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    सूरए अन्फ़ाल, आयतें 60-64, (कार्यक्रम 292)

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    आइये अब सूरए अन्फ़ाल की आयत संख्या 60 की तिलावत सुनते हैं।وَأَعِدُّوا لَهُمْ مَا اسْتَطَعْتُمْ مِنْ قُوَّةٍ وَمِنْ رِبَاطِ الْخَيْلِ تُرْهِبُونَ بِهِ عَدُوَّ اللَّهِ وَعَدُوَّكُمْ وَآَخَرِينَ مِنْ دُونِهِمْ لَا تَعْلَمُونَهُمُ اللَّهُ يَعْلَمُهُمْ وَمَا تُنْفِقُوا مِنْ شَيْءٍ فِي سَبِيلِ اللَّهِ يُوَفَّ إِلَيْكُمْ وَأَنْتُمْ لَا تُظْلَمُونَ (60)और तुम लोग शत्रुओं से मुक़ाबले के लिए जहां तक हो सके, शक्ति और सवारी के घोड़े तैयार रखो ताकि इसके द्वारा ईश्वर के शत्रुओं, अपने शत्रुओं और इसके अतिरिक्त उन (शत्रुओं) को (भी) भयभीत कर सको। जिन्हें तुम नहीं जानते (किन्तु) ईश्वर जानता है। और ईश्वर के मार्ग में तुम जो कुछ भी ख़र्च करोगे उसका (पूरा पूरा) बदला तुम्हें मिलेगा और तुम पर कोई अत्याचार नहीं होगा। (8:60)पिछले कार्यक्रम में हमने कहा था कि मदीना नगर के यहूदियों ने पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम से की गई संधि को तोड़ दिया था और मक्के के अनेकेश्वरवादियों से मिलकर उन्होंने मुसलमानों के विरुद्ध षड्यंत्र रचा। इसी कारण पैग़म्बरे इस्लाम ने भी घोषणा कर दी कि जब तुम ने संधि को तोड़ दिया है तो हम भी उसका पालन नहीं करेंगे।यह आयत पैग़म्बर और मुसलमानों को संबोधित करते हुए कहती है कि इस्लामी जगत की सामरिक तैयारी ऐसी होनी चाहिए कि शत्रु भयभीत हो जाए और मुसलमानों पर आक्रमण का विचार भी न करे। इसी कारण यह आयत मुसलमानों को आदेश देती है कि वे इस्लाम की रक्षा के लिए जिनता संभव हो सके शक्ति से संसाधन जुटाएं। उन्हें जान लेना चाहिए कि इस्लाम की प्रतिरक्षा को सुदृढ़ बनाने के लिए वे जितना धन ख़र्च करेंगे ईश्वर उतना ही, बल्कि उससे अधिक पारितोषिक उन्हें देगा।इस आयत से हमने सीखा कि हमें शत्रु के आक्रमण की प्रतीक्षा में नहीं रहना चाहिए कि उसके पश्चात स्वयं को सशक्त बनाने का प्रयास करें बल्कि इससे पूर्व ही हमें इस प्रकार तैयार रहना चाहिए कि शत्रु आक्रमण का विचार ही मन में न लाए।रणक्षेत्र में उपस्थिति और युद्ध के लिए आवश्यक धन की आपूर्ति एक धार्मिक कर्तव्य है।आइये अब सूरए अन्फ़ाल की आयत संख्या 61 और 62 की तिलावत सुनते हैं।وَإِنْ جَنَحُوا لِلسَّلْمِ فَاجْنَحْ لَهَا وَتَوَكَّلْ عَلَى اللَّهِ إِنَّهُ هُوَ السَّمِيعُ الْعَلِيمُ (61) وَإِنْ يُرِيدُوا أَنْ يَخْدَعُوكَ فَإِنَّ حَسْبَكَ اللَّهُ هُوَ الَّذِي أَيَّدَكَ بِنَصْرِهِ وَبِالْمُؤْمِنِينَ (62)और यदि वे शांति की ओर झुकाव रखते हों तो आज भी (इसके लिए) झुक जाएं और ईश्वर पर भरोसा रखें कि निसंदेह, वह (सब कुछ) सुनने वाला और जानकार है। (8:61) और यदि वे आपको धोखा देना चाहें तो ईश्वर आप (की रक्षा) के लिए पर्याप्त है। वही तो है जिसने अपनी सहायता और ईमान वालों (के समर्थन) द्वारा आपकी सहायता की। (8:62)पिछली आयत में शत्रु के हर प्रकार के षड्यंत्र के मुक़ाबले में तैयार रहने हेतु मुसलमानों को