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    सूरए अन्फ़ाल, आयतें 50-54, (कार्यक्रम 290)

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    आइये अब सूरए अन्फ़ाल की आयत संख्या 50 और 51 की तिलावत सुनते हैं।وَلَوْ تَرَى إِذْ يَتَوَفَّى الَّذِينَ كَفَرُوا الْمَلَائِكَةُ يَضْرِبُونَ وُجُوهَهُمْ وَأَدْبَارَهُمْ وَذُوقُوا عَذَابَ الْحَرِيقِ (50) ذَلِكَ بِمَا قَدَّمَتْ أَيْدِيكُمْ وَأَنَّ اللَّهَ لَيْسَ بِظَلَّامٍ لِلْعَبِيدِ (51)और (हे पैग़म्बर!) यदि आप देखते कि जब फ़रिशते उनकी जान निकाल रहे थे और उनके चेहरों और पीठों पर मारते जाते थे कि (लो) अब जलाने वाले दंड (का स्वाद) चखो। (8:50) यह दंड तुम्हारे पिछले कर्मों का बदला है और निसंदेह ईश्वर अपने बंदों पर अत्याचार नहीं करता। (8:51)पिछले कार्यक्रमों में, मुसलमानों को समाप्त करने तथा उनकी धार्मिक शिक्षाओं के अनादर के लिए काफ़िरों और मिथ्याचारियों के षड्यंत्रों की ओर संकेत किया गया। ईश्वर ने भी वचन दिया था कि यदि ईमान वाले सुदृढ़ रहे और प्रतिरोध करते रहे तो वो उनकी सहायता करेगा और शत्रुओं को पराजय होगी।ये आयतें कहती हैं कि कड़े हृदय वाले काफ़िरों को न केवल संसार में विजय प्राप्त नहीं होती बल्कि मरते समय भी उन्हें फ़रिशतों का कड़ा दंड सहन करना पड़ता है जो दंड के कोड़े उनके चेहरे और पीठ पर मारते हैं और इस प्रकार उनकी जान निकाल लेते हैं, जबकि इसके विपरीत, क़ुरआने मजीद के सूरए नह्ल की 32वीं आयत के अनुसार, फ़रिशते ईमान वालों की जान बड़ी सरलता से निकालते हैं।इन आयतों से हमने सीखा कि काफ़िरों के प्रति ईश्वर का कोप उनके मरने के समय से आरंभ हो जाता है।ईश्वरीय दंड, उसका प्रतिशोध नहीं बल्कि मनुष्य के कर्मों का फल है।आइये अब सूरए अन्फ़ाल की आयत संख्या 52 की तिलावत सुनते हैं।كَدَأْبِ آَلِ فِرْعَوْنَ وَالَّذِينَ مِنْ قَبْلِهِمْ كَفَرُوا بِآَيَاتِ اللَّهِ فَأَخَذَهُمُ اللَّهُ بِذُنُوبِهِمْ إِنَّ اللَّهَ قَوِيٌّ شَدِيدُ الْعِقَابِ (52)(हे पैग़म्बर! आपके साथ काफ़िरों का व्यवहार) फ़िरऔन के लोगों और उनसे पहले के काफ़िरों के समान है कि जिन्होंने (हठधर्मी और द्वेष के चलते) ईश्वर की निशानियों का इन्कार किया तो ईश्वर ने उन्हें उनके पापों के कारण (अपनी) पकड़ में ले लिया। निसंदेह ईश्वर अत्यंत शक्तिशाली और कड़ा दंड देने वाला है। (8:52)ये आयत ईमान वालों को सांत्वना देते हुए कहती है कि ये मत सोचो कि विरोधियों का तुम्हारे साथ ये व्यवहार नया है और केवल तुम ही ऐसे हठधर्म और द्वेषी लोगों के बीच फंसे हो। ऐसा नहीं है बल्कि संपूर्ण इतिहास में पैग़म्बर के विरोधियों ने सत्य का इन्कार किया है। क्या तुम हज़रत मूसा और उनके अनुयाइयों के प्रति फ़िरऔन और उसके लोगों के व्यवहार को भूल गए? या उससे भी पहले नमरूद ने हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के साथ जो किया क्या वो तुम्हें याद नहीं है?क्या तुमने नहीं देखा कि ईश्वर ने सत्य के शत्रुओं को किस प्रकार अपमानित किया और उन्हें उनके किए का फल दिया अतः ईश्वर की शक्ति पर भरोसा करो और उनके समक्ष डट जाओ कि ईश्वर तुम्हारे साथ है।इस आयत से हमने सीखा कि जब कभी कुफ़्र और हठधर्म किसी समाज की आदत व प्रवृत्ति बन जाए तो ईश्वरीय दंड आ जाता है।