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    सूरए अन्फ़ाल, आयतें 42-45, (कार्यक्रम 288)

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    आइये सूरए अन्फ़ाल की आयत संख्या 42 की तिलावत सुनते हैं।إِذْ أَنْتُمْ بِالْعُدْوَةِ الدُّنْيَا وَهُمْ بِالْعُدْوَةِ الْقُصْوَى وَالرَّكْبُ أَسْفَلَ مِنْكُمْ وَلَوْ تَوَاعَدْتُمْ لَاخْتَلَفْتُمْ فِي الْمِيعَادِ وَلَكِنْ لِيَقْضِيَ اللَّهُ أَمْرًا كَانَ مَفْعُولًا لِيَهْلِكَ مَنْ هَلَكَ عَنْ بَيِّنَةٍ وَيَحْيَا مَنْ حَيَّ عَنْ بَيِّنَةٍ وَإِنَّ اللَّهَ لَسَمِيعٌ عَلِيمٌ (42)(याद करो) उस समय (को) जब तुम (घाटी के) नीचे की ओर थे और वे ऊपर की ओर और (अनेकेश्वरवादियों का व्यापारिक) कारवान तुमसे अधिक नीचे की ओर था। और यदि तुमने आपस में (युद्ध के समय व स्थान के संबंध में) कोई वादा ठहराया होता तो अवश्य ही तुम्हारे बीच वादे को लेकर मतभेद उत्पन्न हो जाता किन्तु ईश्वर होने वाली बात का फ़ैसला करना चाहता था कि जो मारा जाए वो तर्क के साथ और जो जीवित रहे वो भी तर्क के साथ। और निश्चित रूप से ईश्वर सुनने वाला (और) जानकार है। (8:42)सूरए अन्फ़ाल के आरंभ से लेकर अब तक बद्र के युद्ध के बारे में अनेक आयतों में वर्णन हुआ। यह आयत इस्लामी सेना और शत्रु की सेना की भौगोलिक स्थिति और उनकी मोर्चेबंदी की ओर संकेत करते हुए कहती है। तुम शत्रुओं के दो गुटों के बीच आ गए थे। एक तो शत्रु की सेना थी जो मक्के से तैयार होकर आई थी, और दूसरे अनेकेश्वरवादियों का वो व्यापारिक कारवान जो मक्के जा रहा था। तुम चाहते थे कि व्यापारिक कारवान पर आक्रमण करके उसका माल अपने नियंत्रण में ले लो और युद्ध को समाप्त कर दो।किन्तु ईश्वर चाहता था कि तुम व्यापारिक कारवान के स्थान पर शत्रु की सेना से लड़ो और ईश्वर की गुप्त सहायता के सहारे उसे पराजित करो। इससे तुम्हारे ईमान में भी वृद्धि होगी और शत्रु के समक्ष तुम्हारी सत्यता भी सिद्ध हो जाएगी ताकि जो कोई मार्गदर्शन का इच्छुक है वह इस्लाम की ओर आए और जो इसे स्वीकार नहीं करता वो भी पूरे ज्ञान के साथ ये काम करे।इस आयत से पता चलता है कि मुसलमानों के भीतर शत्रु की सेना से लड़ने की तैयारी नहीं थी और क़ुरआने मजीद के शब्दों में यदि उन्होंने पहले से इस स्थान पर लड़ने का निर्णय किया होता तो निश्चित रूप से उनके बीच मतभेद उत्पन्न हो जाता और वे लड़ने के लिए तैयार न होते।इस आयत से हमने सीखा कि बद्र के युद्ध में मुसलमानों की विजय इस्लाम की सत्यता का एक स्पष्ट प्रमाण है।वो ईमान और मार्गदर्शन मूल्यवान है जो ज्ञान के आधार पर हो न कि अंधे अनुसरण और हठधर्म के आधार पर।आइये अब सूरए अन्फ़ाल की आयत संख्या 43 की तिलावत सुनते हैं।إِذْ يُرِيكَهُمُ اللَّهُ فِي مَنَامِكَ قَلِيلًا وَلَوْ أَرَاكَهُمْ كَثِيرًا لَفَشِلْتُمْ وَلَتَنَازَعْتُمْ فِي الْأَمْرِ وَلَكِنَّ اللَّهَ سَلَّمَ إِنَّهُ عَلِيمٌ بِذَاتِ الصُّدُورِ (43)और (हे पैग़म्बर! याद कीजिए उस समय को) जब ईश्वर ने शत्रु की संख्या सपने में आपको कम दिखाई और यदि वो उनकी संख्या अधिक दिखाता तो निश्चित रूप से तुम लोग ढीले पड़ जाते और युद्ध के मामले में तुम में मतभेद उत्पन्न हो जाता किन्तु ईश्वर ने तुम्हें सुरक्षित रखा निसंदेह वो तुम्हारे हृदय के भेदों से अवगत है। (8:43)बद्र के युद्ध में ईश्वर की एक गुप्त सहायता वो नींद थी जो युद्ध से पूर्व इस्लाम की सेना पर छा गई ताकि उनकी थकन उतर जाए और वे शारीरिक एवं मानसिक रूप से युद्ध के लिए तैयार हो जाएं।