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    सूरए अन्फ़ाल, आयतें 70-72, (कार्यक्रम 294)

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    आइये पहले सूरए अन्फ़ाल की आयत संख्या 70 की तिलावत सुनते हैं।يَا أَيُّهَا النَّبِيُّ قُلْ لِمَنْ فِي أَيْدِيكُمْ مِنَ الْأَسْرَى إِنْ يَعْلَمِ اللَّهُ فِي قُلُوبِكُمْ خَيْرًا يُؤْتِكُمْ خَيْرًا مِمَّا أُخِذَ مِنْكُمْ وَيَغْفِرْ لَكُمْ وَاللَّهُ غَفُورٌ رَحِيمٌ (70) हे पैग़म्बर! जो युद्ध के बंदी आपके नियंत्रण में हैं उनसे कह दीजिए कि यदि ईश्वर तुम्हारे हृदयों में भलाई देखेगा तो जो कुछ तुमसे लिया गया है उससे बेहतर तुम्हें प्रदान करेगा और तुम्हें क्षमा कर देगा और ईश्वर क्षमाशील तथा दयावन है। (8:70)बद्र के युद्ध में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही वसल्लम के चाचा अब्बास सहित मक्के के कई प्रतिष्ठित लोग मुसलमानों के हाथों बंदी बनाए गए। कुछ लोगों ने कहा कि उन्हें स्वतंत्र करने के बदले में कोई धनराशि न ली जाए किन्तु पैग़म्बर ने इसे स्वीकार नहीं किया और कहा कि उन्हें भी अन्य बंदियों की भांति धनराशि देकर स्वयं को स्वतंत्र कराना होगा।यह आयत कहती है कि तुम्हारे हाथों बंदी बनने वाले जो लोग धनराशि देकर स्वतंत्र हुए हैं उनसे कह दीजिए कि यदि तुम लोग ईमान ले आओ और मुसलमान बन जाओ तो ईश्वर की दया का द्वार तुम्हारे लिए खुल जाएगा और तुमने जो धनराशि प्रदान की है तुम्हें उससे अधिक मूल्यवान संपत्ति प्राप्त हो जाएगी कि जो ईश्वरीय दया व क्षमा है।इस आयत से हमने सीखा कि इस्लामी जेहाद में युद्ध बंदियों के साथ ऐसा व्यवहार किया जाना चाहिए कि उनके मार्गदर्शन की भूमि समतल हो जाए।ग़लती करने वालों की वापसी का मार्ग सदैव खुला रखना चाहिए, यहां तक कि ईश्वरीय पैग़म्बर के विरुद्ध युद्ध में सम्मलिति भी, तौबा व प्रायश्चित तथा ईश्वरीय क्षमा के मार्ग में बाधा नहीं है।आइये सूरए अन्फ़ाल की आयत संख्या 71 की तिलावत सुनते हैं।وَإِنْ يُرِيدُوا خِيَانَتَكَ فَقَدْ خَانُوا اللَّهَ مِنْ قَبْلُ فَأَمْكَنَ مِنْهُمْ وَاللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمٌ (71)और यदि युद्धबंदी आपके साथ विश्वासघात करना चाहें तो इससे पूर्व वे ईश्वर के साथ विश्वासघात कर चुके हैं किन्तु ईश्वर ने (आपको) उन पर वर्चस्व प्रदान कर दिया और ईश्वर अत्यंत जानकार और तत्वदर्शी है। (8:71)पिछली आयत में युद्धबंदियों को स्वतंत्र करने के संबंध में संकेत करने के पश्चात यह आयत कहती है कि शत्रु के विश्वासघात के भय से उनको युद्धबंदियों के साथ दुर्व्यवहार नहीं करना चाहिए बल्कि इसके विपरीत उनके साथ ऐसा व्यवहार करना चाहिए कि उनके इस्लाम स्वीकार करने का मार्ग प्रशस्त हो जाए।यदि शत्रु के युद्धबंदियों के साथ अच्छा व्यवहार किया जाए तो वे न केवल हमसे युद्ध नहीं करेंगे बल्कि हमारे सहायक बन जाएंगे। केवल विश्वासघात की आशंका से, अपने उत्तरदायित्व को नहीं छोड़ा जा सकता।इस आयत से हमने सीखा कि यदि हम अपने कर्तव्यों का पालन और दायित्वों का निर्वाह करें तो ईश्वर हमें शत्रुओं के षड्यंत्रों से सुरक्षित रखेगा।