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    सूरए अन्फ़ाल, आयतें 73-75, (कार्यक्रम 295)

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    आइये पहले सूरए अन्फ़ाल की आयत संख्या 73 की तिलावत सुनते हैं।وَالَّذِينَ كَفَرُوا بَعْضُهُمْ أَوْلِيَاءُ بَعْضٍ إِلَّا تَفْعَلُوهُ تَكُنْ فِتْنَةٌ فِي الْأَرْضِ وَفَسَادٌ كَبِيرٌ (73)और जिन लोगों ने कुफ़्र अपनाया वे एक दूसरे के मित्र व समर्थक हैं और यदि तुम (काफ़िरों के संबंध में ईश्वर के आदेशों का) पालन न करो तो धरती में उपद्रव और बड़ी बुराई फैल जाएगी। (8:73)पिछले कार्यक्रमों में शत्रुओं से किस प्रकार के संबंध रखे जाएं, इस विषय में ईश्वरीय आदेशों का वर्णन किया गया था। यह आयत कहती है कि यदि इन आदेशों का पालन न किया तो बहुत बड़ी रक्तिरंजित झड़पें होंगी क्योंकि सारे ही काफ़िर एकजुट हैं और एक दूसरे का समर्थन करते हैं।पिछली आयतों में ईश्वर ने मुसलमानों से कहा था कि वे काफ़िरों से संधि और समझौता करने के स्थान पर एक दूसरे से, सहायता व समर्थन का समझौता करें और ख़तरों के अवसर पर एक दूसरे की सहायता करें। किन्तु यदि कभी वे संधि करने पर विवश हो जाएं तो उन्हें उस पर कटिबद्ध रहना चाहिए और किसी गुट के समर्थन के कारण, उन्हें मुसलमानों पर शत्रु के व्यापक आक्रमण का कारण नहीं बनना चाहिए क्योंकि ऐसी स्थिति में बहुत बड़ा उपद्रव हो सकता है कि जिसके परिणाम स्वरूप मुसलमानों का जनसंहार हो सकता है।इस आयत से हमने सीखा कि कुफ़्र का मोर्चा अपने सभी मतभेदों के बावजूद, इस्लाम व ईमान के मुक़ाबले में एकजुट है और यदि मुसलमान एकजुट न हुए तो वे बड़ी कठिनाइयों में फंस सकते हैं।शत्रु के हाथ में कोई बहाना नहीं देना चाहिए कि वह इस्लामी समाज के विरुद्ध युद्ध छेड़ दे। वे बहाना खोजते रहते हैं ताकि युद्ध भड़का सकें।आइये अब सूरए अन्फ़ाल की आयत संख्या 74 की तिलावत सुनते हैं।وَالَّذِينَ آَمَنُوا وَهَاجَرُوا وَجَاهَدُوا فِي سَبِيلِ اللَّهِ وَالَّذِينَ آَوَوْا وَنَصَرُوا أُولَئِكَ هُمُ الْمُؤْمِنُونَ حَقًّا لَهُمْ مَغْفِرَةٌ وَرِزْقٌ كَرِيمٌ (74)और जो लोग ईमान लाए और पलायन किया और ईश्वर के मार्ग में जेहाद किया और जिन लोगों ने (ईमान वाले पलायनकर्ताओं को) शरण दी और (उनकी) सहायता की, निश्चित रूप से ऐसे ही लोग सच्चे और वास्तविक ईमान वाले हैं। इनके लिए क्षमा और सम्मानित आजीविका है। (8:74)यह आयत एक बार पुनः वास्तविक ईमान के मानदंडों का उल्लेख करते हुए कहती है कि ईमान वाला व्यक्ति वो है कि जो आवश्यकता पड़ने पर ईश्वर के मार्ग में पलायन और जेहाद के लिए तैयार हो या कम से कम पलायनकर्ताओं को शरण दे तथा जेहाद करने वालों की सहायता करे।अलबत्ता इस्लामी संस्कृति में पलायन या जेहाद केवल शत्रु के साथ युद्ध से विशेष नहीं है। ज्ञान अर्जित करने और उसे अन्य लोगों तक पहुंचाने के लिए पलायन करने की इस्लाम ने सिफ़ारिश की है।इसी प्रकार वंचितों की सेवा के लिए पलायन करना स्वयं एक बहुत बड़ा जेहाद माना जाता है और ये सब ईमान की निशानियां हैं।