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    सूरए अन्फ़ाल, आयतें 34-37, (कार्यक्रम 286)

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    आइये अब सूरए अन्फ़ाल की आयत संख्या 34 की तिलावत सुनते हैं।وَمَا لَهُمْ أَلَّا يُعَذِّبَهُمُ اللَّهُ وَهُمْ يَصُدُّونَ عَنِ الْمَسْجِدِ الْحَرَامِ وَمَا كَانُوا أَوْلِيَاءَهُ إِنْ أَوْلِيَاؤُهُ إِلَّا الْمُتَّقُونَ وَلَكِنَّ أَكْثَرَهُمْ لَا يَعْلَمُونَ (34)और ईश्वर उन्हें क्यों दंडित न करे जबकि वे लोगों को मस्जिदुल हराम (में जाने) से रोकते हैं और वे उसके रखवाले भी नहीं हैं। निसंदेह पवित्र और ईश्वर का भय रखने वालों के अतिरिक्त कोई उसका रखवाला नहीं हो सकता किन्तु उनमें से अधिकांश इसे नहीं जानते। (8:34)पिछले कार्यक्रम में हमने बताया था कि जब तक पैग़म्बर लोगों के बीच थे ईश्वर ने उनकी जाति को सार्वजनिक रूप से दंडित नहीं किया और पैग़म्बरों के अस्तित्व की एक विभूति यह भी है कि ईश्वर उनकी जातियों को सार्वजनिक रूप से दंडित नहीं करता। ये आयत कहती है कि अलबत्ता वे लोग दंड के अधिकारी हैं क्योंकि उन्होंने ऐसे स्थान पर नियंत्रण कर रखा है जिसके वे योग्य नहीं हैं।मस्जिदुल हराम ईश्वर का घर है और अनेकेश्वरवादियों को उसकी व्यवस्था अपने हाथ में लेने का अधिकार नही है बल्कि उन्होंने बलपूर्वक उसे अपने नियंत्रण में ले रखा है अतः ईश्वर प्रलय में उन्हें दंडित करेगा और संसार में भी युद्ध व बंदी बनाए जाने और ऐसी ही कुछ अन्य कठिनाइयों द्वारा दंडित करेगा।इस आयत से हमने सीखा कि जो लोग किसी भी रूप में और किसी भी प्रकार ईमान वालों को ईश्वर के घर में जाने से रोकते हैं और उसे अपने नियंत्रण में लिए रहते हैं, उन्हें ईश्वरीय दंड की प्रतीक्षा में रहना चाहिए। इस आयत का स्पष्ट प्रतीक ज़ायोनी शासन है जो मस्जिदुल अक़सा को अपने नियंत्रण में लेकर विभिन्न प्रकार से मुसलमानों के इस मस्जिद में जाने के मार्ग में बाधा डालता है।मस्जिदों का नियंत्रण पवित्र तथा योग्य लोगों के हाथों में होना चाहिए अयोग्य और भ्रष्ट लोगों के हाथों में नहीं।आइये अब सूरए अन्फ़ाल की आयत संख्या 35 की तिलावत सुनते हैं।وَمَا كَانَ صَلَاتُهُمْ عِنْدَ الْبَيْتِ إِلَّا مُكَاءً وَتَصْدِيَةً فَذُوقُوا الْعَذَابَ بِمَا كُنْتُمْ تَكْفُرُونَ (35)और अनेकेश्वरवादियों की (उपासना व) नमाज़ (भी) मस्जिदुल हराम के निकट सीटी और ताली के अतिरिक्त कुछ नहीं थी तो तुम लोग अब अपने कुफ़्र के कारण दंड (का स्वाद) चखो। (8:35)पिछली आयत में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम के काल में अनेकेश्वरवादियों द्वारा, मस्जिदुल हराम पर नियंत्रण को अवैध बताने के पश्चात ये आयत कहती है कि वे अपने विचार में प्रार्थना और उपासना भी करते हैं किन्तु उस प्रकार से नहीं जैसा कि ईश्वर ने निर्धारित किया है बल्कि उस प्रकार से जैसा उनका मन करता है।वे ईश्वर के घर के निकट ताली और सीटी बजाते हैं जिस प्रकार से कि आजकल भी कुछ मुसलमान मज़ारों और दरगाहों में एकत्रित होकर नाच गाना करते हैं और इसे उपासना समझते हैं जबकि इसका धर्म से कोई संबंध नहीं है।इस आयत से हमने सीखा कि धार्मिक समारोहों में प्राचीन काल से उलट फेर होता है और उनमें अंध विश्वास के पहलू आते रहे हैं।