islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. सूरए अन्फ़ाल, आयतें 65-69, (कार्यक्रम 293)

    सूरए अन्फ़ाल, आयतें 65-69, (कार्यक्रम 293)

    Rate this post

    आइये अब सूरए अन्फ़ाल की आयत संख्या 65 की तिलावत सुनते हैं।يَا أَيُّهَا النَّبِيُّ حَرِّضِ الْمُؤْمِنِينَ عَلَى الْقِتَالِ إِنْ يَكُنْ مِنْكُمْ عِشْرُونَ صَابِرُونَ يَغْلِبُوا مِائَتَيْنِ وَإِنْ يَكُنْ مِنْكُمْ مِئَةٌ يَغْلِبُوا أَلْفًا مِنَ الَّذِينَ كَفَرُوا بِأَنَّهُمْ قَوْمٌ لَا يَفْقَهُونَ (65)हे पैग़म्बर, आप ईमान वालों को जेहाद के लिए तैयार करें। यदि आप में से बीस लोग भी धैर्यवान हुए तो दो सौ लोगों पर विजयी हो जाएंगे और यदि सौ होंगे तो काफ़िरों के हज़ार लोगों पर विजयी हो जाएंगे क्योंकि वे ऐसे लोग हैं जो (ईमान की शक्ति को) नहीं समझते। (8:65)पिछले कार्यक्रम में हमने बताया था कि ईश्वर ने पैग़म्बर और ईमान वालों को काफ़िरों की ओर से प्रस्तावित शांति संधि को स्वीकार करने का निमंत्रण देते हुए कहा था कि यदि शत्रु ने शांति का प्रस्ताव दिया तो उसे स्वीकार कर लो और उसके परिणामों से न घबराओ कि ईश्वर तुम्हारा समर्थक है।यह आयत पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम को संबोधित करते हुए कहती है कि किन्तु यदि शत्रु शांति न चाहता हो बल्कि अपने षड्यंत्रों द्वारा इस्लामी व्यवस्था का तख़्ता पलटना चाहता हो तो ईमान वालों को उसके साथ जेहाद का निमंत्रण दो और उनसे कह दो कि वे संख्या की कमी से न घबराएं क्योंकि ईश्वर ने वचन दिया है कि यदि तुम धैर्य के साथ डटे रहोगे तो तुम में से प्रत्येक, शत्रु के दस सैनिकों से प्रतिरोध की क्षमता रखता है और यह सब ईमान का फल है जो शत्रु को प्राप्त नहीं है बल्कि वह उसके बारे में समझता ही नहीं है।इस्लाम के आरंभिक काल का इतिहास भी साक्षी है कि जहां कहीं मुसलमानों ने प्रतिरोध किया, वे विजयी हुए चाहे उनकी संख्या शत्रु से कम ही क्यों न रही हो। उदाहरण स्वरूप बद्र के युद्ध में शत्रु की एक हज़ार की सेना के मुक़ाबले में केवल 313 मुसलमान थे, ओहद के युद्ध में तीन हज़ार काफ़िरों के मुक़ाबले में 700 मुसलमान, ख़ंदक के युद्ध में दस हज़ार के मुक़ाबले में तीन हज़ार मुसलमान और मूता के युद्ध में एक लाख शत्रुओं के मुक़ाबले में केवल दस हज़ार मुसलमान।इस आयत से हमने सीखा कि रणक्षेत्र में निर्णायक भूमिका ईमान और प्रतिरोध की होती है, संख्या और शस्त्रों की नहीं।इस्लामी समाज के नेता को शत्रु से जेहाद व संघर्ष के लिए सदैव लोगों को तैयार रखना चाहिए।आइये अब सूरए अन्फ़ाल की आयत संख्या 66 की तिलावत सुनते हैं।