islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. सूरए अन्फ़ाल, आयतें 5-9, (कार्यक्रम 280)

    सूरए अन्फ़ाल, आयतें 5-9, (कार्यक्रम 280)

    Rate this post

    आइये अब सूरए अन्फ़ाल की आयत संख्या पांच और छह की तिलावत सुनते हैं।كَمَا أَخْرَجَكَ رَبُّكَ مِنْ بَيْتِكَ بِالْحَقِّ وَإِنَّ فَرِيقًا مِنَ الْمُؤْمِنِينَ لَكَارِهُونَ (5) يُجَادِلُونَكَ فِي الْحَقِّ بَعْدَمَا تَبَيَّنَ كَأَنَّمَا يُسَاقُونَ إِلَى الْمَوْتِ وَهُمْ يَنْظُرُونَ (6)(बद्र के युद्ध में माल के बंटवारे पर कुछ मुसलमानों की अप्रसन्नता) उस समय की भांति (है) जब आपके पालनहार ने (युद्ध में उपस्थित होने के लिए) आपको सत्य के साथ घर से निकाला जबकि कुछ ईमान वाले इससे अप्रसन्न थे। (8:5) वे लोग सत्य के सिद्ध होने जाने के पश्चात भी आपसे उसके बारे में वाद विवाद करते हैं (वे ऐसे भयभीत हैं) मानों उन्हें मौत की ओर हंकाया जा रहा हो और वे (अपनी मृत्यु को) देख रहे हों। (8:6)इस कार्यक्रम में जिन आयतों की तिलावत सुनेंगे, वे बद्र नामक युद्ध से संबंधित हैं। सन 2 हिजरी में पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम को यह सूचना दी गई कि अबू सुफ़ियान के नेतृत्व में मक्के के अनेकेश्वरवादियों का एक बड़ा कारवान व्यापार का माल लेकर आ रहा है। पैग़म्बरे इस्लाम ने अपने साथियों से कहा कि शत्रु पर आर्थिक प्रहार करने तथा उनसे पलायन करने वाले मुसलमानों का शत्रुओं द्वारा ज़ब्त किया गया माल वापस लेने के लिए इस कारवान को घेर लिया जाए। किन्तु अबू सुफ़ियान को इस योजना का पता चल गया। उसने मक्के के अनेकेश्वरवादियों को मसुलमानों की इस योजना से अवगत करवा दिया और कारवान को एक दूसरे मार्ग से मक्के की ओर ले गया। उसके पश्चात मक्के के लगभग एक हज़ार अनेकेश्वरवादी अबू जेहल के नेतृत्व में इस्लामी सेना की ओर बढ़े और मक्के और मदीने के बीच बद्र नामक स्थान पर एकत्रित हो गए।पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम ने अपने साथियों से परामर्श किया कि व्यापारिक करावान का पीछा किया जाए या अनेकेश्वरवादियों की सेना का मुक़ाबला किया जाए चूंकि मुसलमान युद्ध के लिए घर से बाहर नहीं निकले थे और विपक्षी सेना की संख्या भी उनसे तीन गुना अधिक थी, अतः लोग युद्ध नहीं करना चाहते थे, यहां तक कि वे इस संबंध में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम से बहस कर रहे थे।किन्तु अधिकांश मुसलमानों द्वारा तैयारी की घोषणा के पश्चात पैग़म्बर ने शत्रु की सेना से मुक़ाबला करने का निर्णय किया। इस युद्ध में ईश्वर की सहायता से मुसलमान विजयी हुए। युद्ध में अबू जेहल और उसके 70 सैनिक मारे गए तथा 70 अन्य को बंदी बना लिया गया।बद्र में केवल 14 मुसलमान ही शहीद हुए। यह आयतें कहती हैं कि कुछ लोग यद्यपि ईश्वर और पैग़म्बरे इस्लाम पर ईमान रखते थे किन्तु जब धर्म की रक्षा हेतु जान की बाज़ी लगाने का समय आया तो वे ढ़ीले पड़ गए यहां तक कि वे पैग़म्बर से भी बहस करने लगे।इन आयतों से हमने सीखा कि मनुष्य यद्यपि प्राकृतिक रूप से युद्ध को पसंद नहीं करता किन्तु शत्रुओं के साथ जेहाद एक धार्मिक कर्तव्य है।डरपोक लोग न केवल यह कि जेहाद में भाग नहीं लेते बल्कि इस संबंध में वे ईश्वरीय नेताओं पर भी आपत्ति करते हैं।आइये अब सूरए अन्फ़ाल की आयत संख्या 7 और 8 की तिलावत सुनते हैं।