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    सूरए अनआम, आयतें 80-83, (कार्यक्रम 212)

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    आइये सूरए अनआम की आयत नंबर 80 की तिलावत सुनते हैं।وَحَاجَّهُ قَوْمُهُ قَالَ أَتُحَاجُّونِّي فِي اللَّهِ وَقَدْ هَدَانِ وَلَا أَخَافُ مَا تُشْرِكُونَ بِهِ إِلَّا أَنْ يَشَاءَ رَبِّي شَيْئًا وَسِعَ رَبِّي كُلَّ شَيْءٍ عِلْمًا أَفَلَا تَتَذَكَّرُونَ (80)इब्राहीम की जाति ने उनसे बहस और कटहुज्जती की, (तो) उन्होंने कहा क्या तुम लोग ईश्वर के बारे में मुझसे बहस कर रहे हो जबकि उसी ने मेरा मार्गदर्शन किया है और मैं उनसे बिल्कुल भयभीत नहीं हूं जिन्हें तुम ईश्वर का समकक्ष ठहराते हो, सिवाए इसके कि स्वयं मेरा पालनहार चाहे कि किसी वस्तु से मुझे हानि हो, मेरे पालनहार का ज्ञान हर वस्तु से अधिक और व्यापक है तो क्या तुम लोग यह बात नहीं समझते? (6:80)इससे पहले वाली आयतों में बताया गया था कि हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम आरंभ में मूर्तियों तथा चंद्रमा, सूर्य व सितारों की पूजा करने वालों के साथ हो गये और उन्होंने उन्हीं की भांति कहा कि ये वस्तुएं मेरी पालनहार हैं, परंतु इसके पश्चात उन्होंने तर्कसंगत और स्वाभाविक रवैया अपनाते हुए सिद्ध कर दिया कि ये वस्तुएं मनुष्य के भाग्य और भविष्य पर प्रभाव नहीं डाल सकतीं और हमारी पालनहार नहीं हो सकतीं। फिर अंत में उन्होंने स्पष्ट रूप से घोषणा कर दी कि मैं धरती और आकाशों के रचयिता को अपना पालनहार मानता हूं कि जिसके अधिकार में मेरा भाग्य है और मैं उसी की उपासना करता हूं।अब हम हज़रत इब्राहीम के साथ उनकी जाति के कड़े व्यवहार को देखते हैं। वे लोग न केवल हज़रत इब्राहीम के अनुयायी नहीं बने बल्कि उनसे अपना अनुसरण कराना चाहते थे तथा उन्हें एकेश्वरवाद के मार्ग से विचलित करना चाहते थे। हज़रत इब्राहीम उनके उत्तर में कहते हैं, मैं किस प्रकार अपने पालनहार को छोड़ सकता हूं जबकि उसने स्वयं को मुझसे परिचित कराया और मेरा मार्गदर्शन किया है? मैं उसे छोड़कर किस प्रकार तुम्हारे अंधविश्वासी एवं निराधार विचारों तथा आस्थाओं का अनुसरण कर सकता हूं।इस आयत से हमने सीखा कि एकेश्वरवादी अकेले होने से नहीं घबराता। यदि सारे लोग काफ़िर हों तब भी वह अपनी आस्था नहीं छोड़ता।ईश्वर पर ईमान की एक निशानी, उसके अतिरिक्त किसी से न डरना है, चाहे कोई भी हो या कुछ भी हो।आइये अब सूरए अनआम की आयत नंबर 81 की तिलावत सुनते हैंوَكَيْفَ أَخَافُ مَا أَشْرَكْتُمْ وَلَا تَخَافُونَ أَنَّكُمْ أَشْرَكْتُمْ بِاللَّهِ مَا لَمْ يُنَزِّلْ بِهِ عَلَيْكُمْ سُلْطَانًا فَأَيُّ الْفَرِيقَيْنِ أَحَقُّ بِالْأَمْنِ إِنْ كُنْتُمْ تَعْلَمُونَ (81)और किस प्रकार मैं तुम्हारे द्वारा ईश्वर के समकक्ष ठहराई गयी वस्तुओं से डरूं जबकि तुम इस बात से नहीं डरते कि तुमने उनको ईश्वर का समकक्ष ठहरा दिया है जिनके बारे में ईश्वर ने तुम्हारे लिए कोई तर्क नहीं उतारा है तो अब यदि तुम जानते हो तो (बताओ कि) दोनों पक्षों में से शांति का कौन अधिक योग्य है? (6:81)इस आयत में हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम एक स्वाभाविक तर्क पेश करते हुए कहते हैं कि तुम अनेकेश्वरवादी लोक-परलोक में ईश्वर के कोप और क्रोध से नहीं डरते तथा स्वयं को सुरक्षित मानते हो और मुझसे अपेक्षा रखते हो कि मैं तुम्हारे हाथ की बनाई हुई वस्तओं से डरूं? जबकि उसी ईश्वर ने, जिसे तुम अपना व सृष्टि का रचयिता मानते हो, इन मूर्तियों की पूजा के लिए कोई बौद्धिक तर्क नहीं भेजा है।