पूरे इतिहास में ईश्वर की परंपरा स्थिर रही है और सभी जातियां उसकी दृष्टि में एकसमान रही हैं, ईमान वालों को पारितोषिक और काफ़िरों को दंड मिलता है।आइये अब सूरए अन्फ़ाल की आयत संख्या 53 की तिलावत सुनते हैं।ذَلِكَ بِأَنَّ اللَّهَ لَمْ يَكُ مُغَيِّرًا نِعْمَةً أَنْعَمَهَا عَلَى قَوْمٍ حَتَّى يُغَيِّرُوا مَا بِأَنْفُسِهِمْ وَأَنَّ اللَّهَ سَمِيعٌ عَلِيمٌ (53)ये इसलिए है कि ईश्वर किसी जाति को दी हुई अनुकंपा को उस समय तक परिवर्तित करने वाला नहीं है जब तक वे स्वयं अपने आपको परिवर्तित न करें और निश्चित रूप से ईश्वर सुनने वाला और अत्यंत जानकार है। (8:53)यह आयत ईश्वर की एक महान परंपरा की ओर संकेत करते हुए कहती है। ईश्वर आरंभ में सभी लोगों और जातियों को अपनी अनुकंपाओं का पात्र बनाता है और उन्हें विभिन्न योग्यताएं और क्षमताएं प्रदान करता है। वो उनसे ये अनुकंपाएं तब तक वापस नहीं लेता जब तक वे स्वयं उसके पतन या परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त न कर दें।क़ुरआन की आयतों तथा पैग़म्बरे इस्लाम व उनके परिजनों के कथनों के अनुसार दूसरों पर अत्याचार, अनुकंपा की समाप्ति और विभिन्न प्रकार की कठिनाइयों में ग्रस्त होने का एक मुख्य कारण है। जिस प्रकार से कि तौबा अर्थात प्रायश्चित और ईश्वर की ओर वापसी विभिन्न ईश्वरीय अनुकंपाओं और विभूतियों का कारण है।इस आयत से हमने सीखा कि मनुष्य की मुक्ति या तबाही स्वयं उसी के हाथ में है और हर कोई अपना भविष्य स्वयं लिखता है।ईश्वर की परंपरा अनुकंपाओं को निरंतर भेजने पर आधारित है जहां कहीं भी अनुकंपा समाप्त होती है, उसका कारण हम ही होते हैं।मनुष्य इतिहास बनाता है और वो समाज की परिस्थितियों को बदल सकता है।आइये अब सूरए अन्फ़ाल की आयत संख्या 54 की तिलावत सुनते हैं।كَدَأْبِ آَلِ فِرْعَوْنَ وَالَّذِينَ مِنْ قَبْلِهِمْ كَذَّبُوا بِآَيَاتِ رَبِّهِمْ فَأَهْلَكْنَاهُمْ بِذُنُوبِهِمْ وَأَغْرَقْنَا آَلَ فِرْعَوْنَ وَكُلٌّ كَانُوا ظَالِمِينَ (54)जिस प्रकार फ़िरऔन के लोगों और उनसे पहले वालों की दशा हुई कि जिन्होंने अपने पालनहार की निशानियों को झुठलाया तो हमने उन्हें, उनके पापों के कारण विनष्ट कर दिया और फ़िरऔन के लोगों को डुबो दिया और वे सबके सब अत्याचारी थे। (8:54)पिछली आयत में अनुकंपाओं और मनुष्य द्वारा उनसे लाभान्वित होने के संबंध में ईश्वर की स्थाई परंपरा के बारे में संकेत किया गया था। ये आयत पूरे इतिहास में ईश्वरीय आयतों के इन्कार की काफ़िरों की परंपरा की ओर संकेत करती है और कहती है। ये काफ़िरों की आदत और प्रवृत्ति है कि वे सत्य को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होते और सत्य की हर पुकार के मुक़ाबले में हठधर्मी से डट जाते हैं।अलबत्ता जैसा कि पिछली आयत के अंत में कहा गया है, ईश्वर ऐसे लोगों को अपनी अनंत दया व कृपा से वंचित करके उन्हें विभिन्न प्रकार की कठिनाइयों में ग्रस्त कर देता है जिनमें सबसे छोटा दंड मृत्यु है, अलबत्ता ये मृत्यु भी सरल नहीं होती बल्कि समुद्र में डूबने, भूकंप या विभिन्न प्रकार की आपदाओं में ग्रस्त होने जैसी कठिन मृत्यु।इस आयत से हमने सीखा कि पिछले लोगों के अंत से पाठ सीखना चाहिए कि हमारे समक्ष उज्जवल भविष्य रहे।अत्याचार, ईश्वरीय कोप का कारण है अब वो अत्याचार चाहे स्वयं पर हो, अन्य लोगों पर या पैग़म्बरों के आसमानी धर्म पर।