وَإِذْ يَعِدُكُمُ اللَّهُ إِحْدَى الطَّائِفَتَيْنِ أَنَّهَا لَكُمْ وَتَوَدُّونَ أَنَّ غَيْرَ ذَاتِ الشَّوْكَةِ تَكُونُ لَكُمْ وَيُرِيدُ اللَّهُ أَنْ يُحِقَّ الْحَقَّ بِكَلِمَاتِهِ وَيَقْطَعَ دَابِرَ الْكَافِرِينَ (7) لِيُحِقَّ الْحَقَّ وَيُبْطِلَ الْبَاطِلَ وَلَوْ كَرِهَ الْمُجْرِمُونَ (8)और (हे ईमान वालों!) उस समय को याद करो कि जब ईश्वर वाद कर रहा था कि (व्यापारिक कारवान या शत्रु के सिपाही) दोनों में से एक गुट का सामना तुमको अवश्य ही करना है और तुम चाहते थे कि वह शक्तिशाली गुट न हो। और ईश्वर अपने कथनों के माध्यम से सत्य को सिद्ध करना और काफ़िरों की जड़ काट देना चाहता है (8:7) ताकि वह सत्य को सिद्ध और असत्य को समाप्त कर दे, चाहे अपराधियों को बुरा ही क्यों न लगे। (8:8)यह आयतें कहती हैं कि यद्यपि तुम लोग शत्रु के व्यापारिक कारवान पर प्रहार के लिए मक्के की ओर बढ़े थे तथा शत्रु के सशस्त्र गुट के मुक़ाबले की अपेक्षा नहीं थी किन्तु तुम्हें आगे बढ़ाने में ईश्वर का लक्ष्य सत्य को सिद्ध व सुदृढ़ करना तथा असत्य को समाप्त करना था ताकि सत्य की विजय और असत्य की पराजय की ईश्वरीय परंपरा व्यवहारिक हो सके।अलबत्ता अब तक यह इच्छा, पूर्ण रूप से व्यवहारिक नहीं हो सकी और ईमान वाले जीतने के साथ साथ पराजित भी हुए। क़ुरआने मजीद और पैग़म्बर तथा उनके परिजनों के कथनों के अनुसार, संसार के अंतिम काल में जब इमाम मेहदी अलैहिस्सलाम प्रकट होंगे तो यह ईश्वरीय परंपरा पूर्ण और व्यापक रूप से धरती में व्यवहारिक हो जाएगी और सत्य व न्याय की स्थापना के साथ असत्य और अत्याचार समाप्त हो जाएगा।इन आयतों से हमने सीखा कि केवल संख्या और शस्त्रों से विजय नहीं प्राप्त होती बल्कि इसमें भावना जैसे मानवीय कारकों तथा ईश्वरीय सहायता की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है।इस्लामी संस्कृति में जेहाद का लक्ष्य, सत्य को सिद्ध करना तथा असत्य को समाप्त करना है। विस्तारवाद या धन संपत्ति के लोभ के लिए किए जाने वाले आक्रमणों को जेहाद नहीं कहा जा सकता।शत्रु को राज़ी व प्रसन्न करने का प्रयास नहीं करना चाहिए क्योंकि सत्य को सिद्ध व सुदृढ़ करने में अपराधी और धर्म विरोधी अवश्य ही अप्रसन्न होंगे।आइये अब सूरए अन्फ़ाल की आयत संख्या 9 की तिलावत सुनते हैं।إِذْ تَسْتَغِيثُونَ رَبَّكُمْ فَاسْتَجَابَ لَكُمْ أَنِّي مُمِدُّكُمْ بِأَلْفٍ مِنَ الْمَلَائِكَةِ مُرْدِفِينَ (9)(याद करो) उस समय को जब तुम्हारे पालनहार को (सहायता के लिए) पुकार रहे थे तो उसने तुम्हारी प्रार्थना स्वीकार कर ली (और कहा कि) निसंदेह, मैं एक हज़ार फ़रिश्ते भेजकर तुम्हारी सहायता करने वाला हूं जो निरंतर एक के पीछे एक आने वाले हैं। (8:9)यह आयत स्पष्ट रूप से बद्र के युद्ध में ईश्वरीय सहायता का वर्णन करती है। यह सहायता फ़रिश्तों के माध्यम से की गई थी। इस आयत में फ़रिश्तों की संख्या एक हज़ार बताई गई है जबकि सूरए आले इमरान की आयत संख्या 124 और 125 में यह संख्या तीन हज़ार और पांच हज़ार बताई गई है जो युद्ध के विभिन्न चरणों में अनेक फ़रिश्तों की उपस्थिति को दर्शाती है।अलबत्ता स्वाभविक है कि फ़रिश्ते शत्रुओं के सैनिकों से नहीं लड़े किन्तु मुस्लिम संघर्षकर्ताओं के बीच उनकी उपस्थिति उनके मनोबल और ईमान में वृद्धि का भी कारण बनी और शत्रुओं के हृदयों में भय और आतंक उत्पन्न करने का कारक बनी। यह आयत इसी प्रकार से युद्ध के दौरान प्रार्थना की भूमिका पर भी बल देती है और ईमान वालों की विजय का रहस्य, ईश्वर के समक्ष ईमान वालों की प्रार्थना और ईश्वर द्वारा उसकी स्वीकृति को बताती है।इस आयत से हमने सीखा कि यद्यपि ईश्वर बिना प्रार्थना के ही हमारी आश्यकताओं की पूर्ति कर सकता है किन्तु प्रार्थना ईश्वरीय अनुकंपा की प्राप्ति हेतु मनुष्य की योग्यता में वृद्धि करती है और मनुष्य का प्रशिक्षण करती है।मनुष्यों के जीवन में फ़रिश्तों की भी भूमिका होती है तथा ईमान, मनुष्यों की ओर उनके आकृष्ट होने का कारण बनता है।ईश्वरीय सहायता तभी आती है जब मनुष्य प्रयास करे और ईश्वर के समक्ष अत्याधिक विनम्रता से अपनी आवश्यकता प्रकट करे।