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    सूरए अन्फ़ाल, आयतें 38-41, (कार्यक्रम 287)

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    आइये अब सूरए अन्फ़ाल की आयत संख्या 38 की तिलावत सुनते हैं।قُلْ لِلَّذِينَ كَفَرُوا إِنْ يَنْتَهُوا يُغْفَرْ لَهُمْ مَا قَدْ سَلَفَ وَإِنْ يَعُودُوا فَقَدْ مَضَتْ سُنَّةُ الْأَوَّلِينَ (38)(हे पैग़म्बर!) काफ़िरों से कह दीजिए कि यदि वे (बुरे कर्म) छोड़ दें तो उनके पिछले पापों को क्षमा कर दिया जाएगा और यदि वे फिर वही कर्म करने लगें तो निश्चित रूप से पिछले लोगों के संबंध में ईश्वरीय परंपरा (उनके बारे में भी) बाक़ी है। (8:38)बंदों पर ईश्वर की एक महान कृपा, तौबा व प्रायश्चित का मार्ग खुला रखना तथा हर समय व हर स्थिति में पाप से वापसी की संभावना को बाक़ी रखना है। न केवल पाप करने वाले ईमानदार बंदें बल्कि काफ़िर भी जब कभी अपनी वैचारिक और व्यवहारिक पथभ्रष्टता को छोड़ दें तो वे इस ईश्वरीय कृपा के पात्र बन सकते हैं और उन्हें क्षमा किया जा सकता है।अलबत्ता काफ़िरों को तौबा और ईमान के पश्चात अतीत की नमाज़ों और अन्य उपासनाओं की क्षतिपूर्ति की आवश्यकता नहीं है। आगे चलकर आयत कहती है कि किन्तु यदि इन्होंने पुनः ग़लत कर्म और पाप करने आरंभ कर दिए तो ईश्वर इनके साथ भी वैसा ही व्यवहार करेगा जैसा उसने पिछले लोगों के साथ किया था।इस आयत से हमने सीखा कि लोगों के संबंध में फ़ैसला और निर्णय करते समय, मानदंड उनका अतीत नहीं बल्कि वर्तमान होना चाहिए।इस्लाम, युद्ध प्रेमी नहीं है बल्कि वो संसार के समस्त लोगों में सुधार का इच्छुक है।आइये अब सूरए अन्फ़ाल की आयत संख्या 39 की तिलावत सुनते हैं।وَقَاتِلُوهُمْ حَتَّى لَا تَكُونَ فِتْنَةٌ وَيَكُونَ الدِّينُ كُلُّهُ لِلَّهِ فَإِنِ انْتَهَوْا فَإِنَّ اللَّهَ بِمَا يَعْمَلُونَ بَصِيرٌ (39)और उनसे युद्ध करो यहां तक कि कोई बुराई बाक़ी न रहे और समस्त धर्म केवल ईश्वर के लिए रह जाए तो यदि इन्होंने (बुराई से) हाथ खींच लिया तो जो कुछ ये करते हैं ईश्वर निश्चित रूप से उसे देखने वाला है। (8:39)पिछली आयत में काफ़िरों को इस्लाम का निमंत्रण देने और तौबा व प्रायश्चित के लिए उनका मार्ग खुला रखने की ओर संकत किया गया था, ये आयत कहती है कि यदि वे हठधर्मी न छोड़ें और तुम्हारे विरुद्ध षड्यंत्र करने लगें तो उनका मुक़ाबला करो यहां तक कि उनकी बुराई का अंत हो और सत्य स्थापित हो जाए।मूल रूप से इस्लाम में जेहाद का लक्ष्य, विस्तारवाद नहीं है बल्कि इसका उद्देश्य संसार से अत्याचार को समाप्त करके स्थायी न्याय व सुरक्षा स्थापित करना है और ये लक्ष्य ईश्वरीय धर्म के आदेशों को लागू करने से ही प्राप्त होगा।