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    सूरए अन्फ़ाल, आयतें 26-29, (कार्यक्रम 284)

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    आइये पहले सूरए अन्फ़ाल की आयत संख्या 26 की तिलावत सुनते हैं।وَاذْكُرُوا إِذْ أَنْتُمْ قَلِيلٌ مُسْتَضْعَفُونَ فِي الْأَرْضِ تَخَافُونَ أَنْ يَتَخَطَّفَكُمُ النَّاسُ فَآَوَاكُمْ وَأَيَّدَكُمْ بِنَصْرِهِ وَرَزَقَكُمْ مِنَ الطَّيِّبَاتِ لَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ (26)और याद करो उस समय को जब तुम (मक्के की) धरती में बड़ी कम संख्या में थे और तुमको कमज़ोर बना दिया गया था। तुम इस बात से भयभीत रहते थे कि कहीं (अनेकेश्वरवादी) लोग तुम्हें उचक न लें तुम्हें शक्तिशाली बना दिया और पवित्र वस्तुओं में से तुम्हें रोज़ी दी कि शायद तुम उसके कृतज्ञ हो जाओ। (8:26)मक्के से मदीने की ओर पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम की हिजरत या पलायन से पूर्व अनेकेश्वरवादी सदैव मुसलमानों को यातनाएं दिया करते थे। इसी कारण पैग़म्बर के आदेश पर मुसलमान विभिन्न क्षेत्रों की ओर पलायन कर गए। कुछ लोग अफ़्रीक़ा की ओर चले गए, कुछ यमन व ताएफ़ की ओर और कुछ ने मदीने की ओर हिजरत की। मदीने पलायन के पश्चात मुसलमानों का कोई ठिकाना नहीं था वे दरिद्रता में ग्रस्त थे।यह आयत, इस्लाम के आंतरिक काल में मुसलमानों की इन कठिन परिस्थितियों की ओर संकेत करते हुए उन्हें याद दिलाती है कि इसके पश्चात ईश्वर ने उन्हें शक्ति व सत्ता प्रदान की। अतः इस्लाम के कारण प्राप्त होने वाली इस महान अनुकंपा का उन्हें मूल्य समझना चाहिए और इस पर ईश्वर का कृतज्ञ रहना चाहिए।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर और सत्य के मार्ग में लोगों तथा संभावनाओं की कमी पर चिंतित नहीं होना चाहिए और अपना मार्ग नहीं छोड़ना चाहिए, ईश्वर सहायता करता है।कभी भी अपनी पिछली कठिनाइयों को नहीं भूलना चाहिए और जब हम कठिनाइयों से निकल जाएं तो ईश्वर का आभारी होना चाहिए।आइये अब सूरए अन्फ़ाल की आयत संख्या 27 की तिलावत सुनते हैं।يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آَمَنُوا لَا تَخُونُوا اللَّهَ وَالرَّسُولَ وَتَخُونُوا أَمَانَاتِكُمْ وَأَنْتُمْ تَعْلَمُونَ (27)हे ईमान वालों, ईश्वर और उसके पैग़म्बर से विश्वासघात मत करो और इसी प्रकार एक दूसरे की अमानतों में भी विश्वासघात न करो जबकि तुम (इसकी बुराई को) जानते भी हो। (8:27)पिछली आयत में मदीना नगर में मुसलमानों के सत्ताकाल की ओर संकेत करने के पश्चात इस आयत में ईश्वर कहता है कि इस का ध्यान रहे कि भौतिक व सांसारिक हितों के लिए, ईश्वरीय धर्म, पैग़म्बर और इस्लामी समुदाय के साथ विश्वासघात न करो और पीठ में छुरा न घोंपो।इस्लामी इतिहास के अनुसार, मुसलमानों और कुछ यहूदी क़बीलों के बीच होने वाली लड़ाई में, एक मुसलमान अबू लबाबा ने शत्रु को इस्लामी सेना की रणनीति से अवगत करा दिया किन्तु बाद में वे पछताए और उन्होंने प्रायश्चित किया। ईश्वर ने भी उनकी तौबा स्वीकार कर ली।इस्लामी संस्कृति में अमानत का बहुत व्यापक अर्थ है। इसमें वे सभी भौतिक व अध्यात्मिक अनुकंपाएं सम्मलित हैं जो ईश्वर ने मनुष्य को दी हैं। यहां तक कि मनुष्य का शरीर भी ईश्वर की अमानत है और वह इस अमानत के साथ मनचाहा व्यवहार नहीं कर सकता। इसी प्रकार धर्म के आदेश भी ईश्वरीय अमानत हैं और उनकी सुरक्षा तथा क्रियान्वयन के लिए प्रयास करना चाहिए।इस आयत से हमने सीखा कि ईमान के लिए अमानतदारी आवश्यक है और विश्वासघात, ईमान से मेल नहीं खाता।