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    सूरए अन्फ़ाल, आयतें 1-4, (कार्यक्रम 279)

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    पिछले कार्यक्रम में हमने सूरए आराफ़ की आयतों की व्याख्या समाप्त की। आज के कार्यक्रम से हम क़ुरआने मजीद के आठवें सूरे, सूरए अन्फ़ाल की आयतों की व्याख्या आरंभ करेंगे। यह सूरा मदीने में पैग़म्बर के पास आया और इसमें पचहत्तर आयतें हैं। अन्फ़ाल का अर्थ होता है सार्वजनिक माल। तो आइये अब सूरए अन्फ़ाल की पहली आयत की तिलावत सुनते हैं।بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ يَسْأَلُونَكَ عَنِ الْأَنْفَالِ قُلِ الْأَنْفَالُ لِلَّهِ وَالرَّسُولِ فَاتَّقُوا اللَّهَ وَأَصْلِحُوا ذَاتَ بَيْنِكُمْ وَأَطِيعُوا اللَّهَ وَرَسُولَهُ إِنْ كُنْتُمْ مُؤْمِنِينَ (1)ईश्वर के नाम से जो अत्यंत कृपाशील और दयावान है। (हे पैग़म्बर!) ये लोग आपसे अन्फ़ाल के बारे में पूछते हैं। कह दीजिए कि अन्फ़ाल ईश्वर और उसके पैग़म्बर के लिए है अतः तुम लोग ईश्वर से डरो और आपस में सुधार करो और यदि तुम ईमान वाले हो तो ईश्वर और उसके पैग़म्बर का अनुसरण करो। (8:1)पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम द्वारा मक्के से मदीने हिजरत या पलायन के पश्चात सन दो हिजरी में मुसलमानों और अनेकेश्वरवादियों के बीच बद्र नामक स्थान पर युद्ध हुआ जिसमें अनेकेश्वरवादियों को पराजय और मुसलमानों को विजय मिली। इसी के साथ उनका ढेरों माल, मुसलमानों के हाथ लगा, अतः मुसलमानों ने पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम से उस माल के बंटवारे के बारे में प्रश्न किया। पैग़म्बर इस संबंध में ईश्वरीय आदेश की प्रतीक्षा कर रहे थे कि ईश्वर की ओर से सूरए अन्फ़ाल की आरंभिक आयतें उतरीं जिनमें युद्ध के दौरान प्राप्त होने वाले माले के बंटवारे का अधिकार पैग़म्बर को दिया गया था।पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम ने अरब समाज में प्रचलित भेदभावपूर्ण पद्धति के विपरीत पूरे माल को सभी योद्धाओं के बीच समान रूप से बांट दिया ताकि अरबों में अज्ञानता के काल से प्रचलित भेदभाव को समाप्त किया जा सके।उल्लेखनीय है कि अन्फ़ाल शब्द का अर्थ युद्ध में शत्रु से मिलने वाले माल के अतिरिक्त, हर प्रकार की सार्वजनिक संपत्ति तथा प्राकृतिक स्रोत जैसे वन व खदान इत्यादि भी होता है और इनका अधिकार पैग़म्बर और उनके उतराधिकारियों के हाथ में दिया गया है। अतः आयत का अंतिम भाग ईमान वालों को पैग़म्बर के आज्ञापालन का आदेश देते हुए कहती है कि यदि तुम ईमान वाले हो तो ईश्वर और उसके पैग़म्बर का अज्ञापालन करो।ये आयत लोगों के बीच सुधार के विषय की ओर संकेत करते हुए कहती है। इस बात की कदापि अनुमति न दो कि आर्थिक व सांसारिक बातें तुम्हारे आपसी संबंधों को बिगाड़ कर तुम्हारे बीच द्वेष की ज्वाला भड़का दें। तुम लोग ईश्वर से डरते रहो और शैतान व अपनी आंतरिक इच्छाओं को स्वयं से दूर करके सदैव एक दूसरे के साथ मेल मिलाप से रहो।इस आयत से हमने सीखा कि इस्लाम, समाज और अर्थव्यवस्था का धर्म है और उसके पास समाज के आर्थिक मामलों के लिए विशेष कार्यक्रम हैं। मुसलमानों को अपने आर्थिक मामलों के लिए पैग़म्बर और क़ुरआन से संपर्क करना चाहिए।यद्यपि ईमान वालों को शत्रुओं के मुक़ाबले में कठोर और शक्तिशाली होना चाहिए किन्तु उन्हें आपस में प्रेम, शांति और विनम्रता के साथ रहना चाहिए।