अतः बुद्धि मुझे आदश देती है कि मैं ईश्वर के क्रोध से डरूं, न कि मूर्तियों के क्रोध से ताकि मैं प्रलय में सुरक्षा के अधिक निकट रहूं। तुम लोगों ने एक निश्चित विषय को छोड़ कर काल्पनिक विषय पर विश्वास कर रखा है।इस आयत से हमने सीखा कि धार्मिक विचार और आस्थाएं बुद्धि और तर्क के आधार पर होनी चाहिए न कि कल्पना, सोच और सपनों के आधार पर।धर्म के विरोधियों के साथ वाद विवाद में, प्रश्न-उत्तर के रूप में काम करना चाहिए, फ़ैसला नहीं सुनाना चाहिए। उदाहरण स्वरूप ये आयत पूछना चाहती है कि तुम्हारी दृष्टि में, हमारी और तुम्हारी इन दो आस्थाओं में से कौन सी सत्य से अधिक निकट है?आइये अब सूरए अनआम की आयत नंबर 82 की तिलावत सुनते हैं।الَّذِينَ آَمَنُوا وَلَمْ يَلْبِسُوا إِيمَانَهُمْ بِظُلْمٍ أُولَئِكَ لَهُمُ الْأَمْنُ وَهُمْ مُهْتَدُونَ (82)जो लोग ईमान ले आए और उन्होंने अपने ईमान को (अनेकेश्वरवाद के) अत्याचार से दूषित नहीं किया केवल ऐसे ही लोगों के लिए शांति है और ऐसे ही लोग मार्गदर्शित हैं। (6:82)हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम और उनकी जाति के बीच होने वाले वाद विवाद के अंत में, हज़रत इब्राहीम द्वारा पूछे गये निरुत्तर प्रश्न के उत्तर में क़ुरआन कहता है कि प्रलय के दिन शांति और सुरक्षा, केवल एकेश्वरवादी तथा ईश्वरीय आदेशों का पालन करने वाले भले लोगों को प्राप्त होगी कि जो अपने ईमान व आस्था पर भी अडिग रहे और कुफ़्र तथा अनेकेश्वरवाद से दूषित नहीं हुए और जो व्यवहार और कर्म में भी अत्याचारी नहीं थे।इस आयत से हमने सीखा कि ईमान की सुरक्षा स्वयं ईमान से भी महत्त्वपूर्ण है। सत्य के मार्ग पर अडिग व स्थिर रहना, ईमान पर बाक़ी रहने का कारक है।वास्तविक सुरक्षा, वास्तविक ईमान की छाया में ही मिलती है, और वह भी उस दिन की सुरक्षा जिस कोई सुरक्षित नहीं होगा।आइये अब सूरए अनआम की आयत नंबर 83 की तिलावत सुनते हैं।وَتِلْكَ حُجَّتُنَا آَتَيْنَاهَا إِبْرَاهِيمَ عَلَى قَوْمِهِ نَرْفَعُ دَرَجَاتٍ مَنْ نَشَاءُ إِنَّ رَبَّكَ حَكِيمٌ عَلِيمٌ (83)और यह हमारा तर्क था जो हमने इब्राहीम को उनकी जाति के मुक़ाबले में दिया। (और) हम जिसको उचित समझते हैं उसे ऊंचे दर्जे प्रदान कर देते हैं, निसंदेह तुम्हारा पालनहार तत्वदर्शी और अधिक जानकार है। (6:83)हज़रत इब्राहीम और उनकी जाति के प्रकरण के अंत में ईश्वर कहता है। अपनी जाति के समक्ष इस प्रकार का तर्क प्रस्तुत करने की पद्धति हमने इब्राहीम को प्रदान की थी। यह ईश्वरीय व बौद्धिक तर्क है जो पैग़म्बर लोगों के समक्ष पेश करते हैं और लोग भी अपनी बुद्धि के अनुसार उसे समझते हैं।हमने इब्राहीम को पैग़म्बरी का पद दिया है वह भी तत्वदर्शिता के आधार पर है कि लोगों को मार्गदर्शक और आदर्श की आवश्यकता होती है तथा समाज के सबसे अच्छे लोगों को इस बात के लिए चुना जाना चाहिए। अकारण ही कोई पैग़म्बर नहीं बनता।इस आयत से हमने सीखा कि सामाजिक व्यवस्थाओं में किसी की पदोन्नति, ज्ञान व तत्वदर्शिता के आधार पर होनी चाहिए न कि धन व शक्ति के आधार पर।पैग़म्बरों के निमंत्रण की पद्धति तर्क व बुद्धि के आधार पर रही है न कि अनुसरण व व्याख्या के आधार पर।