शत्रु से विश्वासघात के अतिरिक्त किसी अन्य बात की अपेक्षा नहीं होती किन्तु ईमान वाला व्यक्ति विश्वासघात के बजाए उसके मार्गदर्शन का प्रयास करता है और इसके लिए हर अवसर से लाभ उठाता है।आइये अब सूरए अन्फ़ाल की आयत संख्या 72 की तिलावत सुनते हैं।إِنَّ الَّذِينَ آَمَنُوا وَهَاجَرُوا وَجَاهَدُوا بِأَمْوَالِهِمْ وَأَنْفُسِهِمْ فِي سَبِيلِ اللَّهِ وَالَّذِينَ آَوَوْا وَنَصَرُوا أُولَئِكَ بَعْضُهُمْ أَوْلِيَاءُ بَعْضٍ وَالَّذِينَ آَمَنُوا وَلَمْ يُهَاجِرُوا مَا لَكُمْ مِنْ وَلَايَتِهِمْ مِنْ شَيْءٍ حَتَّى يُهَاجِرُوا وَإِنِ اسْتَنْصَرُوكُمْ فِي الدِّينِ فَعَلَيْكُمُ النَّصْرُ إِلَّا عَلَى قَوْمٍ بَيْنَكُمْ وَبَيْنَهُمْ مِيثَاقٌ وَاللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ بَصِيرٌ (72)निश्चित रूप से जो लोग ईमान लाए और उन्होंने ईश्वर के मार्ग में पलायन किया तथा अपनी जान व माल के साथ जेहाद किया और जिन्होंने (पलायन व जेहाद करने वालों को) शरण दी और (उनकी) सहायता की, वे सब आपस में एक दूसरे के मित्र व अभिभावक हैं। और जो लोग ईमान (तो) लाए किन्तु पलायन नहीं किया उनसे मित्रता का आपको कोई अधिकार नहीं है जब तक कि वे पलायन नहीं करते किन्तु यदि वे धर्म के संबंध में तुमसे सहायता मांगे तो अवश्य उनकी सहायता करो, सिवाय उस जाति के मुक़ाबले में जिससे तुम्हारी संधि हो चुकी हो (और जान लो कि) ईश्वर तुम्हारे कर्मों को भलीभांति देखने वाला है। (8:72)मक्के के अनेकेश्वरवादियो के षड्यंत्रों में अत्याधिक वृद्धि हो जाने के पश्चात पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम मदीना नगर पलायन कर गए और उनके पश्चात अनेक मुसलमान मक्के में अपना घर बार छोड़कर मदीना चले आए। इस्लामी इतिहास में इन लोगों को मुहाजिर या पलायनकर्ता कहा जाता है। मदीना नगर में भी जो लोग पैग़म्बरे इस्लाम पर ईमान लाए उन्होंने पूरी क्षमता के साथ पलायनकर्ताओं के रहने सहने की व्यवस्था की और उनका भरपूर समर्थन किया, ऐसे लोगों को अन्सार या सहायक कहा जाता है।पैग़म्बरे इस्लाम ने इन दो गुटों के संबंधों को सुदृढ़ बनाने के लिए उनके बीच भाईचारे की संधि स्थापित की और उन्हें किसी भी प्रकार के मतभेद से रोका। यह आयत मुहाजिरों और अन्सार के बीच मित्रता व समर्थन का कारण बनने वाली इस संधि की ओर संकेत करते हुए कहती है। जो लोग पलायन करने पर तैयार नहीं हुए और उन्होंने अपने घर बार की रक्षा को धर्म की रक्षा पर प्राथमिकता दी वे, भाईचारे की इस संधि के पात्र नहीं हैं जब तक वे पलायन न कर लें।आग चलकर आयत कहती है, अलबत्ता उनमें से कुछ पर ऐसा दबाव है कि वे पलायन नहीं कर सकते। यदि इस प्रकार के लोग तुमसे सहायता चाहें तो तुम्हें उनकी सहायता करनी चाहिए सिवाए इसके कि वे लोग ऐसी जाति के बीच रहते हों जिससे तुमने शत्रुता न करने की संधि कर रखी हो कि ऐसी स्थिति में तुम्हें संधि पर कटिबद्ध रहना चाहिए।इस आयत से हमने सीखा कि कुफ़्र, अनेकेश्वरवाद तथा पाप के वातावरण से पलायन, अपने धर्म की रक्षा और धार्मिक आदेशों के पालन के लिए एक अनिवार्य काम है।काफ़िरों तक से की गई संधि पर कटिबद्धता आवश्यक है और जब तक वे उस पर कटिबद्ध हैं उसे तोड़ना वैध नहीं है।