स्पष्ट सी बात है कि समस्त इस्लामी समुदाय के पास पलायन की क्षमता और संभावना नहीं है किन्तु इसके बावजूद कोई भी अपने दायित्व को नहीं छोड़ सकता। जेहाद एवं पलायन करने वालों का आर्थिक समर्थन सभी का कर्तव्य है। सभी लोगों का कर्तव्य है कि वे इस्लामी समाज की प्रगति, स्थायित्व और सत्ता का मार्ग प्रशस्त करने के लिए भरपूर प्रयास करें। ऐसी स्थिति में मुस्लिम समुदाय ईश्वरीय दया का पात्र बनेगा और ईश्वर उनकी ग़लतियों को क्षमा करके उन्हें असीमित आजीविका प्रदान करेगा।इस आयत से हमने सीखा कि कोई भी भला कर्म, चाहे कितना ही बड़ा एवं कठिन हो, उसी समय मूल्यवान होता है जब वह अपने नाम और दिखावे के लिए नहीं बल्कि ईश्वर के मार्ग में किया गया हो। ईश्वरीय भावना ही कार्यों को अमर बनाती है।ईमान वाले भी पाप और ग़लतियों से सुरक्षित नहीं हैं और उन्हें भी सदैव ही ईश्वरीय क्षमा व दया की आवश्यकता होती है।आइये अब सूरए अन्फ़ाल की आयत संख्या 75 की तिलावत सुनते हैं जो इस सूरए की अंतिम आयत है।وَالَّذِينَ آَمَنُوا مِنْ بَعْدُ وَهَاجَرُوا وَجَاهَدُوا مَعَكُمْ فَأُولَئِكَ مِنْكُمْ وَأُولُو الْأَرْحَامِ بَعْضُهُمْ أَوْلَى بِبَعْضٍ فِي كِتَابِ اللَّهِ إِنَّ اللَّهَ بِكُلِّ شَيْءٍ عَلِيمٌ (75)और जो लोग बाद में ईमान लाए और उन्होंने पलायन किया तथा तुम्हारे साथ जेहाद किया, तो वे भी तुम्हीं में से हैं और ईश्वरीय क़ानून में नातेदारों एवं परिजनों को आपस में एक दूसरे पर वरीयता प्राप्त है। निसंदेह ईश्वर हर वस्तु के बारे में जानकार है। (8:75)पिछली आयतों में पलायन, जेहाद तथा पलायनकर्ताओं की सहायता के महत्त्व का उल्लेख करने के पश्चात इस आयत में कहा गया है कि यह मत सोचो कि ये मान्यताएं केवल इस्लाम के आरंभिक काल के मुसलमानों के लिए हैं जो मक्के के अनेकेश्वरवादियों के साथ जेहाद कर रहे थे। बल्कि जो कोई इस्लाम स्वीकार करे और उसमें ये मान्यताएं हों तो वह इस धार्मिक रिश्ते में शामिल हो जाता है।अलबत्ता इस्लाम स्वीकार करने में पहल करना एक मान्यता है और इस्लाम के आरंभिक काल में जेहाद करने वालों का विशेष स्थान है क्योंकि उन्होंने उस समय पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम की सहायता की जब उनका कोई मित्र व सहायक नहीं था, उनके सत्ता में आने की कोई आशा नहीं थी किन्तु ये गुण किसी विशेष व्यक्ति या लोगों तक सीमित नहीं है और इस्लामी समाज एक बंद एवं सीमित समाज नहीं है बल्कि जो कोई इस्लाम स्वीकार करे वह अन्य मुसलमानों की भांति सम्मान व आदर का पात्र बन जाता है।आगे चलकर आयत कहती है कि यद्यपि सभी मुसलमानों तथा ईमान वालों विशेषकर पलायन व जेहाद करने वालों को एक सार्वजनिक प्राथमिकता प्राप्त है किन्तु मुस्लिम परिजनों को आपस में अधिक प्राथमिकता प्राप्त है। इसी कारण वे एक दूसरे की विरासत प्राप्त करते हैं किन्तु जो परिजन नहीं होते वे ऐसा नहीं कर सकते।इस आयत से हमने सीखा कि इस्लामी समाज के द्वार सभी के लिए खुले हुए हैं और अतीत एवं भविष्य के सभी ईमान वालों के लिए एक ही क़ानून है।इस्लाम की सामाजिक व्यवस्था में पारिवारिक संबंधों को सुरक्षित रखने पर बल दिया गया है।