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    सूरए अन्फ़ाल, आयतें 10-14, (कार्यक्रम 281)

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    आइये पहले सूरए अन्फ़ाल की दसवीं आयत की तिलावत सुनते हैंوَمَا جَعَلَهُ اللَّهُ إِلَّا بُشْرَى وَلِتَطْمَئِنَّ بِهِ قُلُوبُكُمْ وَمَا النَّصْرُ إِلَّا مِنْ عِنْدِ اللَّهِ إِنَّ اللَّهَ عَزِيزٌ حَكِيمٌ (10)और ईश्वर ने (बद्र के युद्ध में) फ़रिशतों द्वारा सहायता को केवल शुभ सूचना और तुम्हारे हृदयों को निश्चित करने के लिए भेजा था और सहायता तो केवल ईश्वर ही की ओर से है। निसंदेह, ईश्वर अत्यंत शक्तिशाली और तत्वदर्शी है। (8:10)पिछले कार्यक्रम में हमने बताया था कि अनकेश्वरवादियों के साथ मुसलमानों के पहले युद्ध में ईश्वर ने इस्लामी सेना को मनोबल प्रदान करने के लिए उनके साथ फ़रिशतों को भेजा। इसी कारण वे अत्यंत कम संख्या में होने और अत्यंत साधारण शस्त्रों के साथ, शत्रु की भारी सेना पर विजयी रहे।इस आयत में ईश्वर कहता है कि बद्र के युद्ध में फ़रिश्तों को शस्त्र देकर नहीं उतारा गया था कि वे शत्रुओं से युद्ध करें बल्कि वे तुम्हारा मनोबल बढ़ा रहे थे तथा विजय के प्रति तुम्हें आशा दिला रहे थे। इसी हार्दिक आशा और संतोष के कारण तुम विजयी रहे।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर की शुभ सूचनाएं, इस्लामी योद्धाओं का मनोबल बढ़ाती है और उनकी विजय का मार्ग प्रशस्त करती हैं।केवल शस्त्रों और सैनिक क्षमता के आधार पर शत्रु को पराजित नहीं किया जा सकता इसके लिए ईश्वरीय सहायता भी आवश्यक है।आइये अब सूरए अन्फ़ाल की आयत संख्या 11 की तिलावत सुनते हैं।إِذْ يُغَشِّيكُمُ النُّعَاسَ أَمَنَةً مِنْهُ وَيُنَزِّلُ عَلَيْكُمْ مِنَ السَّمَاءِ مَاءً لِيُطَهِّرَكُمْ بِهِ وَيُذْهِبَ عَنْكُمْ رِجْزَ الشَّيْطَانِ وَلِيَرْبِطَ عَلَى قُلُوبِكُمْ وَيُثَبِّتَ بِهِ الْأَقْدَامَ (11)(याद करो) उस समय को जब ईश्वर ने तुम्हारे आराम के लिए तुम्हें हल्की नींद सुला दिया और आकाश से तुम्हारे लिए वर्षा बरसाई ताकि उसके माध्यम से तुम्हें पवित्र करे और शैतान की गंदगी से तुम को दूर कर दे और तुम्हारे हृदयों को मज़बूत और तुम्हारे क़दमों को सुदृढ़ बना दे। (8:11) 

    इतिहास में वर्णित है कि जब मुसलमानों ने बद्र के क्षेत्र में शत्रुओं की सेना की संख्या और क्षमता को देखा तो उनके भीतर लड़ाई न लड़ने की भावना उत्पन्न होने लगी, अतः इन आयतों में ईश्वर कहता है कि हमने शांत व संतुष्ट करने के लिए ऐसा कार्य किया कि तुम उस मरूस्थल में रात को आराम से सो सको और तुम्हारे भीतर बेचैनी उत्पन्न न हो। इसी के साथ हमने वर्षा भेजी ताकि तुम्हारे पास पीने और अन्य कार्यों के लिए पर्याप्त मात्रा में पानी रहे और साथ ही तुम्हारे पैरों की नीचे की मिट्टी भी मज़बूत हो जाए। वर्षा मनुष्य को प्रभुल्लित करती है और उसे कठिन कार्य करने के लिए प्रेरित करती है। इसी प्रकार वर्षा से पराजय के प्रति तुम्हारे मन में उठने वाले शैतानी उकसावे भी समाप्त हो जाएंगे।इस आयत से हमने सीखा कि यदि मनुष्य ईश्वर पर ईमान और धैर्य रखे तो ईश्वर भी प्राकृतिक माध्यमों से उसकी सहायता करता है।बाह्य और विदित पवित्रता के साथ ही, आंतरिक पवित्रता पर भी ध्यान रखना चाहिए जिसमें कोई शैतानी उकसावा न हो।आइये अब सूरए अन्फ़ाल की आयत संख्या 12 की तिलावत सुनते हैं।إِذْ يُوحِي رَبُّكَ إِلَى الْمَلَائِكَةِ أَنِّي مَعَكُمْ فَثَبِّتُوا الَّذِينَ آَمَنُوا سَأُلْقِي فِي قُلُوبِ الَّذِينَ كَفَرُوا الرُّعْبَ فَاضْرِبُوا فَوْقَ الْأَعْنَاقِ وَاضْرِبُوا مِنْهُمْ كُلَّ بَنَانٍ (12)जब तुम्हारे पालनहार ने फ़रिशतों के पास अपना विशेष संदेश भेजा कि मैं तुम्हारे साथ हूं, तो तुम ईमान वालों को सुदृढ़ बनाओ। मैं शीघ्र की काफ़िरों के हृदयों में आतंक उत्पन्न कर दूंगा, तो तुम काफ़िरों की गर्दन मार दो और उनकी पोर-पोर काट दो। (8:12)

