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    सूरए अनआम, आयतें 91-93, (कार्यक्रम 214)

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    आइये सूरए अनआम की आयत नंबर 91 की तिलावत सुनते हैं।وَمَا قَدَرُوا اللَّهَ حَقَّ قَدْرِهِ إِذْ قَالُوا مَا أَنْزَلَ اللَّهُ عَلَى بَشَرٍ مِنْ شَيْءٍ قُلْ مَنْ أَنْزَلَ الْكِتَابَ الَّذِي جَاءَ بِهِ مُوسَى نُورًا وَهُدًى لِلنَّاسِ تَجْعَلُونَهُ قَرَاطِيسَ تُبْدُونَهَا وَتُخْفُونَ كَثِيرًا وَعُلِّمْتُمْ مَا لَمْ تَعْلَمُوا أَنْتُمْ وَلَا آَبَاؤُكُمْ قُلِ اللَّهُ ثُمَّ ذَرْهُمْ فِي خَوْضِهِمْ يَلْعَبُونَ (91)और (काफ़िरों ने ईश्वर को उस प्रकार नहीं पहचाना जैसा उसे पहचानना चाहिए था। क्योंकि उन्होंने कहाः ईश्वर ने किसी मनुष्य पर कोई वस्तु नहीं उतारी। कह दीजिए कि वह किताब किसने उतारी जो मूसा लेकर आए और जो लोगों के लिए प्रकाश तथा मार्गदर्शन का कारण थी और जिसके पन्नों को तुमने अलग अलग कर दिया, उसके एक भाग को तुम प्रकट करते हो और अधिकांश को छिपाते हो। और (इसके द्वारा) तुम्हें वो सब बता दिया गया था जिसका ज्ञान तुम्हें और तुम्हारे पाप दादा को भी नहीं था। (हे पैग़म्बर!) कह दीजिए कि वह वही ईश्वर है, फिर उन्हें छोड़ दीजिए कि वे अपनी व्यर्थ बातों में डूबे रहें। (6:91)यहूदियों का एक गुट, यद्यपि, हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम पर तौरैत के उतरने पर विश्वास रखता था परंतु पैग़म्बरे इस्लाम के सामने हठधर्मी और द्वेष से कहता था कि इस बात की कोई संभावना नहीं है कि ईश्वर किसी मनुष्य पर किताब या अपना संदेश “वहि” भेजे। क़ुरआन इसके उत्तर में कहता है। तुम किस प्रकार, इस बात को तो स्वीकार करते हो कि हज़रत मूसा पर तौरैत उतारी गयी परंतु इस बात को नहीं मानते कि पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम पर क़ुरआन उतारा गया है। तुम्हारे पास जो कुछ है वो तौरैत के कारण है और तुम तथा तुम्हारे पूर्वज, धर्म के बारे में जो कुछ जानते है वह तौरैत से ही है। यद्यपि तुम तौरैत के उन भागों को प्रकट नहीं करते जो तुम्हारे विचार में तुम्हारे हित में नहीं हैं, परंतु तुम तौरैत को ईश्वरीय किताब ही मानते हो।अंत में आयत पैग़म्बरे इस्लाम को संबोधित करते हुए कहती है कि आप उनका उत्तर दीजिए परंतु उनके ईमान न लाने से निराश मत हो जाइये बल्कि केवल ईश्वर पर भरोसा कीजिए कि वही आपके लिए काफ़ी है। आप इन लोगों को इनके हाल पर छोड़ दीजिए कि जो इनके मन में आए कहते फिरें।इस आयत से हमने सीखा कि पैग़म्बरों का इन्कार, वस्तुतः ईश्वर की अनुकंपाओं की अकृतज्ञता है क्योंकि, पैग़म्बरी ईश्वर की दया और तत्वदर्शिता के आधार पर है।पैग़म्बरों का दायित्व, लोगों तक ईश्वरीय का निमत्रण पहुंचाना है न कि उसे स्वीकार करने के लिए उन्हें विवश करना। जो स्वीकार नहीं करता उसे छोड़ देना चाहिए।आइये अब सूरए अनआम की आयत नंबर 92 की तिलावत सुनते हैं।وَهَذَا كِتَابٌ أَنْزَلْنَاهُ مُبَارَكٌ مُصَدِّقُ الَّذِي بَيْنَ يَدَيْهِ وَلِتُنْذِرَ أُمَّ الْقُرَى وَمَنْ حَوْلَهَا وَالَّذِينَ يُؤْمِنُونَ بِالْآَخِرَةِ يُؤْمِنُونَ بِهِ وَهُمْ عَلَى صَلَاتِهِمْ يُحَافِظُونَ (92)और यह (क़ुरआन) पवित्र और विभूतिपूर्ण किताब है जिसे हमने उतारा है। यह उन सभी पुस्तकों की पुष्टि करने वाली है जो इससे पहले थीं। यह इस लिए है कि आप इसके द्वारा मक्के और उसके आस-पास के लोगों को ईश्वर से डराएं। और जो लोग प्रलय पर ईमान रखते हैं वे इस पर भी ईमान रखते हैं और अपनी नमाज़ों को निरंतरता से पढ़ते हैं। (6:92)पिछली आयत में पैग़म्बरे इस्लाम के साथ यहूदियों के हठधर्मी व्यवहार का वर्णन करने के पश्चात ईश्वर इस आयत में कहता है, यद्यपि तुम तौरैत वाले, क़ुरआन पर ईमान नहीं लाते, परंतु क़ुरआन, तौरैत का इन्कार नहीं करता बल्कि उसे ईश्वरीय किताब बताते हुए उसकी पुष्टि करता है।