विश्वासघात एक बुरी बात है जिसकी बुराई से हर व्यक्ति अवगत है अतः जानबूझकर किए गए विश्वासघात के भयंकर परिणाम निकलेंगे।आइये अब सूरए अन्फ़ाल की आयत संख्या 28 की तिलावत सुनते हैं।وَاعْلَمُوا أَنَّمَا أَمْوَالُكُمْ وَأَوْلَادُكُمْ فِتْنَةٌ وَأَنَّ اللَّهَ عِنْدَهُ أَجْرٌ عَظِيمٌ (28)और (हे ईमान वालों!) जान लो कि तुम्हारी संपत्ति और तुम्हारी संतान एक परीक्षा (के समान) हैं और (कोई भी इस परीक्षा में सफल हो जाए तो) निसंदेह, ईश्वर के पास महान पारितोषिक है। (8:28)पिछली आयत में विश्वासघात के बारे में चेतावनी देने के पश्चात इस आयत में विश्वासघात के दो सबसे महत्त्वपूर्ण कारकों की ओर संकेत करते हुए कहा गया है कि ऐसा न हो कि तुम अपनी संपत्ति और धन की रक्षा या अपनी संतान को प्रसन्न करने के लिए इस्लामी समुदाय के साथ विश्वासघात करो और अपनी संतान तथा संपत्ति को दूसरों के हितों पर प्राथमिकता दो।नाप-तोल में कमी, वस्तुओं के भंडारण, झूठी शपथ, रणक्षेत्र से फ़रार और धार्मिक रूप से अनिवार्य दान-दक्षिणा से बचने जैसे अनेक आर्थिक व समाजिक पापों का कारण, धन तथा संतान से प्रेम है अतः क़ुरआने मजीद कहता है कि यह दोनों बातें मनुष्य के लड़खड़ाने का कारण हैं और हमें सचेत रहते हुए दूसरों के साथ विश्वासघात नहीं करना चाहिए। हमने यदि ऐसा किया तो ईश्वर क्षतिपूर्ति करते हुए हमें महान पारितोषिक प्रदान करेगा।क़ुरआने मजीद की पांच आयतों में संपत्ति और संतान का एक साथ उल्लेख हुआ है और इन्हें जीवन में मनुष्य के लड़खड़ाने और बहकाने का कारण बताया गया है।इस आयत से हमनें सीखा कि सीमा से अधिक धन-संपत्ति और संतान से प्रेम मनुष्य को विश्वासघात की ओर ले जाता है अन्यथा संतान से प्रेम तो एक स्वभाविक बात है।संपत्ति और संतान दोनों में आकर्षण पाया जाता है कि किन्तु ईश्वरीय अनुकंपाओं की तुलना में आकर्षण का अधिक महत्त्व नहीं है अतः इसके लिए हमें ईश्वर से दूर नहीं होना चाहिए।आइये अब सूरए अन्फ़ाल की आयत संख्या 29 की तिलावत सुनते हैं।يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آَمَنُوا إِنْ تَتَّقُوا اللَّهَ يَجْعَلْ لَكُمْ فُرْقَانًا وَيُكَفِّرْ عَنْكُمْ سَيِّئَاتِكُمْ وَيَغْفِرْ لَكُمْ وَاللَّهُ ذُو الْفَضْلِ الْعَظِيمِ (29)हे ईमान वालों यदि तुम ईश्वर से डरते रहोगे तो वो तुम्हें सत्य और असत्य को अलग अलग करने की क्षमता प्रदान कर देगा, तुम्हारी बुराइयों को छिपा देगा और तुम्हें क्षमा कर देगा और ईश्वर अत्याधिक कृपा (करने) वाला है। (8:29)ये आयत पवित्रता और ईश्वर के भय को, ईश्वरीय परीक्षाओं में सफलता की कुंजी बताते हुए कहती है। यदि ईमान वाले ईश्वर द्वारा निर्धारित सीमा से आगे ने बढ़ें और उसके आदेशों का पालन करें तो वे ईश्वर की अनेक कृपाओं के पात्र बनेंगे।ईश्वर उन्हें ऐसी सूझबूझ और तत्वदर्शिता प्रदान करेगा कि वे सत्य और असत्य के अंतर को समझने लगेंगे तथा पथभ्रष्टता में नहीं पड़ेंगे। यदि व्यवहार और कर्म में उनसे कोई भूलचूक हो जाएगी तब भी ईश्वर उन्हें क्षमा करके उनकी बुराइयों को छिपा देगा। यह सारी कृपा इस लिए है कि ईश्वर अपने अच्छे बंदों के साथ कृपा का व्यवहार करता है और वो भी महान और अनंत कृपा।इस आयत से हमने सीखा कि मनुष्य के कर्म का उसके विचार और बुद्धि पर प्रभाव पड़ता है जिस प्रकार से विचार मनुष्य के व्यवहार को प्रभावित करते हैं। कर्मों और व्यवहार के दौरान ईश्वर का भय, मनुष्य को उसके विचारों में सूझबूझ प्रदान करता है।ईश्वर का भय मनुष्य के विचार को भी ग़लती से बचाता है और स्वयं मनुष्य को भी नरक की आग से सुरक्षित रखता है।