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    सूरए अन्फ़ाल, आयतें 55-59, (कार्यक्रम 291)

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    आइये अब सूरए अन्फ़ाल की आयत संख्या 55 की तिलावत सुनते हैं।إِنَّ شَرَّ الدَّوَابِّ عِنْدَ اللَّهِ الَّذِينَ كَفَرُوا فَهُمْ لَا يُؤْمِنُونَ (55)निसंदेह, धरती पर चलने वालों में सबसे बुरे वे हैं जिन्होंने कुफ़्र अपनाया तो (अब) वे ईमान वाले नहीं हैं। (8:55)पिछले कार्यक्रमों में पैग़म्बरों की सच्ची बातों के प्रति काफ़िरों के व्यवहार की चर्चा की गई और कहा कि इस आदत के कारण पूरे इतिहास में वे सत्य को झुठलाते रहे हैं और सत्य स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हुए हैं। यह आयत कहती है कि द्वेष, हठधर्म और सत्य से शत्रुता के कारण सामने आने वाला यह कुफ़्र, ईश्वर की दृष्टि में मनुष्य को धरती पर रेंगेने वालों से भी गिरा देता है और उसे कीचड़ में रहने वाले कीड़ों की पक्ति में ला खड़ा करता है।इस सूरए की 22वीं आयत में कहा गया है कि धरती पर चलने वाले सबसे बुरे वे लोग हैं जो सोच विचार नहीं करते। यह आयत कहती है कि ऐसे लोग हैं जो ईमान लाने के लिए तैयार नहीं होते। इस आधार पर कुफ़्र का स्रोत, सही चिंतन न करना है। संभव है कि लोगों की दृष्टि में काफ़िरों का सम्मान हो किन्तु ईश्वर के निकट उनका कोई सम्मान नहीं है।इस आयत से हमने सीखा कि मनुष्य का वास्तविक मूल्य उसकी बुद्धि और ईमान में निहित है और कुफ़्र मनुष्य को मानवता से नीचे गिरा देता है।बहुत से कीड़े मकोड़े मानव जीवन के लिए लाभदायक हैं किन्तु काफ़िर तो उनसे भी गिरे हुए और मूल्यहीन हैं।आइये अब सूरए अन्फ़ाल की आयत संख्या 56 की तिलावत सुनते हैं।الَّذِينَ عَاهَدْتَ مِنْهُمْ ثُمَّ يَنْقُضُونَ عَهْدَهُمْ فِي كُلِّ مَرَّةٍ وَهُمْ لَا يَتَّقُونَ (56)जिनसे आपने प्रतिज्ञा ली है किन्तु वे हर बार अपनी प्रतीज्ञा तोड़ देते हैं और वे (ईश्वर से) नहीं डरते। (8:56)यह आयत पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम से मदीना नगर के यहूदियों के संबंधों की ओर संकेत करते हुए कहती है कि यद्यपि यहूदियों ने वचन दिया था कि वे मुसलमानों के विरुद्ध मक्के के अनेकेश्वरवादियों की कोई सहायता नहीं करेंगे और मदीने के मुसलमानों को नहीं सताएंगे किन्तु उन्होंने अनेक बार अपना यह वचन तोड़ा बल्कि अनेकेश्वरवादियों के सहयोग से ख़ंदक नाम युद्ध भी आरंभ किया।यह आयत यद्यपि काफ़िरों की वचन तोड़ने की आदत की ओर संकेत करती है किन्तु पैग़म्बरे इस्लाम और उनके परिजनों के कथनों में इसे मिथ्याचारियों की विशेषता बताते हुए कहा गया है कि जो कोई अपने वचन का पालन न करे व मिथ्याचारी है चाहे नमाज़ ही क्यों न पढ़ता हो और रोज़ा ही क्यों न रखता हो।इस आयत से हमने सीखा कि काफ़िरों और अनेकेश्वरवादियों से संधि की जा सकती है और जब तक वे कटिबद्ध हैं संधि को नहीं तोड़ा जा सकता।वचन तोड़ने का एक कारण, ईश्वर से डरना है जिससे मनुष्य निश्चेत हो जाता है।आइये अब सूरए अन्फ़ाल की आयत संख्या 57 की तिलावत सुनते हैं।