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    सूरए अनआम, आयतें 84-90, (कार्यक्रम 213)

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    आइये सूरए अनआम की 84 से लेकर 87 तक की आयतों की तिलावत सुनते हैं।وَوَهَبْنَا لَهُ إِسْحَاقَ وَيَعْقُوبَ كُلًّا هَدَيْنَا وَنُوحًا هَدَيْنَا مِنْ قَبْلُ وَمِنْ ذُرِّيَّتِهِ دَاوُودَ وَسُلَيْمَانَ وَأَيُّوبَ وَيُوسُفَ وَمُوسَى وَهَارُونَ وَكَذَلِكَ نَجْزِي الْمُحْسِنِينَ (84) وَزَكَرِيَّا وَيَحْيَى وَعِيسَى وَإِلْيَاسَ كُلٌّ مِنَ الصَّالِحِينَ (85) وَإِسْمَاعِيلَ وَالْيَسَعَ وَيُونُسَ وَلُوطًا وَكُلًّا فَضَّلْنَا عَلَى الْعَالَمِينَ (86) وَمِنْ آَبَائِهِمْ وَذُرِّيَّاتِهِمْ وَإِخْوَانِهِمْ وَاجْتَبَيْنَاهُمْ وَهَدَيْنَاهُمْ إِلَى صِرَاطٍ مُسْتَقِيمٍ (87)और हमने इब्राहीम को इस्हाक़ व याक़ूब प्रदान किए (और) हर एक का मार्गदर्शन किया और इनसे पहले हमने नूह का मार्गदर्शन किया था। और इब्राहीम के वंश में, दाऊद, सुलैमान, अय्यूब, यूसुफ़, मूसा और हारून (का भी हमने मार्गदर्शन किया) और हम इस प्रकार भले कर्म करने वालों का बदला देते हैं। (6:84) और (हमने) ज़करिया, यहया, ईसा व इलयास (का भी मार्गदर्शन किया) और ये सबके सब भले कर्म करने वालों में से थे। (6:85) और (हमने इस्माईल, यसा, यूनुस तथा लूत (का भी मार्गदर्शन किया) और इन सबको हमने समस्त संसार पर श्रेष्ठता दी। (6:86) और उनके पूर्वजों, संतानों और भाइयों में से कुछ लोगों को उनकी योग्यताओं के कारण अपनी कृपा का पात्र बनाया और पैग़म्बरी के लिए चुन लिया और सीधे रास्ते की ओर उनका मार्गदर्शन किया। (6:87)इससे पहले इस बात का वर्णन किया गया कि हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने अपने काल के लोगों को अनेकेश्वरवाद तथा मूर्तिपूजा से रोकने तथा एकेश्वरवाद की ओर बुलाने के लिए किस प्रकार की पद्धति अपनाई। ये आयतें हज़रत इब्राहीम के वंश में अनन्यवाद की ओर संकेत करते हुए कहती हैं, हमने इब्राहीम को ऐसी संतानें दी कि जिन्हें स्वयं ईश्वर का भी विशेष मार्गदर्शन प्राप्त हुआ और वे पैग़म्बर बने तथा उनकी संतानों को भी यह पद प्राप्त हुआ।इन आयतों में कुल मिलाकर 18 पैग़म्बरों का नाम आया है जिनमें से हज़रत नूह जैसे कुछ पैग़म्बर हज़रत इब्राहीम से पहले थे जबकि कुछ अन्य उनके वंश में थे।यद्यपि इन आयतों के आधार पर हज़रत इब्राहीम की संतान में से कुछ लोग पैग़म्बर बने किन्तु वंश, पैग़म्बरी का मानदंड नहीं है बल्कि जैसा कि इन आयतों में बल देकर कहा गया है, भलाई,पवित्रता और अच्छे कर्म, पैग़म्बरी का मानदंड हैं और इसी प्रकार आधार पर ईश्वर ने उन्हें अपने काल के अन्य लोगों पर, पैग़म्बरी देकर, श्रेष्ठता प्रदान की है।इन आयतों से हमने सीखा कि माता पिता के भले कर्म, उनकी संतान की प्रगति तथा मार्गदर्शन में प्रभावी हैं। अनेक भले कर्मों का बदला माता पिता के जीवन में संभव नहीं होता तथा ईश्वर वो बदला उनकी संतान को प्रदान करता है।भली संतान, पवित्र व भले कर्म करने वालों के लिए ईश्वरीय पारितोषिक है।आइये अब सूरए अनआम की आयत नंबर 88 की तिलावत सुनें।ذَلِكَ هُدَى اللَّهِ يَهْدِي بِهِ مَنْ يَشَاءُ مِنْ عِبَادِهِ وَلَوْ أَشْرَكُوا لَحَبِطَ عَنْهُمْ مَا كَانُوا يَعْمَلُونَ (88)यह ईश्वर का मार्गदर्शन है जिसके द्वारा वह अपने बंदों में से जिसको चाहता है मार्ग दिखाता है और यदि उन्होंने किसी को ईश्वर का समकक्ष ठहराया, तो जो कुछ उन्होंने किया है उसे गंवा बैठेंगे। (6:88)यह आयत ईश्वर द्वारा पैग़म्बरों के विशेष मार्गदर्शन की ओर संकेत करते हुए कहती है, ईश्वर जिसे चाहता है और जिसमें योग्यता होती है उसी को अपने विशेष मार्गदर्शन का पात्र बनाता है तथा पैग़म्बरी प्रदान करता है। अलबत्ता इस प्रकार के लोग सदैव भले रहने के लिए विवश नहीं हैं और अपने आप पर अधिकार से उन्हें वंचित नहीं रखा गया है, जब भी वे किसी को ईश्वर का समकक्ष ठहराएंगे तो अपने इस पद को गंवा बैठेंगे।