आदेश देने के पश्चात इस आयत में ईश्वर कहता है कि यह मत सोचो कि हम तुम्हें युद्ध का निमंत्रण दे रहे हैं। यह सब शत्रु को आक्रमण से रोकने के उपाय हैं न कि उस पर आक्रमण करने के, अतः यदि शत्रु आक्रमण के विचार से बाहर निकले किन्तु शांति और संधि में रूचि प्रकट करे तो तुम भी ईश्वर पर भरोसा करते हुए उसे स्वीकार कर लो और शांति के समझौते पर हस्ताक्षर कर दो। तुम इस बात से कदापि भयभीत न हो कि शत्रु तुम्हें धोखा दे सकता है क्योंकि ईश्वर तुम्हारा समर्थक है और वह जहां कहीं ये देखेगा कि शत्रु धोखा देना चाहता है उसे विफल बना देगा।अलबत्ता मनुष्य को भोला नहीं होना चाहिए और बिना समीक्षा के किसी भी शांति समझौते को स्वीकार नहीं कर लेना चाहिए। दूसरी बात यह है कि सीमा से अधिक कड़ाई भी नहीं करनी चाहिए कि धोखे की संभावना के चलते शांति के हर प्रस्ताव को रद्द कर दिया जाए। ईश्वर पर भरोसा करना चाहिए कि जो ईमान वालों का वास्तविक समर्थक है।इन आयतों से हमने सीखा कि प्रतिरक्षा की शक्ति इतनी अधिक होनी चाहिए कि शत्रु मुसलमानों पर आक्रमण के स्थान पर उनसे शांति और संधि का प्रयास करे।इस्लाम युद्ध प्रेमी नहीं है और बल्कि शक्तिशाली होने के बावजूद शांति प्रस्ताव स्वीकार करने की सिफ़ारिश करता है।आइये अब सूरए अन्फ़ाल की आयत संख्या 63 और 64 की तिलावत सुनते हैं।وَأَلَّفَ بَيْنَ قُلُوبِهِمْ لَوْ أَنْفَقْتَ مَا فِي الْأَرْضِ جَمِيعًا مَا أَلَّفْتَ بَيْنَ قُلُوبِهِمْ وَلَكِنَّ اللَّهَ أَلَّفَ بَيْنَهُمْ إِنَّهُ عَزِيزٌ حَكِيمٌ (63) يَا أَيُّهَا النَّبِيُّ حَسْبُكَ اللَّهُ وَمَنِ اتَّبَعَكَ مِنَ الْمُؤْمِنِينَ (64)और ईश्वर ने ईमान वालों के हृदयों में (एक दूसरे के प्रति) प्रेम उत्पन्न कर दिया और यदि जो कुछ धरती में है सब कुछ आप ख़र्च कर देते तो भी इनके हृदयों में ऐसा प्रेम उत्पन्न नहीं कर सकते थे किन्तु ईश्वर ने इनके बीच प्रेम उत्पन्न कर दिया है कि निसंदेह, वह प्रभुत्वशाली और तत्वदर्शी है। (8:63) हे पैग़म्बर! आपके लिए ईश्वर और ईमान वाले अनुयाई पर्याप्त हैं। (8:64)पैग़म्बरे इस्लाम को ईश्वरीय सहायताएं देने के विषय को आगे बढ़ाते हुए यह आयत उन्हें संबोधित करते हुए कहती है कि यह मुसलमान जो आज आप के साथ हैं, इस्लाम से पूर्व इनके बीच इतना द्वेष और इतनी शत्रुता थी कि यदि आप धरती की समस्त संपत्ति ख़र्च कर देते तब भी इनकी शत्रुता को समाप्त करके इनके बीच प्रेम उत्पन्न नहीं कर सकते थे।किन्तु ईश्वर, इस्लाम की छत्रछाया में इनके हृदयों को निकट ले आया और उन्होंने आपसी शत्रुता को छोड़ दिया और सबके सब आपके अनुयाई बन गए। तो हे पैग़म्बर आप शत्रु के धोखे की ओर से चिंतित न हों कि ईश्वर और यह एकजुट ईमान वाले आपके सहायक और समर्थक हैं।इन आयतों से हमने सीख कि ईमान की छाया में ईश्वर सभी दिलों को आपस में जोड़ देता है और द्वेष को उनके बीच से समाप्त कर देता है।प्रेम और एकता ईश्वर की अनुकंपाओं में से और ईमान वालों की निशानियों में से है।इस्लामी समुदाय को इस्लामी समाज के नेता का समर्थक और सहायक होना चाहिए ताकि शत्रु को दोनों के बीच दराड़ का आभास न होने पाए।