فَإِمَّا تَثْقَفَنَّهُمْ فِي الْحَرْبِ فَشَرِّدْ بِهِمْ مَنْ خَلْفَهُمْ لَعَلَّهُمْ يَذَّكَّرُونَ (57)तो (हे पैग़म्बर!) जब भी वे युद्ध में आपके नियंत्रण में आ जाएं तो मोर्चे के पीछे मौजूद उनके लोगों को तितर बितर कर दीजिए ताकि वे सीख लें (और षड्यंत्र न करें) (8:57)पिछली आयत में काफ़िरों और अनेकेश्वरवादियों की वचन तोड़ने की प्रवृत्ति की ओर संकेत किया गया था। यह आयत इस्लामी समाज के नेता के रूप में पैग़म्बरे इस्लाम को संबोधित करते हुए कहती है कि अब जब यह लोग षड्यंत्र कर रहे हैं तो पूरी शक्ति के साथ इनका मुक़ाबला करो। इस प्रकार से कि शत्रु भयभीत और आतंकित होकर भाग खड़ा हो और फिर कभी मुसलमानों पर आक्रमण का साहस न कर सकें।स्पष्ट है कि इसके लिए मुसलमानों के बीच संपूर्ण चेतना और शत्रु की विभिन्न चालों की पहचान आवश्यक है ताकि वे उसे पराजित और उसके समर्थकों को निराश कर सकें।इस आयत से हमने सीखा कि केवल मोर्चे पर मौजूद शत्रु के लोगों को पराजित करके संतुष्ट नहीं होना चाहिए बल्कि पृष्ठिभूमि में मौजूद शत्रु के मुख्य योजनाकारों और षड्यंत्रकर्ताओं को पहचान कर उनको ठिकाने लगाना चाहिए।इस्लाम एक सरल और करुणामई धर्म है किन्तु विश्वासघात व शांति बिगाड़ने को वह कदापि सहन नहीं करता।आइये अब सूरए अन्फ़ाल की आयत संख्या 58 और 59 की तिलावत सुनते हैं।وَإِمَّا تَخَافَنَّ مِنْ قَوْمٍ خِيَانَةً فَانْبِذْ إِلَيْهِمْ عَلَى سَوَاءٍ إِنَّ اللَّهَ لَا يُحِبُّ الْخَائِنِينَ (58) وَلَا يَحْسَبَنَّ الَّذِينَ كَفَرُوا سَبَقُوا إِنَّهُمْ لَا يُعْجِزُونَ (59)और यदि किसी जाति (या गुट) की ओर से विश्वासघात का ख़तरा हो तो आप भी न्याय के साथ (उनके साथ की गई) संधि के टूटने की सूचना दे दें क्योंकि ईश्वर विश्वासघात करने वालों को पसंद नहीं करता (8:58) और काफ़िर यह न सोचें कि वे आगे बढ़ गए हैं, वे हमें अक्षम नहीं बता सकते। (8:59)मदीना नगर के यहूदियों द्वारा संधि के उल्लंघन की ओर संकेत करने के पश्चात यह आयतें एक मूल सिद्धांत के रूप में कहती हैं कि इस्लामी जनता के नेता को इतना सचेत और होशियार होना चाहिए कि जब कभी वह शत्रु के षड्यंत्रों का आभास कर तो तुरंत ही उसे विफल बनाने का उपाय करे और शत्रु को इस्लामी समुदाय पर वर्चस्व की अनुमति न दे।उसे शत्रु की ओर से ख़तरे का आभास करते हुए शत्रु को संधि के रद्द होने की सूचना देनी चाहिए और इस्लामी समाज की हर प्रकार की रक्षा के लिए मुसलमानों को तैयार करना चाहिए। जहां कहीं भी षड्यंत्र का आभास हो उसे विफल बनाने के लिए प्रयास करना चाहिए और शांति की संधि को रद्द कर देना चाहिए किन्तु जब तक शत्रु युद्ध आरंभ न करे उसके विरुद्ध व्यवहारिक कार्यवाही नहीं करनी चाहिए।इन आयतों से हमने सीखा कि अंतर्राष्ट्रीय संधियों और समझौतों पर उसी समय तक कटिबद्ध रहना चाहिए जब तक विश्वासघात का ख़तरा न हो।संधि को, जवाब में और न्यायपूर्व ढंग से रद्द करना चाहिए ऐसा न हो कि शत्रु को बिना बताए कायरता के साथ संधि रद्द कर दी जाए कि यह स्वयं ही विश्वासघात है।इस्लामी समाज के नेताओं को ऐसी युक्तियां और पहल करनी चाहिए कि शत्रु यह न समझे कि वह आगे बढ़ चुका है और इस्लामी समाज पर वर्चस्व जमा सकता है।