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    सूरए अनआम, आयतें 94-97, (कार्यक्रम 215)

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    आइये सूरए अनआम की आयत नंबर 94 की तिलावत सुनते हैं।وَلَقَدْ جِئْتُمُونَا فُرَادَى كَمَا خَلَقْنَاكُمْ أَوَّلَ مَرَّةٍ وَتَرَكْتُمْ مَا خَوَّلْنَاكُمْ وَرَاءَ ظُهُورِكُمْ وَمَا نَرَى مَعَكُمْ شُفَعَاءَكُمُ الَّذِينَ زَعَمْتُمْ أَنَّهُمْ فِيكُمْ شُرَكَاءُ لَقَدْ تَقَطَّعَ بَيْنَكُمْ وَضَلَّ عَنْكُمْ مَا كُنْتُمْ تَزْعُمُونَ (94)और निसंदेह (आज) तुम हमारे पास उसी प्रकार अकेले आए हो जिस प्रकार हमने पहली बार तुम्हें पैदा किया था, और जो कुछ हमने तुम्हें दिया था उसे तुम अपने पीछे छोड़ आए हो। और हम तुम्हारे साथ तुम्हारी सिफ़ारिश करने वाले उन लोगों को नहीं देख रहे हैं जिन्हें तुम अपने (भविष्य के संबंध में) ईश्वर का समकक्ष समझते थे। तुम्हारे आपसी संबंध टूट गये और जो कुछ तुम सोचते थे वह तुम से खो गया। (6:94)इससे पहले मृत्यु के समय अनेकेश्वरवादियों की स्थिति का वर्णन करने के पश्चात इस आयत में भी ईश्वर कहता है। संसार में तुमने अनेक लोगों और वस्तुओं से मन लगाया, यहां तक कि तुमने उन्हें अपने भविष्य के संबंध में प्रभावी माना, तुमने बहुत सी धन-संपत्ति भी एकत्रित कर ली थी और तुम सोचते थे कि ये लोग और यह धन संपत्ति एक दिन तुम्हारे काम आएगी परंतु आज तुम अकेले हमारे पास आ रहे हो। तुम्हारे सारे संबंध टूट चुके हैं और तुम्हारी सारी कल्पनाएं और आकांक्षाए समाप्त हो चुकी हैं, आज के दिन के लिए तुमने क्या सोचा है?इस आयत से हमने सीखा कि मृत्यु के पश्चात जीवन की व्यवस्था सामूहिक नहीं बल्कि व्यक्तिगत है। प्रलय में सामाजिक और पारिवारिक संबंध समाप्त हो जाएंगे।शक्ति, सत्ता और धन संपत्ति का खोखला होना, मृत्यु के समय स्पष्ट हो जाता है।आइये अब सूरए अनआम की आयत नंबर 95 की तिलावत सुनते हैं।إِنَّ اللَّهَ فَالِقُ الْحَبِّ وَالنَّوَى يُخْرِجُ الْحَيَّ مِنَ الْمَيِّتِ وَمُخْرِجُ الْمَيِّتِ مِنَ الْحَيِّ ذَلِكُمُ اللَّهُ فَأَنَّى تُؤْفَكُونَ (95)निसंदेह ईश्वर दाने और गुठली का फाड़ने वाला है, वह जीवित को मरे हुए से और मरे हुए को जीवित से निकालता है। वही तुम्हारा ईश्वर है तो तुम कहां बहके जा रहे हो। (6:95)यह आयत, प्राणियों के जीवन तथा मृत्यु में ईश्वर की भूमिका की ओर संकेत करती है तथा प्रकृति में जीवन के कुछ उदाहरणों का उल्लेख करती है। धरती में दाना बोना मनुष्य का काम है परंतु धरती के भीतर उसे फोड़ना और उससे दाना उगाना ईश्वर का काम है। पौधा उगाने के लिए आवश्यक पानी, धरती और हवा, ईश्वर के नियंत्रण में है। वही जीवित पौधे को निर्जीव बीज से बाहर निकालता है, और जीवित पेड़ से निर्जीव गुठलियों को दूर करता है।इस आयत से हमने सीखा कि प्रकृति का अध्ययन करना तथा सृष्टि की वस्तुओं पर ध्यान देना, ईश्वर को पहचानने के बेहतरीन मार्गों में से एक है।जिस व्यक्ति को ईश्वर रोज़ी या आजीविका देता है वह, ईश्वर को छोड़कर किसी अन्य के पास कैसे जा सकता है?आइये अब सूरए अनआम की आयत नंबर 96 की तिलावत सुनते हैं।