इस आयत से हमने सीखा कि वास्तविक व अंतिम मार्गदर्शन केवल ईश्वर की ओर से है, यहां तक कि पैग़म्बरों के पास भी अपना मार्गदर्शन नहीं होता बल्कि वे ईश्वरीय मार्गदर्शन द्वारा ही परिपूर्णता तक पहुंचते हैं।ईश्वरीय परंपरा में कोई भेदभाव नहीं है, यहां तक कि यदि पैग़म्बर भी ग़लत मार्ग पर चलें तो उन्हें दंडित किया जाएगा।आइये अब सूरए अनआम की आयत नंबर 89 की तिलावत सुनें।أُولَئِكَ الَّذِينَ آَتَيْنَاهُمُ الْكِتَابَ وَالْحُكْمَ وَالنُّبُوَّةَ فَإِنْ يَكْفُرْ بِهَا هَؤُلَاءِ فَقَدْ وَكَّلْنَا بِهَا قَوْمًا لَيْسُوا بِهَا بِكَافِرِينَ (89)ये ऐसे लोग थे जिन्हें हमने आसमानी किताब, शासन और पैग़म्बरी प्रदान की तो यदि (अनेकेश्वरवादियों का) यह गुट उनका इन्कार भी कर दे तो (दुखी न हों क्योंकि) हमने एक ऐसे गुट को इसका ज़िम्मेदार बनाया है जो इन्कार करने वाला नहीं है। (6:89)पिछली आयतों में ईश्वर के विशेष मार्गदर्शन का उल्लेख करने के पश्चात इस आयत में ईश्वर कहता है, हमने पैग़म्बरों को आसमानी किताब तथा पैग़म्बरी के पद के अतिरिक्त शासन और फ़ैसले का भी अधिकार दिया है ताकि वे, लोगों के बीच आसमानी क़ानूनों को लागू करें और उनके बीच मतभेद की स्थिति में फ़ैसला करें।आगे चलकर आयत पैग़म्बरे इस्लाम को सान्तवना देती है कि यदि आप यह देखते हैं कि अनेक लोग इस ईश्वरीय प्रक्रिया का इन्कार करते हैं तो दुखी न हों क्योंकि ऐसे लोग है जो उस पर ईमान लाएंगे और अपने ईमान पर जमें रहेंगे।इस आयत से हमने सीखा कि समाज में शासन और फ़ैसले का अधिकार पैग़म्बरों और ईश्वरीय नेताओं को प्राप्त है।सत्यता का मानदंड लोगों का स्वीकार या रद्द करना नहीं है, कुछ लोगों ने इन्कार के चलते अपनी धार्मिक आस्थाओं पर संदेह नहीं करना चाहिए।आइये अब सूरए अनआम की आयत नंबर 90 की तिलावत सुनते हैं।أُولَئِكَ الَّذِينَ هَدَى اللَّهُ فَبِهُدَاهُمُ اقْتَدِهِ قُلْ لَا أَسْأَلُكُمْ عَلَيْهِ أَجْرًا إِنْ هُوَ إِلَّا ذِكْرَى لِلْعَالَمِينَ (90)वे पैग़म्बर ऐसे थे जिनका ईश्वर ने मार्गदर्शन किया था तो (हे पैग़म्बर) आप भी उनके मार्गदर्शन का अनुसरण करें (और लोगों से) कह दें कि मैं अपनी पैग़म्बरी के लिए तुम से कोई बदला नहीं मांगता। यह (क़ुरआन) संसार वालो के लिए नसीहत के अतिरिक्त कुछ नहीं। (6:90)इस आयत में ईश्वर कहता है कि हे पैग़म्बर, आपकी पैग़म्बरी भी पिछले पैग़म्बरों के पद को आगे बढ़ाती है और कोई अलग बात नहीं है। अतः आप लोगों से कह दीजिए कि मैं भी पिछले पैग़म्बरों के निमंत्रण को ही आगे बढ़ा रहा हूं और कोई नई बात नहीं लाया हूं। इस से मेरा लक्ष्य तुम्हारा मार्गदर्शन करना है। न मैं तुमसे कोई माल चाहता हूं और न ही किसी अन्य वस्तु की अपेक्षा रखता हूं।इस आयत से हमने सीखा कि पिछले धर्मों के स्थान पर नये धर्म का आना, पिछले पैग़म्बरों के निमंत्रण को ग़लत सिद्ध करने के अर्थ में नहीं है। सभी धर्म एकेश्वरवाद का निमंत्रण देते हैं केवल उसे पेश करने की पद्धति और कर्मों में, व्यवहारिक रूप में अंतर पाया जाता है।पैग़म्बरों के निमंत्रण की पद्धति सचेत करने की है न कि ईमान लाने पर लोगों को विवश करने की। अपने निमंत्रण मे पैग़म्बरों का कोई भौतिक व आर्थिक लक्ष्य नहीं था, धर्म का प्रचार करने वालों को भी ऐसा ही होना चाहिए।