पवित्र स्थलों और नियमों के अपमान का परिणाम, ईश्वरीय दंड के रूप में निकलता है।आइये अब सूरए अन्फ़ाल की आयत संख्या 36 की तिलावत सुनते हैं।إِنَّ الَّذِينَ كَفَرُوا يُنْفِقُونَ أَمْوَالَهُمْ لِيَصُدُّوا عَنْ سَبِيلِ اللَّهِ فَسَيُنْفِقُونَهَا ثُمَّ تَكُونُ عَلَيْهِمْ حَسْرَةً ثُمَّ يُغْلَبُونَ وَالَّذِينَ كَفَرُوا إِلَى جَهَنَّمَ يُحْشَرُونَ (36)निश्चित रूप से काफ़िर, लोगों को ईश्वर के मार्ग से रोकने के लिए अपना माल ख़र्च करते हैं तो शीघ्र ही ये अपना माल ख़र्च भी करेंगे और उसके पश्चात ये बात उनके लिए कुन्ठा भी बन जाएगी और (अंततः) वे पराजित भी किए जाएंगे और जिन लोगों ने कुफ़्र अपनाया वे (सब) नरक की ओर ले जाए जाएंगे। (8:36)ये आयत पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम के कार्यक्रमों को विफल बनाने हेतु मक्के के काफ़िरों तथा अनेकेश्वरवादियों द्वारा भारी मात्रा में ख़र्च की जाने वाली धनराशि की ओर संकेत करते हुए कहती है, काफ़िर तर्क तथा बुद्धि द्वारा पैग़म्बर को पराजित न कर सके तो उन्होंने लोगों को पैग़म्बर का निमंत्रण स्वीकार करने से रोकने के लिए भारी मात्रा में पैसा ख़र्च किया या फिर भारी पैसे से युद्ध आरंभ करके उन्हें और इस्लाम को मिटाने की कुचेष्टा की किन्तु शीघ्र ही उन्हें निराशा का सामना करना पड़ेगा क्योंकि वे देखेंगे कि उनका पैसा भी उनके हाथ से निकल गया है और उन्हें कोई सफलता भी नहीं मिली है।क़ुरआने मजीद कहता है कि ये पराजय और निराशा उनके सांसारिक कर्मों का परिणाम है और प्रलय का कड़ा दंड अपने स्थान पर बाक़ी है।इस आयत से हमने सीखा कि ये न सोचें कि शत्रु बेकार बैठे हुए हैं, यदि वे विदित रूप से आपके विरुद्ध कुछ नहीं कर रहे हैं तो परोक्ष रूप से इस्लाम और मुसलमानों की समाप्ति के लिए धन ख़र्च कर रहे हैं।ईमान वालों को भविष्य के प्रति आशावान रहना चाहिए क्योंकि कुफ़्र अपनी समस्त शक्ति और धन के बावजूद पराजित होने वाला है।आइये अब सूरए अन्फ़ाल की आयत संख्या 37 की तिलावत सुनते हैं।لِيَمِيزَ اللَّهُ الْخَبِيثَ مِنَ الطَّيِّبِ وَيَجْعَلَ الْخَبِيثَ بَعْضَهُ عَلَى بَعْضٍ فَيَرْكُمَهُ جَمِيعًا فَيَجْعَلَهُ فِي جَهَنَّمَ أُولَئِكَ هُمُ الْخَاسِرُونَ (37)(ये सब) इसलिए है कि ईश्वर अपवित्र को पवित्र से अलग कर दे और अपवित्र को एक दूसरे के ऊपर रखकर ढेर बना दे और फिर उसे नरक में डाल दे, यही लोग घाटा उठाने वाले हैं। (8:37)पिछली आयत में काफ़िरों के कार्यक्रमों का वर्णन करने के पश्चात इस आयत में क़ुरआने मजीद कहता है कि मनुष्यों के संकल्प तथा इरादे के चलते सत्य और असत्य का चयन, ईश्वरीय परीक्षा की भूमिका है ताकि भले और बुरे एवं पवित्र व अपवित्र लोगों को पहचाना जा सके।बुरे और अपवित्र लोगों को जान लेना चाहिए कि न केवल इस संसार में बल्कि परलोक में भी उनका बड़ा बुरा अंत होगा उन सभी को बड़े अपमान के साथ कूड़े के एक गंदे ढेर की भांति एकत्रित करके नरक में झोंक दिया जाएगा और ये सबसे बड़ा घाटा है कि मनुष्य लोक परलोक दोनों को गंवा बैठे।इस आयत से हमने सीखा कि सत्य व असत्य के समर्थकों को एक दूसरे से अलग करना एक ईश्वरीय परंपरा है ताकि मनुष्य की योग्यताएं स्पष्ट हो जाएं।स्थान की कमी, दबाव और कठिनाइयां, नरकवासियों की विशेषताएं हैं।