islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. सूरए अनआम, आयतें 98-102, (कार्यक्रम 216)

    सूरए अनआम, आयतें 98-102, (कार्यक्रम 216)

    Rate this post

    आइये सूरए अनआम की आयत नंबर 98 की तिलावत सुनते हैं।وَهُوَ الَّذِي أَنْشَأَكُمْ مِنْ نَفْسٍ وَاحِدَةٍ فَمُسْتَقَرٌّ وَمُسْتَوْدَعٌ قَدْ فَصَّلْنَا الْآَيَاتِ لِقَوْمٍ يَفْقَهُونَ (98)और वही है जिसने तुम सबको एक जीव से पैदा किया। फिर सबके लिए एक ठहरने का और एक अमानत का स्थान बनाया, हमने अपनी निशानियों को सूझ-बूझ रखने वालों के लिए विस्तार से बयान कर दिया है। (6:98)पिछली आयतों में प्रकृति के बारे में वर्णन करने के पश्चात यह आयत मनुष्य की सृष्टि में ईश्वर की भूमिका की ओर संकेत करते हुए कहती है। ईश्वर ने तुम मनुष्यों को अन्य जीवों की तुलना में श्रेष्ठ बनाया है। तुम सभी, स्त्री हो या पुरुष, काले हो या गोरे, चाहे जिस जाति और क़बीले से तुम्हारा संबंध हो, तुम्हें एक ही तत्व और एक ही व्यक्ति से बनाया गया है। अलबत्ता तुम में से कुछ संसार में आ चुके हैं और जीवन यापन कर रहे हैं तथा कुछ अन्य अभी संसार में नहीं आए हैं और एक अमानत की भांति माता-पिता के शरीर में सुरक्षित हैं और समय आने पर संसार में आएंगे। जिस प्रकार से कि एक गुट संसार में है तथा एक गुट मिट्टी में अमानत स्वरूप सो रहा है तथा प्रलय के दिन क़ब्रों से बाहर निकलेगा।इस आयत से हमने सीखा कि सभी मनुष्य एक दूसरे के भाई हैं तथा वर्गों के अंतर और भेद-भाव का कोई अर्थ नहीं है।एक व्यक्ति से, मनुष्यों की रचना में इतनी अधिक विविधता, रचयिता और सृष्टिकर्ता की महानता का प्रमाण है।आइये अब सूरए अनआम की आयत नंबर 99 की तिलावत सुनते हैं।وَهُوَ الَّذِي أَنْزَلَ مِنَ السَّمَاءِ مَاءً فَأَخْرَجْنَا بِهِ نَبَاتَ كُلِّ شَيْءٍ فَأَخْرَجْنَا مِنْهُ خَضِرًا نُخْرِجُ مِنْهُ حَبًّا مُتَرَاكِبًا وَمِنَ النَّخْلِ مِنْ طَلْعِهَا قِنْوَانٌ دَانِيَةٌ وَجَنَّاتٍ مِنْ أَعْنَابٍ وَالزَّيْتُونَ وَالرُّمَّانَ مُشْتَبِهًا وَغَيْرَ مُتَشَابِهٍ انْظُرُوا إِلَى ثَمَرِهِ إِذَا أَثْمَرَ وَيَنْعِهِ إِنَّ فِي ذَلِكُمْ لَآَيَاتٍ لِقَوْمٍ يُؤْمِنُونَ (99)और वह वही है जिसने आकाश से पानी बरसाया फिर हमने उससे हर प्रकार की वनस्पति उगाई, फिर उससे हरी भरी शाखाएं निकालीं, जिनसे हम गुथे हुए दाने निकालनते हैं। और हमने खजूर की गाभ से लटकते हुए गुच्छे पैदा किए और अंगूर, ज़ैतून तथा अनार के बाग़ पैदा किए जो एक दूसरे से (स्वरूप में मिलते जुलते तथा (स्वाद में) अलग अलग हैं। इसके फल और इसके पकने की ओर देखो कि इसमें ईमान वालों के लिए (कितनी) निशानियां हैं। (6:99)पिछली आयत ने सभी मनुष्यों के एक ही स्रोत से आने की ओर संकेत किया था, यह आयत सभी वनस्पतियों के अस्तित्व के स्रोत और कारक की ओर संकेत करती है कि जो वर्षा का पानी है। अलबत्ता महत्त्वपूर्ण बिन्दु यह है कि पानी बरसाना और पौधे उगाना दोनों की ईश्वर के काम हैं और मनुष्य उनकी भूमि समतल करने के अतिरिक्त कुछ नहीं कर सकता। इस आयत में अंगूर और खजूर जैसे फलों का नाम लिया गया है जिनकी विविधता और प्रजातियां अन्य फलों से कहीं अधिक हैं और इसी प्रकार पौष्टिक्ता की दृष्टि से भी इन्हें अन्य फलों पर श्रेष्ठता प्राप्त है।इस आयत से हमने सीखा कि पेड़ों और फलों से मनुष्य का संबंध केवल भौतिक और पौष्टिक नहीं होना चाहिए बल्कि वैचारिक और एकेश्वरवादी भी होना चाहिए। पेट की ही भांति बुद्धि को भी इन फलों से लाभ उठाना चाहिए और ईश्वर तक पहुंचना चाहिए।