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    सूरए अन्फ़ाल, आयतें 46-49, (कार्यक्रम 289)

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    आइये पहले सूरए अन्फ़ाल की आयत संख्या 46 की तिलावत सुनते हैं।وَأَطِيعُوا اللَّهَ وَرَسُولَهُ وَلَا تَنَازَعُوا فَتَفْشَلُوا وَتَذْهَبَ رِيحُكُمْ وَاصْبِرُوا إِنَّ اللَّهَ مَعَ الصَّابِرِينَ (46)और ईश्वर तथा उसके पैग़म्बर का आज्ञापालन करो और आपस में न झगड़ो कि तुम कमज़ोर पड़ जाओगे और तुम्हारी हवा उखड़ जाएगी और धैर्य से काम लो कि निसंदेह ईश्वर धैर्य करने वालों के साथ है। (8:46)पिछले कार्यक्रमों में बद्र के युद्ध की घटनाओं और इस युद्ध में ईश्वरीय सहायताओं का वर्णन किया गया। यह आयत कहती है कि शत्रु पर विजय प्राप्त करने के लिए तीन बातें आवश्यक हैं। एक ईश्वर का अनुसरण और पैग़म्बर के आदेशों का पालन। दूसरे एकता, समरसता तथा मतभेद से दूरी और तीसरे कठिनाइयों और संकटों के मुक़ाबले में धैर्य।अलबत्ता सभी सरकारें राष्ट्रीय एकता की सुरक्षा का नारा लगाती हैं किन्तु वही एकता मूल्यवान है जो ईश्वर के आदेशों के अनुसरण की छाया में हो अन्यथा ईश्वरीय आदेश के विरुद्ध किसी बात पर किसी भी राष्ट्र की एकता और समरसता का कोई मूल्य नहीं है।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वरीय क़ानून और आसमानी नेता को एकता का आधार होना चाहिए तथा मानव समाज को केवल ईश्वरीय आदेशों के सामने सिर झुकाना चाहिए।आपसी मतभेद, बाहरी शत्रु के मुक़ाबले में पराजय का कारण बनता है।दृढ़ता और प्रतिरोध के फलस्वरूप ही ईश्वरीय सहायता प्राप्त होती है और कमज़ोर ईमान वाले इससे वंचित रहते हैं।आइये अब सूरए अन्फ़ाल की आयत संख्या 47 की तिलावत सुनते हैं।وَلَا تَكُونُوا كَالَّذِينَ خَرَجُوا مِنْ دِيَارِهِمْ بَطَرًا وَرِئَاءَ النَّاسِ وَيَصُدُّونَ عَنْ سَبِيلِ اللَّهِ وَاللَّهُ بِمَا يَعْمَلُونَ مُحِيطٌ (47)(हे ईमान वालो!) उन लोगों की भांति न हो जाओ जो अपने घरों से इतराते हुए और लोगों को दिखाते हुए निकले और लोगों को ईश्वरीय मार्ग से रोकते रहे और जो कुछ वे करते हैं, ईश्वर उससे पूर्णतः अवगत है। (8:47)ईश्वर के मार्ग में जेहाद करने वाले जिन ख़तरों से जूझते हैं उनमें घमंड, दिखावा और अहंकार भी है। सत्य के मोर्चे पर लड़ने वाले को केवल ईश्वर के लिए संघर्ष करना चाहिए और उसे कदापि अपनी आंतरिक इच्छा के कारण किसी की न हत्या करनी चाहिए न ही किसी को घायल करना चाहिए।किन्तु हो सकता है कि कोई ईश्वरीय आदेश के पालन हेतु निष्ठा के साथ रणक्षेत्र में जाए परंतु घमंड या दिखावे का शिकार हो जाए और ईश्वर के स्थान पर, लोगों पर अपनी श्रेष्ठता या अपनी शारीरिक शक्ति व क्षमता दिखाने के विचार में पड़ जाए। ऐसा व्यक्ति अपने संघर्ष को महान दर्शाकर तथा उस समय की कठिनाइयों का उल्लेख करके अपने सभी भले कर्मों को तबाह कर देता है और उसके पास पश्चाताप के अतिरिक्त कुछ नहीं बचता।इसी कारण ये आयत जेहाद व संघर्ष के इन दो बड़े ख़तरों की ओर संकेत करते हुए कहती है कि तुम भी शत्रुओं और अनेकेश्वरवादियों की भांति न हो जाओ जो घमंड और दिखावे के लिए लड़ते हैं और उनका लक्ष्य लोगों को ईश्वर के मार्ग से रोकना होता है।इस आयत से हमने सीखा कि इस्लामी जेहाद और अन्य युद्धों का अंतर उनके लक्ष्य और नीयत में है। दूसरे लोग वर्चस्व और शक्ति प्रदर्शन के लिए युद्ध करते हैं जबकि ईश्वर के मार्ग में लड़ने वालों का लक्ष्य अन्याय व अत्याचार की समाप्ति होता है।