الْآَنَ خَفَّفَ اللَّهُ عَنْكُمْ وَعَلِمَ أَنَّ فِيكُمْ ضَعْفًا فَإِنْ يَكُنْ مِنْكُمْ مِئَةٌ صَابِرَةٌ يَغْلِبُوا مِائَتَيْنِ وَإِنْ يَكُنْ مِنْكُمْ أَلْفٌ يَغْلِبُوا أَلْفَيْنِ بِإِذْنِ اللَّهِ وَاللَّهُ مَعَ الصَّابِرِينَ (66)अब ईश्वर ने (जेहाद के मामले में) तुम्हें छूट दी है और उसने देख लिया है कि (अभी) तुम में कमज़ोरी है तो यदि तुम में धैर्य करने वाले सौ लोग हुए तो वे (शत्रु के) दो सौ लोगों पर विजयी हो जाएंगे और यदि हज़ार हुए तो (उनके) दो हज़ार पर ईश्वर की आज्ञा से विजयी हो जाएंगे और ईश्वर धैर्य करने वालों के साथ है। (8:66)पिछली आयत के अनुसार, इस्लाम के आरंभिक काल में शत्रु की सेना की तुलना में दस प्रतिशत लोगों की उपस्थिति से, जेहाद का आदेश व्यवहारिक हो जाता था और इस्लामी सेना का हर योद्धा शत्रु के दस-दस सैनिकों के मुक़ाबले में डट जाता था। किन्तु आगे चलकर जब मुसलमान ईमान और भावना की दृष्टि से कमज़ोर हो गए थे तो ईश्वर ने उन्हें छूट दी और प्रत्येक व्यक्ति पर शत्रु के दो सैनिकों से लड़ने का दायित्व रखा। यह बात शत्रु पर विजय में ईमान तथा प्रतिरोध की भूमिका को स्पष्ट करती है कि जब इस्लामी समुदाय का ईमान कमज़ोर हो जाए तो उसकी प्रतिरोध क्षमता में 80 प्रतिशत तक की कमी हो जाती है।इस आयत से हमने सीखा कि समाज में कभी कभी लोगों की क्षमता तथा तैयारी और परिस्थितियों में परिवर्तन के कारण, क़ानून बदलना चाहिए और लोगों के प्रति अधिकारियों में लचक होनी चाहिए।पराजय का वास्तविक कारक, बाहर से नहीं भीतर होता है, ईमान और धैर्य जितना कमज़ोर होगा, शत्रु के विजयी होने की संभावना उतनी ही बढ़ती जाएगी।आइये अब सूरए अन्फ़ाल की आयत संख्या 67 की तिलावत सुनते हैं।مَا كَانَ لِنَبِيٍّ أَنْ يَكُونَ لَهُ أَسْرَى حَتَّى يُثْخِنَ فِي الْأَرْضِ تُرِيدُونَ عَرَضَ الدُّنْيَا وَاللَّهُ يُرِيدُ الْآَخِرَةَ وَاللَّهُ عَزِيزٌ حَكِيمٌ (67)किसी भी पैग़म्बर को यह अधिकार नहीं है कि वह (रणक्षेत्र में शत्रुओं को) बंदी बनाए, जब तक (उस) धरती पर पूर्ण रूप से नियंत्रण न कर ले। (हे ईमान लाने वालों) तुम लोग केवल संसार का नश्वर माल चाहते हो जबकि ईश्वर तुम्हारे लिए परलोक चाहता है और ईश्वर अत्यंत शक्तिशाली व तत्वदर्शी है। (8:67)पिछली आयत में शत्रु से मुक़ाबले की शैली का वर्णन करने के पश्चात इस आयत में कहा गया है कि युद्ध के समय केवल ईश्वर तथा कुफ़्र एवं अनेकेश्वरवाद पर उसके धर्म की विजय को दृष्टिगत रखो तथा शत्रु द्वारा छोड़े गए धन को एकत्रित करने और उन्हें बंदी बनाने की चेष्टा में न रहो कि यह सब संसार का मूल्यहीन माल है और ईश्वर ने प्रलय में जो चीज़ तुम्हें देने का वचन दिया है, इसकी उससे तुलना नहीं की जा सकती अतः जब तक शत्रु पर इस्लामी सेना की संपूर्ण विजय के चिन्ह दिखाई न दें किसी को भी उन्हें बंदी बनाने का अधिकार नहीं है बल्कि सबको युद्ध करना चाहिए।