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    सूरए अम्बिया, आयतें 1-6, (कार्यक्रम 568)

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    आइये पहले सूरए अम्बिया की पहली आयत की तिलावत सुनें।

    بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ اقْتَرَبَ لِلنَّاسِ حِسَابُهُمْ وَهُمْ فِي غَفْلَةٍ مُعْرِضُونَ (1)

    अल्लाह के नाम से जो अत्यंत कृपाशील और दयावान है। लोगों का हिसाब उनके निकट आ गया और वे हैं कि निश्चेतना में (डूबे हुए) मुंह मोड़े चले जा रहे हैं।(21:1)

    सूरए अम्बिया, जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट है, ईश्वरीय पैग़म्बरों के बारे में है। इस सूरे में ईश्वर के सोलह पैग़म्बरों के नामों और उनके जीवन की कुछ घटनाओं का वर्णन किया गया है। इस सूरे की पहली आयत में लोगों को चेतावनी दी गई है कि प्रलय सामने है और जो कुछ वे करते हैं उसका हिसाब लिया जाएगा।

    आगे चलकर आयत कहती है कि साधारणतः लोग अपने सांसारिक जीवन में व्यस्त हैं और प्रलय की ओर से निश्चेत हैं बल्कि यदि कोई उन्हें प्रलय की याद भी दिलाता है तो वे मुंह मोड़ लेते हैं तथा उसकी बात सुनने को तैयार नहीं होते यहां तक कि कभी कभी तो वे प्रलय के बारे में आर्थिक हिसाब किताब करने लगते हैं और कहते हैं कि बुद्धिमान व्यक्ति उधार के चक्कर में नक़द को हाथ से जाने नहीं देता।

    इस आयत से हमने सीखा कि प्रलय में मनुष्य के कर्मों का हिसाब-किताब इतना दूर नहीं है कि मनुष्य उसकी ओर से निश्चेत रहे और जो चाहे करता रहे।

    प्रलय का न्यायालय और उसमें हिसाब किताब लोगों के पास अवश्य ही आएगा चाहे वे उसकी जितनी भी अनदेखी करें।

    आइये अब सूरए अम्बिया की दूसरी और तीसरी आयतों की तिलावत सुनते हैं।

    مَا يَأْتِيهِمْ مِنْ ذِكْرٍ مِنْ رَبِّهِمْ مُحْدَثٍ إِلَّا اسْتَمَعُوهُ وَهُمْ يَلْعَبُونَ (2) لَاهِيَةً قُلُوبُهُمْ وَأَسَرُّوا النَّجْوَى الَّذِينَ ظَلَمُوا هَلْ هَذَا إِلَّا بَشَرٌ مِثْلُكُمْ أَفَتَأْتُونَ السِّحْرَ وَأَنْتُمْ تُبْصِرُونَ (3)

    उनके पास उनके पालनहार की ओर से जो भी उपदेश आया उसे उन्होंने हँसी-खेल करते हुए ही सुना। (21:2) उनके हृदय (सत्य से निश्चेत और सांसारिक मामलों में) खोए हुए होते है। इन्होंने (प्रलय का इन्कार करके अपने आप पर) अत्याचार किया और ये चुपके-चुपके कानाफूसी करते हैं कि क्या यह तुम जैसा ही एक मनुष्य नहीं है? तो क्या तुम जानते-बूझते जादू में फँस जाओगे? (21:3)

    ये आयतें लोगों द्वारा प्रलय की अनदेखी के चिन्हों की ओर संकेत करते हुए कहती हैं कि जब भी ईश्वर की ओर से क़ुरआने मजीद की कोई आयत आती है और पैग़म्बर उसे लोगों के लिए पढ़ते हैं तो वे उसे सुनने के बावजूद अनसुनी कर देते हैं और उसे हंसी खेल में उड़ा देते हैं।