ये आयत कहती है कि ईश्वर की एक अन्य सहायता ये थी कि उसने पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम को सपने में शत्रु की संख्या कम दिखाई ताकि पैग़म्बर जब ये बात अपनी सेना को बताएं तो सैनिकों में साहस उत्पन्न हो जाए और वे शत्रु की संख्या से भयभीत न हों।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर से उसके पवित्र बंदों के संपर्क का एक मार्ग सच्चा सपना है।शत्रु से युद्ध के समय, उसकी संख्या और शस्त्रों का वर्णन नहीं करना चाहिए क्योंकि इससे सैनिकों की भावनाएं कमज़ोर पड़ जाती हैं।आइये अब सूरए अन्फ़ाल की आयत संख्या 44 की तिलावत सुनते हैं।وَإِذْ يُرِيكُمُوهُمْ إِذِ الْتَقَيْتُمْ فِي أَعْيُنِكُمْ قَلِيلًا وَيُقَلِّلُكُمْ فِي أَعْيُنِهِمْ لِيَقْضِيَ اللَّهُ أَمْرًا كَانَ مَفْعُولًا وَإِلَى اللَّهِ تُرْجَعُ الْأُمُورُ (44)और जब शत्रु से मुक़ाबले के समय ईश्वर ने तुम्हारी दृष्टि में उनकी संख्या को कम दिखाया और (इसी प्रकार उसने उनकी आंखों में तुम्हारी संख्या (भी) कम दिखाई ताकि उस बात का फ़ैसला कर दे जो होने वाली थी और ईश्वर ही की ओर सभी मामले वापस लौटते हैं। (8:44)न केवल पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम के सपने में बल्कि युद्ध के समय मुसलमानों की दृष्टि में भी शत्रुओं की संख्या कम ही दिखाई पड़ रही थी ताकि वे अधिक साहस के साथ रणक्षेत्र में आएं और युद्ध करें इसी के साथ शत्रुओं को भी मुसलमानों की संख्या कम दिखाई पड़ रही था ताकि वे घमंड में चूर होकर युद्ध को गम्भीरता से न लें।इस आयत से हमने सीखा कि एक ईश्वरीय सहायता आंखों को प्रभावित करना है ताकि शत्रु धोखा खाकर पराजित हो जाए।विजय केवल अधिक संख्या से प्राप्त नहीं होती। यदि ईश्वर पर ईमान हो तो वो कम को अधिक और अधिक को कम दिखाता है।आइये अब सूरए अन्फ़ाल की आयत संख्या 45 की तिलावत सुनते हैं।يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آَمَنُوا إِذَا لَقِيتُمْ فِئَةً فَاثْبُتُوا وَاذْكُرُوا اللَّهَ كَثِيرًا لَعَلَّكُمْ تُفْلِحُونَ (45)हे ईमान वालों जब (शत्रु के) किसी गुट से तुम्हारा सामना हो तो दृढ़ता से जमे रहो और ईश्वर को अत्याधिक याद करो कि शायद तुम्हें सफलता प्राप्त हो जाए। (8:45)इस आयत में ईश्वर कहता है कि हे ईमान वालो! अब जबकि हम तुम्हारी सहायता कर रहे हैं और तुम्हारे मार्ग की बाधाओं को समाप्त करते जा रहे हैं तो तुम लोग भी ढिलाई और सुस्ती से काम न लो बल्कि दृढ़ता के साथ डटे रहो और भय को अपने पास फटकने भी न दो। सदैव ईश्वर को याद करते रहो कि इससे तुम्हारे हृदय मज़बूत होंगे, विभिन्न अवसरों पर ईश्वरीय सहायता तुम्हें याद रहेगी। प्रत्येक दशा में कल्याण और सफलता, ईश्वरीय धर्म के मार्ग पर डटे रहने में ही प्राप्त होगी।इस आयत से हमने सीखा कि ईमान के लिए, सभी अवसरों पर और सभी क्षेत्रों में दृढ़ता अत्यंत आवश्यक है।दृढ़ता, रणक्षेत्र में विजय की कुंजी है।ईश्वर की याद, मनुष्य को घमंड और आत्ममुग्धता से बचाए रखती है।