ईश्वर तथा पैग़म्बर के आदेश के प्रति समर्पित और नतमस्तक रहना, ईमान की पहली शर्त है। हो सकता है कि बहुत से लोग जेहाद के मैदान में शत्रु से लड़ने के लिए आ जाएं किन्तु शत्रु से प्राप्त माल के बंटवारे की परीक्षा में अनुत्तीर्ण रहें।आइये अब सूरए अन्फ़ाल की आयत संख्या 2 और 3 की तिलावत सुनते हैं।إِنَّمَا الْمُؤْمِنُونَ الَّذِينَ إِذَا ذُكِرَ اللَّهُ وَجِلَتْ قُلُوبُهُمْ وَإِذَا تُلِيَتْ عَلَيْهِمْ آَيَاتُهُ زَادَتْهُمْ إِيمَانًا وَعَلَى رَبِّهِمْ يَتَوَكَّلُونَ (2) الَّذِينَ يُقِيمُونَ الصَّلَاةَ وَمِمَّا رَزَقْنَاهُمْ يُنْفِقُونَ (3)ईमान वाले तो वही लोग हैं जिन के सामने जब ईश्वर का नाम लिया जाता है तो उनके हृदय कांप उठते हैं और जब उनके समक्ष ईश्वर की आयतों की तिलावत की जाती है तो उनके ईमान में वृद्धि होती है और जो केवल अपने पालनहार पर ही भरोसा करते हैं। (8:2) जो लोग नमाज़ क़ायम करते हैं और जो कुछ हमने उन्हें रोज़ी दी है उसमें से ग़रीबों को भी देते हैं। (8:3)पिछली आयत में ईमान की शर्तों की ओर संकेत करने के पश्चात इस आयत में वास्तविक ईमान वालों का इस प्रकार वर्णन किया गया है कि वे ऐसे लोग होते हैं कि ईश्वर की याद और क़ुरआन की तिलावत उनके ईमान में वृद्धि करती है और उनके हृदय को हिला देती है। ईश्वर की महानता की उन्हें ऐसी पहचान है कि वे ईश्वर के अतिरिक्त किसी और की ओर आकृष्ट नहीं होते।ईश्वरीय दंड व कोप की याद, ईमान वाले के दिल को हिला देती है और ईश्वरीय प्रेम व दया का स्मरण, उसके हृदय को शांत कर देता है, ठीक उस बच्चे की भांति जो अपने माता पिता से डरता भी है उनके कारण उसके मन को ढारस भी रहती है।ये ईमान वालों की मनोभावना होती है जिसकी कुछ प्रत्यक्ष निशानियां भी होती हैं जैसे नमाज़ पढ़ना और ज़कात देना। नमाज़, मनुष्य के भीतर ईश्वर की याद को स्थिर व सुदृढ़ बनाती है और ज़कात या दान दक्षिणा से उसके और अन्य लोगों के बीच संपर्क स्थापित होता है।इन आयतों से हमने सीखा कि ईमान की निशानी, भीतर से भी ईश्वर से डरना है और बाह्य रूप से भी उसी के अनुरूप व्यवहार करना है।ईमान के दर्जे होते हैं जिनमें कमी या वृद्धि हो सकती है। क़ुरआने मजीद की तिलावत, ईमान में वृद्धि करती है।अपनी धन संपत्ति के कुछ भाग को ईश्वर के मार्ग में देना, ईमान का अनिवार्य भाग है। कंजूस व्यक्ति ईश्वर की दया से वंचित रहता है।आइये अब सूरए अन्फ़ाल की आयत संख्या 4 की तिलावत सुनते हैं।أُولَئِكَ هُمُ الْمُؤْمِنُونَ حَقًّا لَهُمْ دَرَجَاتٌ عِنْدَ رَبِّهِمْ وَمَغْفِرَةٌ وَرِزْقٌ كَرِيمٌ (4)यही वास्तविक ईमान वाले हैं। इनके पालनहार के पास इनके लिए (ईमान के) दर्जे हैं, क्षमा है और सम्मानित आजीविका है। (8:4)ये आयत ईमान वालों को मिलने वाले पारितोषिक की ओर संकेत करते हुए कहती है कि ईमान केवल ज़बानी दावा या नारा नही है बल्कि ये एक ऐसी वास्तविकता है जिसे मनुष्य के भीतर तक प्रभाव डालना चाहिए ताकि उसे ईमान वाला कहा जा सके और जो कोई ईमान और विश्वास के इस दर्जे तक पहुंच जाए तो ईश्वर के निकट उसका उच्च स्थान होता है। उसे ईश्वरीय रोज़ी और आजीविका भी प्राप्त होती है और वो ईश्वरीय क्षमा का भी पात्र बनता है।स्पष्ट है कि ईश्वरीय पारितोषिक प्रलय से विशेष नहीं है और ईश्वर इस संसार में भी वास्तविक ईमान वालों को पारितोषिक देता है अलबत्ता यह पारितोषिक उनकी सांसारिक क्षमताओं के अनुकूल होता है।इस आयत से हमने सीखा कि लोगों के ईमान के दर्जे होते हैं जिनमें कमी और वृद्धि हो सकती है अतः उनके लिए ईश्वरीय दर्जे में भी कमी या वृद्धि हो सकती है।वास्तविक ईमान वालों के भी बहकने का ख़तरा होता है अतः उन्हें भी ईश्वरीय क्षमा की आवश्यकता होती है।