فَالِقُ الْإِصْبَاحِ وَجَعَلَ اللَّيْلَ سَكَنًا وَالشَّمْسَ وَالْقَمَرَ حُسْبَانًا ذَلِكَ تَقْدِيرُ الْعَزِيزِ الْعَلِيمِ (96)(ईश्वर) प्रभात का फाड़ने वाला है और उसने रात को आराम और सूर्य तथा चंद्रमा को (दिनों के) गिनने का माध्यम बनाया है। यह उस प्रभुत्वशाली और तत्वदर्शी (ईश्वर) द्वारा निर्धारित की गयी व्यवस्था है। (6:96)यह आयत इस ओर संकेत करती है कि ईश्वर न केवल दाने बल्कि प्रभात का भी फाड़ने वाला है। यदि वह निर्जीव धरती के भीतर दाने को फाड़कर उसमें से पौधे को उगाता है तो उसने एक अत्यंत सूक्ष्म तथा नपे तुले कार्यक्रम द्वारा धरती के लोगों के लिए रात और दिन की व्यवस्था बनाई है ताकि वे रात में आराम करें और सूरज के निकलते ही काम के लिए उठ खड़े हों।शायद कहा जा सकता है कि प्रतिदिन आकाश में हम जो सबसे सुन्दर दृश्य देखते हैं वह सूर्योदय है कि जो जीवन और उसके लिए आवश्यक गर्मी अपने साथ लाता है। धरती तथा चंद्रमा द्वारा, सूर्य की परिक्रमा न केवल दिन और रात उत्पन्न करती है बल्कि यह दिन गिनने का भी एक बेहतरीन साधन है ताकि मनुष्य अपने कर्मों के लिए सही कार्यक्रम और समय निर्धारित कर सके।इस आयत से हमने सीखा कि सृष्टि की सूक्ष्म व्यवस्था के बारे में चिंतन, ईश्वर को पहचानने और उससे अवगत होने का एक अच्छा मार्ग है।ईश्वर का काम, एक नपे-तुले कार्यक्रम के अंतर्गत है, उसकी सृष्टियों में भी सुव्यवस्था पायी जाती है, अतः हमें भी कार्यक्रम के अंतर्गत काम करना चाहिए वरना सृष्टि से अलग दिखाई देंगे।आइये अब सूरए अनआम की आयत नंबर 97 की तिलावत सुनते हैं।وَهُوَ الَّذِي جَعَلَ لَكُمُ النُّجُومَ لِتَهْتَدُوا بِهَا فِي ظُلُمَاتِ الْبَرِّ وَالْبَحْرِ قَدْ فَصَّلْنَا الْآَيَاتِ لِقَوْمٍ يَعْلَمُونَ (97)और वह (ईश्वर) वही है जिसने तुम्हारे लिए सितारे बनाए हैं ताकि उनके द्वारा तुम धरती और समुद्र के अंधकारों में मार्ग पा सको। निसंदेह हमने सभी निशानियों का उस जाति के लिए सविस्तार वर्णन कर दिया है जो जानने वाली है। (6:97)मनुष्य के प्रतिदिन के जीवन में सूर्य व चंद्रमा की महत्त्वपूर्ण भूमिका के अतिरिक्त, अपनी अत्याधिक संख्या और व्यापकता के साथ, सितारे भी सृष्टि में ईश्वर की निशानियों में से हैं और ब्रह्मांड की युक्तिपूर्ण रचना का पता देते हैं। अभी ऐसे असंख्य सितारे हैं जिन्हें पहचाना नहीं जा सका है।क़ुरआन, सितारों की रचना को, मनुष्य के लिए बताता है परंतु अभी भी मानव जीवन में सितारों की मुख्य भूमिका को समझा नहीं जा सका है। इस आयत में थल और समुद्र की यात्रा में दिशा पहचानने के लिए, सितारों को एक साधन बताया गया है। प्राचीन काल में मनुष्य के पास दिशा को पहचानने के लिए कोई उपकरण नहीं था, अतः सितारे इस संबंध में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते थे।मूल रूप से इस्लाम प्रकृति पर विशेष ध्यान देता है। उदाहरण स्वरूप प्रतिदिन की नमाज़ों के समय का निर्धारण सूर्य द्वारा किया जाता है। रमज़ान तथा अन्य महीनों का पहला और अंतिम दिन चंद्रमा द्वारा निर्धारित होता है। चंद्रग्रहण और सूर्यग्रहण के समय एक विशेष नमाज़ पढ़ी जाती है। इसी प्रकार सूखा पड़ने पर वर्षा के लिए भी नमाज़ पढ़ी जाती है। यह सारी बातें इस बात का कारण बनीं कि इस्लामी विद्वान खगोलशास्त्र में दक्षता प्राप्त करें। उन्होंने इस संबंध में अनेक पुस्तकें लिखीं तथा विभिन्न इस्लामी नगरों में खगोलशास्त्र के केन्द्र स्थापित किए।इस आयत से हमने सीखा कि आकाश के सितारों की व्यवस्था इतनी सूक्ष्म है कि उसके द्वारा धरती के मार्गों को ढूंढा जा सकता है।इस बात को स्वीकार नहीं किया जा सकता कि जिस ईश्वर ने यात्रा में मनुष्य के मार्गदर्शन के लिए, मार्गदर्शक रखा है वो उसे जीवन की लंबी यात्रा में बिना मार्गदर्शक के छोड़ देगा।