अलबत्ता ये आशा अब तक पूरी नहीं हो सकी है और पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम के स्पष्ट कथन के अनुसार संसार में न्याय उनके वंश के एक व्यक्ति मेहदी अलैहिस्सलाम के हाथों स्थापित होगा जो अंतिम काल में सामने आएंगे और तब संसार में सत्य और न्याय का बोलबाला होगा।इस आयत से हमने सीखा कि संसार में युद्ध की आग भड़काने वाले, ऐसे काफ़िर और अनेकेश्वरवादी हैं जो अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए षड्यंत्र करते रहते हैं।जब तक शत्रु षड्यंत्र करता और बुराई फैलाता रहेगा उससे संघर्ष का आदेश अपने स्थान पर बाक़ी है और उसमें ढिलाई वैध नहीं है।आइये अब सूरए अन्फ़ाल की आयत संख्या 40 की तिलावत सुनते हैं।وَإِنْ تَوَلَّوْا فَاعْلَمُوا أَنَّ اللَّهَ مَوْلَاكُمْ نِعْمَ الْمَوْلَى وَنِعْمَ النَّصِيرُ (40)और यदि वे फिर पलट जाएं तो जान लो कि ईश्वर (ही) तुम्हारा स्वामी है कि जो क्या ही अच्छा स्वामी और क्या ही अच्छा सहायक है। (8:40)एक ख़तरा जिससे मनुष्य सदैव जूझता रहता है वो विचार, आस्था एवं कर्म में अस्थिरता है। जैसा कि कुछ लोग आज एक गुट या दल में सम्मलित होते हैं और कल उसे छोड़ कर किसी अन्य गुट में शामिल हो जाते हैं। आज अच्छे होते हैं कल बुरे। आज ईमान वाले होते हैं कल काफ़िर।ईश्वर इस आयत में वास्तविक ईमान वालों को संबोधित करते हुए कहता है कि लोगों की आस्था और कर्मों में ये लड़खड़ाहट, अपने विचार और मार्ग की सत्यता में तुम्हारे संदेह का कारण न बने बल्कि तुम दृढ़तापूर्व अपने मार्ग पर डटे रहो और जान लो कि ईश्वर तुम्हारा स्वामी भी है और सहायक भी। यदि सभी लोग तुम्हें छोड़ दे या तुम्हारे मुक़ाबले में आ जाएं तो भी मत घबराओ कि ईश्वर तुम्हारे साथ है।इस आयत से हमने सीखा कि हमें केवल ईश्वर पर भरोसा रखना चाहिए, ऐसे कितने ही लोग होते हैं जो आज तो हमारे साथ होते हैं किन्तु कल हमें छोड़ देते हैं।ईश्वर सबसे अच्छा स्वामी है, न हमें किसी अन्य के हवाले करता है और न ही हमें भूलता है, न वो अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए हमें चाहता है और नही हमारे कर्मों को बिना पारितोषिक के छोड़ता है।आइये अब सूरए अन्फ़ाल की आयत संख्या 41 की तिलावत सुनते हैं।وَاعْلَمُوا أَنَّمَا غَنِمْتُمْ مِنْ شَيْءٍ فَأَنَّ لِلَّهِ خُمُسَهُ وَلِلرَّسُولِ وَلِذِي الْقُرْبَى وَالْيَتَامَى وَالْمَسَاكِينِ وَابْنِ السَّبِيلِ إِنْ كُنْتُمْ آَمَنْتُمْ بِاللَّهِ وَمَا أَنْزَلْنَا عَلَى عَبْدِنَا يَوْمَ الْفُرْقَانِ يَوْمَ الْتَقَى الْجَمْعَانِ وَاللَّهُ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ (41)यदि तुम ईश्वर पर और उस (सहायता) पर, ईमान रखते हो, जो हमने अपने बंदे पर सत्य और असत्य के फ़ैसले के दिन, जब दो गुट आपस में टकरा रहे थे, भेजी