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    सूरए अन्फ़ाल, आयतें 15-21, (कार्यक्रम 282)

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    आइये अब सूरए अन्फ़ाल की आयत संख्या 15 और 16 की तिलावत सुनते हैं। يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آَمَنُوا إِذَا لَقِيتُمُ الَّذِينَ كَفَرُوا زَحْفًا فَلَا تُوَلُّوهُمُ الْأَدْبَارَ (15) وَمَنْ يُوَلِّهِمْ يَوْمَئِذٍ دُبُرَهُ إِلَّا مُتَحَرِّفًا لِقِتَالٍ أَوْ مُتَحَيِّزًا إِلَى فِئَةٍ فَقَدْ بَاءَ بِغَضَبٍ مِنَ اللَّهِ وَمَأْوَاهُ جَهَنَّمُ وَبِئْسَ الْمَصِيرُ (16) हे ईमान वालों जब तुम (रणक्षेत्र में) काफ़िरों से भिड़ो तो उन्हें पीठ न दिखाओ (8:15) और आज के दिन जो पीठ दिखाएगा तो ईश्वर के कोप का पात्र बनेगा और उसका ठिकाना नरक होगा और वो कितना बुरा ठिकाना है, सिवाए उन लोगों के जो रणनीति के आधार पर पीछे हटें हों या अन्य योद्धाओं से मिलने के लिए अपना स्थान छोड़ दें। (8:16)पिछले कार्यक्रम में बद्र के युद्ध की घटना की ओर संकेत किया गया। ये आयतें युद्ध के समय रणक्षेत्र में अनुशासन की आवश्यकता पर बल देते हुए कहती हैं। कभी भी शत्रु की अधिक संख्या के कारण रणक्षेत्र से भागना नहीं चाहिए। किसी भी ईमान वाले के लिए रणक्षेत्र से भागना वैध नहीं है। केवल अपने को पुनः सुव्यवस्थित करने, शस्त्र लेने या फिर अपने अन्य गुट से मिलकर सामूहिक आक्रमण के लिए पीछे हटा जा सकता है जिसे आजकल रणनैतिक युक्ति कहते हैं।इन आयतों से हमने सीखा कि रणक्षेत्र से भागना महापाप है और ऐसा करने वाला व्यक्ति ईश्वरीय कोप का पात्र बनता है।रणक्षेत्र में शत्रु को धोखा देने के लिए रणनैतिक युक्ति के अंतर्गत पीछे हटा जा सकता है।युद्ध और रणक्षेत्र से पीठ दिखाकर भागने से सांसारिक अपमान और प्रलय का दंड दोनों मिलता है और बड़ा बुरा परिणाम ऐसे लोगों की प्रतीक्षा में होता है।आइये अब सूरए अन्फ़ाल की आयत संख्या 17 और 18 की तिलावत सुनते हैं।فَلَمْ تَقْتُلُوهُمْ وَلَكِنَّ اللَّهَ قَتَلَهُمْ وَمَا رَمَيْتَ إِذْ رَمَيْتَ وَلَكِنَّ اللَّهَ رَمَى وَلِيُبْلِيَ الْمُؤْمِنِينَ مِنْهُ بَلَاءً حَسَنًا إِنَّ اللَّهَ سَمِيعٌ عَلِيمٌ (17) ذَلِكُمْ وَأَنَّ اللَّهَ مُوهِنُ كَيْدِ الْكَافِرِينَ (18)तो (हे ईमान वालों!) काफ़िरों को तुमने नहीं मारा बल्कि ईश्वर ने मारा है और (हे पैग़म्बर!) जब आप तीर चला रहे थे तो आप नहीं बल्कि ईश्वर तीर चला रहा था ताकि ईमान वालों की भली भांति परीक्षा ले ले निसंदेह ईश्वर सुनने वाला और जानकार है। (8:17) (शत्रु की) ये (पराजय) ईश्वर की कृपा थी और जान लो कि निसंदेह ईश्वर, शत्रुओं की चाल को कमज़ोर बनाने वाला है। (8:18)ये आयतें ईमान वालों को सचेत करती हैं कि वे घमंड न करें और ये न सोचने लगें कि उनकी शक्ति और रणकौशल से ही उन्हें युद्ध में विजय प्राप्त हुई है। आयत कहती है कि ये ईश्वर की सहायता और उसका संकल्प था जिसने शत्रुओं को धूल चटाई। जिसने तुम्हारे बाणों और भालों को लक्ष्य तक पहुंचाया वो ईश्वर था। यह रणक्षेत्र, ईश्वरीय परीक्षा का मैदान था ताकि ईमान वालों की सबसे बेहतर ढंग से परीक्षा ली जा सके और ईश्वर के मार्ग में अपने प्राणों की आहूति देने से बढ़कर कौन सी परीक्षा हो सकती है जो हर स्थिति में हमारे हर कर्म को देख रहा होता है।ईश्वरीय परीक्षाएं कभी अनुकंपा और विजय के साथ होती हैं जिन्हें भली परीक्षा कहा जाता और कभी कठिनाइयों के साथ होती हैं जिन्हें बुरी परीक्षाएं कहा जाता है।इन आयतों से हमने सीखा कि युद्ध और जेहाद, परीक्षा के माध्यम हैं ताकि कमज़ोर ईमान वालों से वास्तविक ईमान वालों को अलग किया जा सके।