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    सूरए अन्फ़ाल, आयतें 30-33, (कार्यक्रम 285)

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    आइये अब सूरए अन्फ़ाल की आयत संख्या 30 की तिलावत सुनते हैं।وَإِذْ يَمْكُرُ بِكَ الَّذِينَ كَفَرُوا لِيُثْبِتُوكَ أَوْ يَقْتُلُوكَ أَوْ يُخْرِجُوكَ وَيَمْكُرُونَ وَيَمْكُرُ اللَّهُ وَاللَّهُ خَيْرُ الْمَاكِرِينَ (30)और (हे पैग़म्बर! याद कीजिए उस समय को) जब काफ़िर आपको बंदी बनाने या आपकी हत्या करने या आपको मक्के से निकाल देने की युक्तियां कर रहे थे। वे युक्तियां कर रहे थे और ईश्वर भी (उनके षड्यंत्रों को विफल बनाकर) युक्तियां कर रहा था और ईश्वर सबसे अच्छा युक्ति करने वाला है। (8:30)मक्के में हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम की पैग़म्बरी की घोषणा को 13 वर्ष बीतने तथा लोगों विशेषकर युवाओं के बीच उनके दिन प्रतिदिन बढ़ते प्रभाव के पश्चात, मक्के के सरदारों ने इस्लाम के प्रसार को रोकने के लिए एक बैठक की। उस बैठक में तीन योजनाएं प्रस्तुत की गईं। एक पैग़म्बर को बंदी बनाना, दूसरे उन्हें मक्के से देश निकाला देकर किसी सूदूर स्थान पर भेजना और तीसरे उनकी हत्या करना। बैठक के अंत में तीसरा अर्थात पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम की हत्या का प्रस्ताव पारित हुआ।अनेकेश्वरवादियों ने इस षड्यंत्र को व्यवहारिक बनाने के लिए निर्णय किया कि हर क़बीले से एक एक आदमी आए और सब मिलकर पैग़म्बर पर आक्रमण कर दें ताकि उनके परिजन उनकी हत्या का बदला लेने के लिए सभी क़बीलों से न लड़ सकें।ईश्वर ने अपने फ़िरशते जिब्राइल को भेजकर पैग़म्बरे इस्लाम को अनेकेश्वरवादियों के इस षड्यंत्र से अवगत करा दिया और वे रात में ही मक्का नगर से बाहर चले गए। उस रात हज़रत अली अलैहिस्सलाम पैग़म्बर (स) के स्थान पर सोए ताकि शत्रु ये समझते रहें कि पैग़म्बर घर ही में हैं और पैग़म्बर को मक्के से दूर होने का अधिक समय मिल जाए। यह आयत अनेकेश्वरवादियों को षड्यंत्रों और पैग़म्बर को बचाने की ईश्वर की युक्तियों की ओर संकेत करते हुए कहती है कि न काफ़िरों को घमंड करना चाहिए कि सोचने लगें कि उनकी युक्ति ईश्वर की युक्ति से बेहतर है, और न ही ईमान वालों को ये सोचकर निराश होना चाहिए कि ईश्वर ने उन्हें बेसहारा छोड़ दिया है।इस आयत से हमने सीखा कि विरोधियों का रवैया जेल, हत्या और देश निकाले पर आधारित होता है जबकि पैग़म्बरों की शैली शिक्षा, प्रशिक्षण और पवित्रता की होती है।ईश्वर सत्य का अनुसरण करने वालों का समर्थक है और जो कोई उनके विरुद्ध षड्यंत्र करेगा, उसका सामना ईश्वर से होगा।आइये अब सूरए अन्फ़ाल की आयत संख्या 31 की तिलावत सुनते हैं।وَإِذَا تُتْلَى عَلَيْهِمْ آَيَاتُنَا قَالُوا قَدْ سَمِعْنَا لَوْ نَشَاءُ لَقُلْنَا مِثْلَ هَذَا إِنْ هَذَا إِلَّا أَسَاطِيرُ الْأَوَّلِينَ (31)और जब उनके सामने हमारी आयतों की तिलावत की जाती है तो वे कहते हैं कि हमने सुन लिया, हम स्वयं भी चाहें तो ऐसा ही कह सकते हैं ये तो केवल पिछले लोगों की कहानियां हैं। (8:31)पिछली आयत में पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम की हत्या के षड्यंत्र की बात की गई थी। इस आयत में उनके व्यक्तित्व के अपमान, उनकी बातों के अनादर और ईश्वरीय कथनों को तुच्छ दर्शाने के प्रयासों की ओर सकेंत किया गया है। विरोधियों ने क़ुरआने मजीद को साधारण लोगों के मन से उपजी कहानियों के स्तर तक पहुंचा दिया जबकि प्रथम तो पूरा क़ुरआन नहीं बल्कि उसका एक भाग पिछली जातियों के इतिहास पर आधारित है और दूसरे यह कि क़ुरआने मजीद में पिछले पैग़म्बरों के बारे में जो कुछ आया है वो सच्चा और वास्तविक है और ऐतिहासिक एवं भौगोलिक प्रमाणों के अनुकूल है और इतिहास के विशेषज्ञों ने भी इसकी पुष्टि की है, अतः क़ुरआन को कहानी बताना, एक धोखा देने वाले आरोपों से अधिक कुछ नहीं है।