लोगों को ईश्वर के मार्ग से रोकने के शत्रु के सभी प्रयासों के बावजूद ईश्वर स्वयं निरीक्षक व मुक्तिदाता है।आइये अब सूरए अन्फ़ाल की आयत संख्या 48 की तिलावत सुनते हैं।وَإِذْ زَيَّنَ لَهُمُ الشَّيْطَانُ أَعْمَالَهُمْ وَقَالَ لَا غَالِبَ لَكُمُ الْيَوْمَ مِنَ النَّاسِ وَإِنِّي جَارٌ لَكُمْ فَلَمَّا تَرَاءَتِ الْفِئَتَانِ نَكَصَ عَلَى عَقِبَيْهِ وَقَالَ إِنِّي بَرِيءٌ مِنْكُمْ إِنِّي أَرَى مَا لَا تَرَوْنَ إِنِّي أَخَافُ اللَّهَ وَاللَّهُ شَدِيدُ الْعِقَابِ (48)और याद करो उस समय को जब शैतान ने उनके कर्मों को उनके लिए शोभनीय बना दिया और कहा कि आज कोई भी तुम पर प्रभुत्व प्राप्त नहीं कर सकेगा और निश्चित रूप से मैं तुम्हारे साथ हूं। तो जब दोनों गुट आमने सामने आए तो शैतान उल्टे पांव भाग निकला और उसने कहाः निसंदेह मैं तुमसे विरक्त हूं। मैं वह देख रहा हूं जो तुम नहीं देख रहे हो, तो मैं ईश्वर से डरता हूं और ईश्वर अत्यंत कड़ा दंड देने वाला है। (8:48)ये आयत बद्र के युद्ध के एक अन्य आयाम की ओर संकेत करते हुए कहती है। जिस प्रकार से इस्लाम की सेना में फ़रिशतों की उपस्थिति मुसलमानों के प्रोत्साहन का कारण बनी उसी प्रकार शैतान मनुष्य के भेस में अनेकेश्वरवादियों की सेना में उपस्थित हुआ और उसने अपने बहकावों द्वारा उन्हें विजय का वचन दिया किन्तु जैसे ही उसे फ़रिशतों की उपस्थिति का आभास हुआ वो समझ गया कि ईश्वर मुसलमानों का सहायक है और उन्हें पराजय नहीं होगी तो वो फ़रार हो गया और उसने कहा कि मैं लोक परलोक में ईश्वर के दंड से डरता हूं।ये आयत वस्तुतः असत्य के मोर्चे पर शैतान की उपस्थिति और उसके झूठे वादों को दर्शाती है जिनके कारण असत्य पर चलने वाले लोग धोखा खा जाते हैं और विजय की आशा में रणक्षेत्र में आते हैं किन्तु निराशा और कुन्ठा के अतिरिक्त उनके हाथ कुछ नहीं लगता।इस आयत से हमने सीखा कि बुराइयों को अच्छा दिखाना शैतान का काम है, हमें शैतान के बहकावे में आकर बुराइयों का औचित्य नहीं दर्शाना चाहिए।शैतान बुराई की आग भड़काता है और विजय के वचन देता है किन्तु कभी स्वयं रणक्षेत्र में नहीं आता।शैतान, लोक परलोक में ईश्वर की शक्ति से अवगत है किन्तु फिर भी ईश्वर पर ईमान नहीं लाता और यही ज्ञान व ईमान का अंतर है।आइये अब सूरए अन्फ़ाल की आयत संख्या 49 की तिलावत सुनते हैं।إِذْ يَقُولُ الْمُنَافِقُونَ وَالَّذِينَ فِي قُلُوبِهِمْ مَرَضٌ غَرَّ هَؤُلَاءِ دِينُهُمْ وَمَنْ يَتَوَكَّلْ عَلَى اللَّهِ فَإِنَّ اللَّهَ عَزِيزٌ حَكِيمٌ (49)जब मिथ्याचारियों ने और जिनके हृदयों में रोग था उन्होंने कहा कि मुसलमानों को उनके धर्म ने धोखा दिया है जबकि जो कोई ईश्वर पर भरोसा करता है तो निश्चित रूप से ईश्वर अत्यंत प्रभुत्वशाली और तत्वदर्शी है। (8:49)मिथ्याचारी कि जो, ईमान वालों की विजय से वास्तव में प्रसन्न नहीं होते, न केवल यह कि स्वयं ख़तरों के अवसर पर उपस्थित नहीं होते बल्कि दूसरों को भी रणक्षेत्र में जाने से रोकने का प्रयास करते हैं। अतः वे ईमान वालों की विजय को घमंड व धोखा बताते हुए उसे तर्कहीन कार्य कहते हैं जबकि ईमान वालों की विजय, ईश्वर पर उनके भरोसे के कारण होती है जिससे मिथ्याचारी वंचित होते हैं। चूंकि ईश्वर अजेय है अतः जो भी उस पर भरोसा करे वो अजेय हो जाता है।इस आयत से हमने सीखा कि मिथ्या, हृदय के लिए एक रोग है और इस रोग का उपचार दवाओं से नहीं होता। केवल ईमान और सत्य को स्वीकार करके इसका उपचार किया जा सकता है।ईमान वाला व्यक्ति प्रयास करता है किन्तु परिणाम की प्राप्ति के लिए वो अपने प्रयास पर नहीं बल्कि ईश्वर पर भरोसा करता है।