    बद्र के युद्ध में मुसलमानों को मिलने वाली ईश्वरीय सहायता का वर्णन जारी रखते हुए, क़ुरआने मजीद इस आयत में कहता है कि ईश्वर ने फ़रिशतों को मुस्लिम योद्धाओं का मनोबल बढ़ाने के लिए भेजने के पश्चात उनके पास वहि भेजकर कहा कि मैं तुम्हारे साथ हूं और जिस प्रकार ईमान वालों के हृदयों में आशा उत्पन्न करता हूं। उसी प्रकार काफ़िरों के हृदय में भय और आतंक उत्पन्न कर दूंगा, किन्तु शत्रु को मैं समाप्त नहीं करूंगा, तुम ईमान वालों को मैदान में आना चाहिए और पूरी शक्ति के साथ संघर्ष करके उनकी गर्दन और सिर काट देना चाहिए या फिर अपनी तलवारों से उनके हाथ पैर काट डालने चाहिए ताकि वे न तो भाग सकें और न ही लड़ सकें।इस आयत से हमने सीखा कि यदि हम ईमान वाले हों तो ईश्वर हमें हार्दिक शांति प्रदान करेगा तथा हमारे शत्रुओं के हृदय में भय और आतंक उत्पन्न करेगा।यदि हम वास्तविक योद्धा हों तो ईश्वर हमारी सहायता करेगा। हमें भागकर तथा अपनी जान बचाकर यह आशा नहीं करनी चाहिए कि ईश्वर शत्रुओं को पराजित कर देगा।आइये अब सूरए अन्फ़ाल की आयत संख्या 13 और 14 की तिलावत सुनते हैं।ذَلِكَ بِأَنَّهُمْ شَاقُّوا اللَّهَ وَرَسُولَهُ وَمَنْ يُشَاقِقِ اللَّهَ وَرَسُولَهُ فَإِنَّ اللَّهَ شَدِيدُ الْعِقَابِ (13) ذَلِكُمْ فَذُوقُوهُ وَأَنَّ لِلْكَافِرِينَ عَذَابَ النَّارِ (14)वह (ईश्वरीय सहायता) इसलिए थी कि उन (काफ़िरों ने) ईश्वर और उसके पैग़म्बर का विरोध किया था और जो कोई ईश्वर तथा उसके पैग़म्बर का विरोध करेगा तो ईश्वर(उसे) कड़ा दंड देने वाला है। (8:13) यह (तो) संसार का दंड है तो इसे चखो और जान लो कि निश्चित रूप से काफ़िरों के लिए नरक का दंड तैयार है। (8:14)

    यह आयत काफ़िरों पर मुसलमानों के आक्रमण को उनके लिए एक प्रकार का दंड बताते हुए कहती है कि वे लोग सदैव ही ईश्वरीय आयतों और पैग़म्बर के कथनों के विरोधी रहे हैं, यहां तक कि वे उन्हें सुनने के लिए भी तैयार नहीं होते थे, इसलिए ईश्वर ने उन्हें दंडित करने हेतु ईमानों वालों की सहायता की और वे विजयी हो गए। यही उनके लिए सांसारिक दंड है और प्रलय में भी उनके लिए नरक का दंड तैयार है।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वरीय कोप और दंड अकारण नहीं होता बल्कि वह स्वयं मनुष्यों की उद्दंडता का ही परिणाम हुआ करता है।ईश्वर की परंपरा यह है कि जो कोई सत्य से टकराया वह नष्ट हो गया।