इस आयत से हमने सीखा कि इस्लाम के विरोधी दावा करते हैं कि क़ुरआन कोई महत्त्वपूर्ण किताब नहीं है और हम भी ऐसी किताब ला सकते हैं किन्तु ये दावा अब तक व्यवहारिक नहीं हुआ है।रूढ़ीवाद का आरोप, उन प्राचीन आरोपों में से है जो ईमान वालों और उनकी आसमानी किताब पर लगते रहे हैं।आइये अब सूरए अन्फ़ाल की आयत संख्या 32 की तिलावत सुनते हैं।وَإِذْ قَالُوا اللَّهُمَّ إِنْ كَانَ هَذَا هُوَ الْحَقَّ مِنْ عِنْدِكَ فَأَمْطِرْ عَلَيْنَا حِجَارَةً مِنَ السَّمَاءِ أَوِ ائْتِنَا بِعَذَابٍ أَلِيمٍ (32)और (याद कीजिए उस समय को) जब उन्होंने कहा कि प्रभुवर यदि (मुहम्मद की कही हुई) ये बातें सत्य हैं और तेरी ओर से हैं तो हम पर आसमान से पत्थर बरसा या हमारे लिए पीड़ादायक दंड भेज। (8:32)यह आयत पैग़म्बरे इस्लाम के विरोधियों के हठधर्म और द्वेष की चरम सीमा को दर्शाती है कि चूंकि वे पैग़म्बर के कथनों को सहन नहीं कर सकते तो कहते हैं कि यदि तुम सच कहते हो और कोई ईश्वर मौजूद है तथा जो कोई उसका विरोध करे तो वो उसे कड़ा दंड देता है, तो अपने ईश्वर से कहो कि वे हमें अत्यंत कड़ा दंड दे और हमारे ऊपर आकाश से पत्थरों की वर्षा करे।अलबत्ता संभव है कि विरोधियों की ओर से इस प्रकार की बातें, सीधे साधे लोगों को धोखा देने के लिए हों कि वे सोचें कि ये जो स्वयं को शाप दे रहे हैं तो निश्चित रूप से यही सत्य पर होंगे और ये ऐसी बातें जानते होंगे जो हम नहीं जानते।इस आयत से हमने सीखा कि कभी कभी हठधर्म, द्वेष और ईर्ष्या मनुष्य को इस सीमा तक ले जाती है कि वो अपने अंत के लिए भी तैयार हो जाता है।पैग़म्बर के कुछ विरोधी आसमानी धर्म के अनुयाई थे और ईश्वर में आस्था रखते थे।आइये अब सूरए अन्फ़ाल की आयत संख्या 33 की तिलावत सुनते हैं।وَمَا كَانَ اللَّهُ لِيُعَذِّبَهُمْ وَأَنْتَ فِيهِمْ وَمَا كَانَ اللَّهُ مُعَذِّبَهُمْ وَهُمْ يَسْتَغْفِرُونَ (33)(हे पैग़म्बर!) जब तक आप, लोगों के बीच हैं ईश्वर उन्हें दंडित नहीं करेगा और जब तक वे तौबा करते रहेंगे ईश्वर उन्हें दंड देने वाला नहीं है। (8:33)ये आयत पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम के अस्तित्व की अनुकंपा की ओर संकेत करते हुए कहती है कि पैग़म्बर के अस्तित्व के कारण ईश्वर मुसलमानों को सार्वजनिक रूप से दंडित नहीं करेगा जैसा कि हज़रत लूत अलैहिस्सलाम की जाति को दंडित करते समय ईश्वर ने अपने पैग़म्बर से कहा था कि वे नगर से बाहर निकल जाएं। पैग़म्बर और उनके परिजनों के कथनों में भी इस बात पर बल दिया गया है कि पवित्र व भले लोगों के अस्तित्व के कारण ईश्वर लोगों को सार्वजनिक ढंग से दंडित नहीं करता।अलबत्ता पैग़म्बर का जीवन काल सीमित और कम है तथा जो बात सभी स्थानों और युगों में दंड को रोकती है वो तौबा एवं प्रायश्चित है जिस पर इस आयत में बल दिया गया है। हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम के स्वर्गवास के पश्चात कहा था कि दो शरणों में से एक हमारे बीच से चली गई अतः अब दूसरी शरण को सुरक्षित रखो कि जो तौबा है।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर के प्रिय बंदों का अस्तित्व, दंड को रोकने का कारण है। उनके अस्तित्व का सम्मान करना चाहिए और उनके मूल्य को समझना चाहिए।तौबा व प्रायश्चित न केवल प्रलय के दंड को रोकता है बल्कि संसार के दंड को भी रोकता है अतः हमें उसकी ओर से निश्चेत नहीं रहना चाहिए।