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    सूरए अन्फ़ाल, आयतें 22-25, (कार्यक्रम 283)

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    आइये सूरए अन्फ़ाल की आयत संख्या 22 की तिलावत सुनते हैं।إِنَّ شَرَّ الدَّوَابِّ عِنْدَ اللَّهِ الصُّمُّ الْبُكْمُ الَّذِينَ لَا يَعْقِلُونَ (22)ईश्वर के निकट धरती पर चलने वाले सबसे बुरे (जीव) वे बहरे और गूंगे हैं जो चिंतन नहीं करते। (8:22)मनुष्य की सबसे बड़ी विशेषता जो उसे अन्य जीवों से भिन्न करती है, उसकी बुद्धि और चिंतन क्षमता है। अतः जो लोग बुद्धि के आधार पर बात नहीं करते या नहीं सुनते मानों उनमें बुद्धि ही नहीं है और वे अन्य पशुओं की भांति हैं।क़ुरआने मजीद की दृष्टि में ऐसे लोग पशुओं से भी तुच्छ हैं क्योंकि चौपायों और पशुओं के पास बुद्धि नहीं होती और वे अपनी अवश्यकता के अनुसार ही काम करते हैं। किन्तु मनुष्य जिसके पास बुद्धि है यदि अपनी इस योग्यता का उपयोग न करे तो फिर वह पशुओं से भी तुच्छ हो जाता है।यह आयत कहती है कि ईश्वर की दृष्टि में मनुष्य का महत्त्व उसकी चिंतन शक्ति तथा सत्य सुनने और सत्य बोलने में है और जो कोई ऐसा न हो तो ईश्वर की दृष्टि में उसका कोई मूल्य और महत्त्व नहीं है बल्कि ऐसा व्यक्ति छोटे से छोटे पशुओं से भी गिरा हुआ होता है। सूरए मुल्क की दसवीं आयत के अनुसार, नरकवासी अपने नरक में जाने का कारण इस प्रकार बताते हैं कि यदि हम सुनते होते या फिर चिंतन करते तो फिर इन नरकवासियों में से नहीं होते।इस आयत से हमने सीखा कि आंख, कान और ज़बान का महत्त्व उसी समय होता है जब उन्हें सत्य समझने और उसे स्वीकार करने के लिए प्रयोग किया जाए।मनुष्य का महत्त्व बुद्धि से काम लेने में है और जो कोई भी ईश्वरीय शिक्षाओं से मुंह मोड़ लेता है वह वस्तुतः बुद्धि से दूर हो जाता है।आइये अब सूरए अन्फ़ाल की आयत संख्या 23 की तिलावत सुनते हैं।وَلَوْ عَلِمَ اللَّهُ فِيهِمْ خَيْرًا لَأَسْمَعَهُمْ وَلَوْ أَسْمَعَهُمْ لَتَوَلَّوْا وَهُمْ مُعْرِضُونَ (23)और यदि ईश्वर को उनमें कोई भी भलाई मिलती तो वह उन्हें अवश्य सुनता किन्तु यदि वह उन्हें सुना भी देता तो वे उद्दंडता से काम लेकर मुंह फिरा लेते। (8:23)पिछली आयत में ऐसे लोगों की ओर संकेत किया गया था जिनके पास कान तो थे किन्तु वे सत्य को सुन नहीं सकते, ज़बान तो है किन्तु सत्य को स्वीकार करने के अवसर पर वे गूंगे हो जाते हैं। यह आयत कहती है कि यद्यपि ईश्वर उनके हृदय में सत्य बात का प्रभाव डालने में सक्षम है किन्तु उन्होंने अपने अनुचित कर्मों से सत्य को स्वीकार करने की संभावना समाप्त कर दी है और उनमें कोई भी भलाई बाक़ी नहीं बची है।इसके अतिरिक्त वे इतने हठधर्मी है कि यदि वे अपने हृदय में ईश्वरीय आयतों के सत्य होने की ओर संतुष्ट और आश्वस्त भी हो जाएं तब भी विदित रूप से उसे स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होंगे और मुंह मोड़ लेंगे।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वरीय परंपरा यह है कि हर व्यक्ति को उसके द्वारा अपने भीतर विकसित की गई योग्यता के अनुसार ही भले कर्म करने का अवसर मिलता है।ईश्वरीय परंपरा मनुष्य को अपने कर्मों का अधिकार देने पर आधारित है। यद्यपि ईश्वर मनुष्य को सत्य स्वीकार करने पर विवश कर सकता है किन्तु वह मनुष्य को इन्कार करने की संभावना देता है।आइये अब सूरए अन्फ़ाल की आयत संख्या 24 की तिलावत सुनते हैं।يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آَمَنُوا اسْتَجِيبُوا لِلَّهِ وَلِلرَّسُولِ إِذَا دَعَاكُمْ لِمَا يُحْيِيكُمْ وَاعْلَمُوا أَنَّ اللَّهَ يَحُولُ بَيْنَ الْمَرْءِ وَقَلْبِهِ وَأَنَّهُ إِلَيْهِ تُحْشَرُونَ (24)हे ईमान वालों, ईश्वर और उसके पैग़म्बर की पुकार का उत्तर दो जब वे तुम्हें उस बात की ओर बुलाएं जिसमें तुम्हारा जीवन (निहित) है और जान लो कि निसंदेह, ईश्वर मनुष्य और उसके हृदय के बीच आड़े आ जाता है और निश्चित रूप से तुम सब उसी की ओर पलटाए जाओगे। (8:24)यह आयत मनुष्य को एक साधारण जीवन से आगे बढ़ने का निमंत्रण देती है कि जो मनुष्य के विचार, बुद्धि और आध्यात्म की प्रगति का कारण बनता है।इस आयत के अनुसार इस जीवन का मार्ग ईश्वर के निमंत्रण की स्वीकृति और उसके पैग़म्बर के आदेशों का पालन है।जैसा कि क़ुरआने मजीद के सूरए नह्ल की आयत संख्या 97 में कहा गया है कि जिस किसी ने भला कर्म किया, वह पुरुष हो या स्त्री यदि वह ईमान वाला है तो हम उसे पवित्र जीवन प्रदान करेंगे।आगे चलकर आयत कहती है कि जो कुछ तुम्हारे मन में है, ईश्वरर उससे अवगत है, चाहे तुम उसे ज़बान पर न लाओ, यह ऐसा ही है मानो ईश्वर मनुष्य और उसके हृदय के बीच में हो। इसके अतिरिक्त सभी मनुष्य प्रलय के दिन ईश्वर के सामने लाए जाएंगे और वे तुम्हारे कर्मों का हिसाब लेगा। तो संसार और प्रलय की कोई भी बात उससे छिपी और उसकी शक्ति से बाहर नहीं है और वो हमसे, हमारी गर्दन की रग से भी अधिक निकट है, जैसा कि उसने स्वयं क़ुरआने मजीद में कहा है।इस आयत से हमने सीखा कि मनुष्य का वास्तविक जीवन, पैग़म्बरों के बताए हुए मार्ग पर चलने पर निर्भर है और यदि वो ऐसा न करे तो मरा हुआ है चाहे विदित रूप से खाता-पीता या चलता-फिरता रहे।इससे पहले कि ईश्वर हमारे और हमारे हृदय के बीच बाधा बन जाए और हमारी मृत्यु आ पहुंचे, हमें सत्य को स्वीकार कर लेना चाहिए और अंततः जीवन के बारे में सोचना चाहिए।आइये अब सूरए अन्फ़ाल की आयत संख्या 25 की तिलावत सुनते हैं।وَاتَّقُوا فِتْنَةً لَا تُصِيبَنَّ الَّذِينَ ظَلَمُوا مِنْكُمْ خَاصَّةً وَاعْلَمُوا أَنَّ اللَّهَ شَدِيدُ الْعِقَابِ (25)और उस बुराई से बचो जो केवल तुम्हारे अत्याचारी लोगों को ही अपने घेरे में लेने वाली नहीं है और जान लो कि निश्चित रूप से ईश्वर अत्यंत कड़ा दंड देने वाला है। (8:25)पाप और बुरे कर्म कभी गुप्त और व्यक्तिगत रूप से किए जाते हैं और ऐसी स्थिति में उनका दंड केवल पापी को भुगतना पड़ता है किन्तु कभी कभी बुरे कर्म और पाप सार्वजनिक रूप धारण कर लेते हैं और इस प्रकार प्रचलित हो जाते हैं कि मानों वे भले कर्म हों। यह आयत कहती है कि यदि बुरे कर्म लोगों के बीच खुल्लम खुल्ला होने लगें और जो लोग उन्हें रोक सकते हैं वे चुप रहे तो ईश्वरीय दंड सभी को अपनी लपेट में ले लेगा अतः इस आयत में बुराई से बचने का तात्पर्य समाज और लोगों से अलग थलग हो जाना नहीं है बल्कि सामाजिक बुराइयों से उचित ढंग से निपटना है।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वरीय आदेशों से दूरी कि जो मनुष्य और समाज के विनाश का कारण है, बुराइयां उत्पन्न कर देती हैं।हमको न तो पाप करना चाहिए और न ही पापियों का साथ देना चाहिए और न ही पाप के सामने चुप रहना चाहिए।बुराइयों से रोकना, हर ईमान वाले व्यक्ति का दायित्व है और यह काम यदि पाप रोकने में प्रभावी न हुआ तो ईश्वरीय दंड को रोकने में प्रभावी है।