मनुष्य जो कुछ करता है वो उसके अधिकार के कारण उसका कर्म कहलाता है किन्तु चूंकि वो काम ईश्वर की शक्ति के माध्यम से होता है अतः उसे ईश्वर से संबंधित कहा जाता है और मनुष्य अपने कार्यों में ईश्वर से आवश्यकता मुक्त नहीं होता।ईश्वर वास्तविक ईमान वालों का समर्थन करता है और शत्रुओं के षड्यंत्रों को विफल बना देता है।आइये अब सूरए अन्फ़ाल की आयत संख्या 19 की तिलावत सुनते हैं।إِنْ تَسْتَفْتِحُوا فَقَدْ جَاءَكُمُ الْفَتْحُ وَإِنْ تَنْتَهُوا فَهُوَ خَيْرٌ لَكُمْ وَإِنْ تَعُودُوا نَعُدْ وَلَنْ تُغْنِيَ عَنْكُمْ فِئَتُكُمْ شَيْئًا وَلَوْ كَثُرَتْ وَأَنَّ اللَّهَ مَعَ الْمُؤْمِنِينَ (19)यदि तुम विजय के इच्छुक हो तो वो विजय आ गई और यदि तुम (विरोध) छोड़ दो तो ये तुम्हारे लिए बेहतर है और यदि तुम पलट गए तो हम भी पलट जाएंगे और तुम्हारी संख्या चाहे जितनी हो तुम्हारे काम नहीं आएगी क्यों कि ईश्वर ईमान वालों के साथ साथ है। (8:19)क़ुरआने मजीद के कुछ व्याख्याकारों का मानना है कि बद्र के युद्ध में शत्रु को पराजित करने के पश्चात मुसलमानों में, शत्रु के माल के बंटवारे को लेकर मतभेद उत्पन्न हो गया और वे पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम से बहस करने लगे और ये आयत उन्हीं लोगों को संबोधित करती है किन्तु अधिकांश व्याख्याकारों का मानना है कि इस आयत में काफ़िरों और अनेकेश्वरवादियों को संबोधित किया गया है।ये आयत कहती है कि मुसलमानों को विजय प्राप्त हुई और ईश्वर ने सत्य को स्पष्ट कर दिया। आयत का संबोधन दोनों में से जिस गुट से भी हो, ईश्वर ये कह रहा है कि पैग़म्बर के साथ बहस और उनके आदेश पर आपत्ति का परिणाम, ईश्वरीय कोप के रूप में निकलेगा और कोई भी गुट ईश्वरीय दंड से मनुष्य को बचाने में सक्षम नहीं है।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर तथा पैग़म्बर के आदेश का विरोध न करने में ही मनुष्य की भलाई है।ईश्वरीय सहायता की प्राप्ति के लिए मूल शर्त ईमान और उस पर कटिबद्धता है, इसी प्रकार ईश्वरीय कोप के सामने लोगों की बड़ी संख्या का कोई प्रभाव नहीं है।आइये अब सूरए अन्फ़ाल की आयत संख्या 20 और 21 की तिलावत सुनते हैं।يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آَمَنُوا أَطِيعُوا اللَّهَ وَرَسُولَهُ وَلَا تَوَلَّوْا عَنْهُ وَأَنْتُمْ تَسْمَعُونَ (20) وَلَا تَكُونُوا كَالَّذِينَ قَالُوا سَمِعْنَا وَهُمْ لَا يَسْمَعُونَ (21)हे ईमान वालों! ईश्वर और उसके पैग़म्बर का आज्ञापालन करो और उससे मुंह न मोड़ो जबकि तुम सुन (भी) रहे हो। (8:20) और उन लोगों की भांति न हो जाओ कि जिन्होंने कहाः हमने सुना। जबकि उन्होंने (कुछ) नहीं सुना। (8:21)ये आयतें ईमान वालों को ईश्वर और उसके पैग़म्बर के संपूर्ण आज्ञापालन करने और हर प्रकार की उद्दंडता से दूर रहने का निमंत्रण देते हुए कहती हैः तुम लोगों को जो पैग़म्बर की बातें सुनते हो और उन पर ईमान रखते हो, कदापि उनके आदेश और इच्छा का विरोध नहीं करना चाहिए। ईश्वर पर ईमान की शर्त, पैग़म्बर का आज्ञापालन है वरना तुम भी उन लोगों की भांति हो जाओगे जो ज़बान से तो कहते थे कि हमने पैग़म्बर की बातें सुनीं और हम उन्हें स्वीकार करते हैं किन्तु व्यवहार में वे उन्हें महत्त्व नहीं देते थे।इन आयतों से हमने सीखा कि ईमान वाले भी धर्म के आदेशों से विचलित हो सकते हैं अतः उन्हें भी सदैव सचेत करते रहने की आवश्यकता होती है।सत्य को सुनने और समझने से उत्तरदायित्व बढ़ता है और स्वयं को अज्ञानी नहीं दर्शा सकते।ईमान, दावे से नहीं बल्कि कर्मों और आज्ञापालन से सिद्ध होता है।