प्रकृति पर मनुष्य की दृष्टि साधारण नहीं होनी चाहिए बल्कि उसे गहराई में जाना चाहिए तथा सृष्टि से सृष्टिकर्ता तक पहुंचना चाहिए।आइये अब सूरए अनआम की आयत नंबर 100 की तिलावत सुनते हैं।وَجَعَلُوا لِلَّهِ شُرَكَاءَ الْجِنَّ وَخَلَقَهُمْ وَخَرَقُوا لَهُ بَنِينَ وَبَنَاتٍ بِغَيْرِ عِلْمٍ سُبْحَانَهُ وَتَعَالَى عَمَّا يَصِفُونَ (100)और उन लोगों ने जिन्नों को ईश्वर का समकक्ष ठहराया जबकि ईश्वर (ही) ने उन्हें पैदा किया है। और उन लोगों ने बिना सोचे समझे ईश्वर के लिए बेटे और बेटियां भी तैयार कर दीं जबकि वह आवश्यकता मुक्त, पवित्र और जो कुछ वे उसके बारे में बयान करते हैं, उससे कहीं उच्च है। (6:100)इस्लाम से पूर्व आसमानी धर्मों के मानने वालों ने अपने धर्मों की वास्तविक शिक्षाओं से भटक कर, किसी न किसी व्यक्ति या वस्तु को ईश्वर का समकक्ष ठहराया। ईसाई हज़रत ईसा मसीह को और यहूदी हज़रत उज़ैर को ईश्वर का पुत्र मानते थे। ज़रतुश्ती, जिन्हें भारत में पारसी कहा जाता है, ईश्वर को भलाई का और शैतान को बुराई का प्रतीक मानते हैं कि जो एक प्रकार से शैतान को ईश्वर का समकक्ष ठहराना है। कुछ अरब, जिन्नों को ईश्वर से संबंधित समझते थे, उनका मानना था कि ईश्वर और जिन्नों के बीच पारिवारिक संबंध हैं।यह आयत इस प्रकार के पथभ्रष्ट विचारों के उत्तर में कहती है। जिन्न भी तुम्हारी ही भांति ईश्वर की रचना हैं और ईश्वर के बेटे नहीं हैं कि संसार के संचालन में उसकी सहायता करें। जो कुछ मनुष्य की ज़बान पर या मस्तिष्क में आता है ईश्वर उससे कहीं ऊंचा है और वह मानवीय विशेषताओं से बिल्कुल अलग है। सैद्धांतिक रूप से यदि ईश्वर मनुष्य के मस्तिष्क में आ जाए तो वह उसकी रचना बन जाएगा जबकि वह मनुष्य का रचयिता है।इस आयत से हमने सीखा कि अज्ञानता, अंधविश्वास की जड़ है। आस्था संबंधी मामलों में मनुष्य को ज्ञान के आधार पर काम करना चाहिए न कि अंधविश्वास के आधार पर।ईश्वर की पत्नी और समकक्ष है ही नहीं कि उसकी संतान और वंश हो, फिर किस प्रकार लोग ईश्वर की संतान में आस्था रखते हैं।आइये अब सूरए अनआम की आयत नंबर 101 और 102 की तिलावत सुनते हैं।بَدِيعُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ أَنَّى يَكُونُ لَهُ وَلَدٌ وَلَمْ تَكُنْ لَهُ صَاحِبَةٌ وَخَلَقَ كُلَّ شَيْءٍ وَهُوَ بِكُلِّ شَيْءٍ عَلِيمٌ (101) ذَلِكُمُ اللَّهُ رَبُّكُمْ لَا إِلَهَ إِلَّا هُوَ خَالِقُ كُلِّ شَيْءٍ فَاعْبُدُوهُ وَهُوَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ وَكِيلٌ (102)(वह) आकाशों और धरती को अस्तित्व में लाने वाला है, किस प्रकार उसके संतान हो सकती है जबकि उसकी तो कोई पत्नी ही नहीं रही है और उसने हर वस्तु की रचना की है और वह हर बात का जानने वाला है। (6:101) वही ईश्वर तुम्हारा पालनहार है कि जिसके अतिरिक्त कोई पूज्य नहीं, वही हर वस्तु का सृष्टिकर्ता है तो उसी की उपासना करो और वही हर वस्तु का रक्षक है। (6:102)इन आयतों में ईश्वर पुनः अपने अनन्य होने तथा सृष्टि व संसार के संचालन पर बल देते हुए कहता है कि उसी ने सृष्टि की रचना की है और वह उसके सभी रहस्यों तथा विशेषताओं से अवगत है। उसे किसी की आवश्यकता नहीं है कि तुम उसके लिए पत्नी या संतान तैयार करो। अब जबकि वह तुम्हारा एकमात्र सृष्टिकर्ता है तो तुम केवल उसी की उपासना करो और उसके अतिरिक्त किसी को पूज्य मत मानो।इन आयतों से हमने सीखा कि हमें क़ुरआन द्वारा बताए गये ईश्वर तथा फेर-बदल की गयी किताबों द्वारा बताए गये ईश्वर के अंतर को समझना चाहिए।ईश्वर की उपासना का स्रोत, उसकी सृष्टि है। वह उपासना योग्य है जिसके हाथ में हमारी सृष्टि है।