु या व्यक्ति को अपने कार्यों में प्रभावी मानकर उस पर ध्यान देना, एकेश्वरवाद से दूरी है।