आगे चलकर आयत पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम को संबोधित करते हुए कहती है। हमने आप पर क़ुरआन उतारा है ताकि आप उसके माध्यम से सबसे पहले तो मक्का नगर के लोगों का और फिर अन्य क्षेत्र के लोगों का मार्गदर्शन कीजिए परंतु यह जान लीजिए कि सभी लोग आप पर या क़ुरआन पर ईमान नहीं लाएंगे। आपकी बातों को वही लोग स्वीकार करेंगे जो जीवन को भौतिक संसार तक सीमित नहीं समझते। और यह मानते हैं कि इस संसार के पश्चात एक और संसार है तथा मृत्यु मनुष्य के जीवन का अंत नहीं है। ऐसे लोग आप पर और आपकी किताब पर भी ईमान लाएंगे और उपासना तथा नमाज़ में भी लीन रहेंगे।इस आयत से हमने सीखा कि पुराने धर्मों के स्थान पर नये धर्म का आना, उनके असत्य होने के अर्थ में नहीं है बल्कि इसका अर्थ यह है कि उनके पालन की अवधि समाप्त हो गयी है। इस्लाम व क़ुरआन सभी पुराने धर्मों तथा आसमानी किताबों की पुष्टि करते हैं।नमाज़, किसी भी मुसलमान का सबसे स्पष्ट व्यवहारिक कर्म है और इसके बिना ईमान का दावा अधूरा है।आइये अब सूरए अनआम की आयत नंबर 93 की तिलावत सुनते हैं।وَمَنْ أَظْلَمُ مِمَّنِ افْتَرَى عَلَى اللَّهِ كَذِبًا أَوْ قَالَ أُوحِيَ إِلَيَّ وَلَمْ يُوحَ إِلَيْهِ شَيْءٌ وَمَنْ قَالَ سَأُنْزِلُ مِثْلَ مَا أَنْزَلَ اللَّهُ وَلَوْ تَرَى إِذِ الظَّالِمُونَ فِي غَمَرَاتِ الْمَوْتِ وَالْمَلَائِكَةُ بَاسِطُو أَيْدِيهِمْ أَخْرِجُوا أَنْفُسَكُمُ الْيَوْمَ تُجْزَوْنَ عَذَابَ الْهُونِ بِمَا كُنْتُمْ تَقُولُونَ عَلَى اللَّهِ غَيْرَ الْحَقِّ وَكُنْتُمْ عَنْ آَيَاتِهِ تَسْتَكْبِرُونَ (93)और उससे बढ़कर अत्याचारी कौन होगा जो ईश्वर पर झूठा आरोप लगाए और कहे कि मेरे पास ईश्वरीय संदेश आया है जबकि उसके पास कोई ईश्वरीय संदेश नहीं आया है, और जो यह कहे कि मैं (भी) शीघ्र ही उसी प्रकार (बातें) उतारूंगा, जिस प्रकार ईश्वर ने उतारी है। और (हे पैग़म्बर!) यदि आप उस समय को देखते कि जब अत्याचारी मृत्यु की कठिनाइयों में घिरे हुए हैं और फ़रिश्ते अपने हाथ बढ़ाए हुए कह रहे हैं कि अब अपनी जान निकाल दो कि आज तुम्हें, ईश्वर के प्रति झूठा आरोप लगाने और उसकी आयतों से उद्दंडता के बदले में अपमानजनक दंड दिया जाएगा। (6:93)इतिहास में ऐसे अनेक लोग रहे हैं जिन्होंने पैग़म्बरी का झूठा दावा किया तथा अपनी ओर से गढ़ी गई कुछ बातों को ईश्वरीय संदेश अर्थात वहि बताया। रोचक बात तो यह है कि इनमें से कुछ लोगों ने पैग़म्बरे इस्लाम के काल में भी अपनी पैग़म्बरी का दावा किया। इन्हीं में से एक “अब्द इब्ने सअद” नामक व्यक्ति था जो आरंभ में पैग़म्बर पर आने वाले ईश्वरीय संदेश को लिखा करता था परंतु उसके विश्वासघात के कारण पैग़म्बर ने उसे हटा दिया। उसने लोगों को एकत्रित किया और कहने लगा, मैं भी क़ुरआन की भांति तुम्हारे लिए आयतें ला सकता हूं।मुसैलमा नामक एक अन्य व्यक्ति ने भी पैग़म्बरे इस्लाम की आयु के अंतिम दिनों मंग इस प्रकार का दावा किया परंतु लोगों ने इनमें से एक को भी स्वीकार नहीं किया। यह आयत कहती है कि इस प्रकार के झूठे दावे, समाज पर किए जाने वाले सबसे बड़े अत्याचार हैं और ऐसे अत्याचारियों को मृत्यु के समय सबसे कड़े दंडों का स्वाद चखना पड़ता है।इस आयत से हमने सीखा कि सबसे बड़ा अत्याचार, सांस्कृतिक अत्याचार है जो कई पीढ़ियों की पथभ्रष्टता का कारण बनता है।झूठे दावेदारों की ओर से सचेत रहना चाहिए जो कभी-2 धर्म का चोला ओढ़कर अपनी पथभ्रष्टता को समाज में स्थानांतरित कर देते हैं।