थी तो जान लो कि जिस वस्तु से भी तुम्हें (आर्थिक) लाभ हो उसका पांचवां भाग पैग़म्बर, उनके निकट परिजनों, अनाथों, दरिद्रों और मार्ग में रह जाने वाले यात्रियों के लिए है और ईश्वर हर बात की क्षमता रखता है। (8:41)पिछली आयतों में जेहाद के आदेश का वर्णन करने के पश्चात इस आयत में ईश्वर कहता है कि युद्ध में तुम्हें जो कुछ मिलता है उसका पांचवां भाग, तुम्हें उसी प्रकार ख़र्च करना चाहिए जैसा ईश्वर ने आदेश दिया है। यदि तुम ईश्वर के लिए लड़ रहे हो तो उसके आदेश का पालन करो।यद्यपि जेहाद में भाग लेने वाले अपने प्राणों की आहूति और हर प्रकार का बलिदान देने के लिए तैयार रहते हैं किन्तु भौतिक वस्तुएं इतनी धोखा देने वाली होती हैं कि जेहाद करने वाले और ईश्वर पर ईमान रखने वाले भी संभावित रूप से उनके संबंध में लड़खड़ा सकते हैं और इस्लामी शासन के संचालन के लिए पैग़म्बर और इसी प्रकार अनाथों, दरिद्रों और मार्ग में रह जाने वाले यात्रियों की सहायता के लिए अपने लाभ का पांचवां भाग देने में आनाकानी कर सकते हैं। इसी कारण ये आयत कहती हैं कि यदि तुम ईमान रखते हो तो ईमान की शर्त जान के साथ साथ माल का भी त्याग और बलिदान है।अलबत्ता शब्दकोष की दृष्टि से ग़नीमत शब्द का अर्थ, जो इस आयत में प्रयोग हुआ है, युद्ध से प्राप्त होने वाले माल के अतिरिक्त इस प्रकार का आर्थिक लाभ है। इसी कारण पैग़म्बरे इस्लाम के परिजनों के कथनानुसार ईमान वाले व्यक्ति को अपनी आय का पांचवां भाग उन मार्गों में ख़र्च करना चाहिए जिनका उल्लेख इस आयत में किया गया है।यद्यपि ये आयत युद्ध से प्राप्त होने वाले माल के बारे में उतरी है किन्तु इसका आदेश व्यापक है और हमारे काल में जब पैग़म्बर मौजूद नहीं हैं, हमें अपनी आय का पांचवां भाग ऐसे न्यायिक प्रवृत्ति वाले धर्मगुरूओं को देना चाहिए जो हमारे काल में पैग़म्बरे इस्लाम के उत्तराधिकारी हैं और वे उसे जहां उचित समझेंगे, ईश्वर के मार्ग में ख़र्च करेंगे।इस आयत में इस धन के ख़र्च के कुछ स्पष्ट उदाहरण दिए गए हैं जैसे अनाथ, दरिद्र और मार्ग में रह जाने वाले यात्री। अलबत्ता पैग़म्बर के परिजनों को जो धन देने की बात की गई है उससे तात्पर्य पैग़म्बर के वो परिजन हैं जो पैग़म्बर के पश्चात इस्लामी शासन के नेता बने अतः उनको दिया जाने वाला धन इस्लामी शासन के संचालन के लिए है।इस आयत से हमने सीखा कि समाज के वंचित लोगों का संचालन अन्य लोगों की आय से किया जाना चाहिए और वे धनवालों के माल में भागीदार हैं।युद्ध और जेहाद, सच्चे और झूठे तथा ईमान वाले व मिथ्याचारी लोगों को परखने के लिए ईश्वरीय परीक्षा का मंच है।बद्र का युद्ध, मुसलमानों की विजय के लिए ईश्वरीय सहायता का एक स्पष्ट प्रमाण है, जिसका ईश्वर ने अनेक स्थानों पर उल्लेख किया है।