इस आयत से हमने सीखा कि ईमान वालों के मायाजाल में फंसने के ख़तरों की ओर से, युद्ध के संकटमयी समय तक में निश्चिंत नहीं रहना चाहिए बल्कि उसका उपाय खोजना चाहिए।इस्लाम में जेहाद का लक्ष्य, धार्मिक कर्तव्यों का पालन तथा परलोक के हितों की प्राप्ति है न कि भौतिक हितों के लिए शत्रुओं को बंदी बनाना या उनके द्वारा छोड़े गए धन को प्राप्त करना।आइये अब सूरए अन्फ़ाल की आयत संख्या 68 और 69 की तिलावत सुनते हैं।لَوْلَا كِتَابٌ مِنَ اللَّهِ سَبَقَ لَمَسَّكُمْ فِيمَا أَخَذْتُمْ عَذَابٌ عَظِيمٌ (68) فَكُلُوا مِمَّا غَنِمْتُمْ حَلَالًا طَيِّبًا وَاتَّقُوا اللَّهَ إِنَّ اللَّهَ غَفُورٌ رَحِيمٌ (69)यदि ईश्वर की ओर से पहले से निर्णय न हो चुका होता तो तुमने ग़लत अवसर पर शत्रु को जो बंदी बनाया है कि उसके कारण एक कड़ा दंड तुम्हें अपनी लपेट में ले लेता। (8:68) तो जो कुछ धन व माल तुमने शत्रु से प्राप्त किया है उसे खाओ कि वह हलाल और वैध है और ईश्वर से डरते रहो कि निसंदेह, ईश्वर क्षमाशील और दयावान है। (8:69)ये आयतें पुनः कुफ़्र के साथ इस्लाम के जेहाद के मुख्य लक्ष्य की ओर ध्यान दिए जाने की आवश्यकता की ओर संकेत करते हुए कहती है। यदि ईश्वर की परंपरा यह न होती कि वह आदेश के वर्णन से पूर्व किसी को दंडित नहीं करता तो वह, युद्ध के दौरान शत्रु को बंदी बनाने के कारण तुम्हें कड़ा दंड देता है।इसके अतिरिक्त ईश्वर ने यह निर्णय कर लिया था कि बद्र के युद्ध में तुम्हीं विजयी होगे और यदि यह ईश्वरीय निर्णय न होता तो यह काम तुम्हें भारी क्षति पहुंचाता और सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि पैग़म्बर तुम्हारे बीच थे और उनके सम्मान में ईश्वर ने तुम्हें दंडित नहीं किया।आयत आगे चलकर कहती है कि जो माल तथा धन, तुमने युद्ध से प्राप्त किया है वह तुम्हारे लिए वैध और हलाल है किन्तु शर्त यह है कि उसका पांचवां भाग इस्लामी शासन को प्रदान करो कि यह उसका अधिकार है और प्रत्येक दशा में ईश्वर से डरते रहो कि इस स्थिति में ईश्वर तुम्हारे पापों को क्षमा कर देगा।इन आयतों से हमने सीखा कि युद्ध के दौरान शत्रु को बंदी बनाने से संसार में पराजय और प्रलय में दंड का सामना करना पडेगा। मायामोह के आधार पर जेहाद के लिए न जाओ कि स्वर्ग के स्थान पर नरक में चले जाओगे।ईश्वरीय कृपा का एक उदाहरण उनके पापों को क्षमा करना है या तो हम पाप ही न करें, और यदि हमसे भूल हो गई तो तौबा द्वारा ईश्वर की दया को आकृष्ट करें।