    तीसरी आयत ईश्वरीय कथन के संबंध में लोगों के इस प्रकार के व्यवहार का कारण उनके हृदयों को बताती है जो सांसारिक मामलों में खोए हुए तथा ईश्वर की याद से निश्चेत हैं। इस प्रकार के लोग न केवल यह कि सत्य को स्वीकार नहीं करते बल्कि गुप्त रूप से इस बात का भी प्रयास करते हैं कि अपनी धूर्ततापूर्ण बातों से अन्य लोगों को भी पैग़म्बर के निमंत्रण को स्वीकार करने से रोक दें। अतः वे पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को एक ऐसा जादूगर बताते हैं जो अपनी बातों के जादू अर्थात क़ुरआने मजीद की आयतों से लोगों को अपनी ओर आकृष्ट कर लेता है।

    इन आयतों से हमने सीखा कि क़ुरआने मजीद उपदेश है और हर बार मनुष्य को एक नया उपदेश देता है ताकि वह निश्चेतना में ग्रस्त न हो।

    लोगों के बीच पैग़म्बरों का जीवन इतना सादा था कि विरोधी उनके जीवन की इसी सादगी को बहाना बना कर उन्हें अन्य लोगों की भांति ही एक साधारण व्यक्ति बताते थे जबकि वे मनुष्य तो थे किंतु उनके पास ईश्वर का विशेष संदेश वहि आता था जो अन्य लोगों के पास नहीं आता।

    काफ़िर, वास्तविकताओं को छिपा कर स्वयं पर भी और अन्य लोगों पर भी अत्याचार करते हैं।

    आइये अब सूरए अम्बिया की चौथी और पांचवीं आयतों की तिलावत सुनते हैं।

    قَالَ رَبِّي يَعْلَمُ الْقَوْلَ فِي السَّمَاءِ وَالْأَرْضِ وَهُوَ السَّمِيعُ الْعَلِيمُ (4) بَلْ قَالُوا أَضْغَاثُ أَحْلَامٍ بَلِ افْتَرَاهُ بَلْ هُوَ شَاعِرٌ فَلْيَأْتِنَا بِآَيَةٍ كَمَا أُرْسِلَ الْأَوَّلُونَ (5)

    (पैग़म्बर ने उनसे) कहा, मेरा पालनहार आकाश और धरती में (की जाने वाली) हर बात को जानता है और वह सब कुछ सुनने (और) जानने वाला है। (21:4) (अनेकेश्वरवादियों ने) कहा, (मुहम्मद जो कुछ लेकर आए हैं वह वहि) नहीं बल्कि बिखरे हुए स्वप्न हैं बल्कि इन्होंने इसे स्वयं ही गढ़ लिया है, बल्कि ये एक कवि हैं। (यदि ये सच बोलते हैं) तो इन्हें हमारे पास कोई निशानी लानी चाहिए जैसे कि पहले के पैग़म्बर भेजे गए थे। (21:5)

    विरोधियों द्वारा गुप्त रूप से षड्यंत्र तैयार किए जाने पर ये आयतें पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की ज़बान से कहती हैं कि यह न सोचो कि तुम्हारी बातें और कार्य ईश्वर की दृष्टि से छिपे हुए हैं। जो कुछ आकाशों और धरती में होता है वह उससे पूर्ण रूप से अवगत है अतः षड्यंत्र रचना छोड़ दो।

    किंतु विरोधी इससे पाठ सीखने के स्थान पर अधिक व्यापक ढंग से दुष्प्रचार करते हैं। वे पैग़म्बर को एक ऐसा कवि बताते हैं जो अन्य कवियों की भांति अपनी कल्पना शक्ति के आधार पर बात करता है और अपनी बातों को ईश्वर से संबंधित कर देता है जबकि उसे अन्य पैग़म्बरों की भांति चमत्कार प्रस्तुत करने चाहिए। अगली आयतों में ईश्वर उनके इन बहानों और शंकाओं का उत्तर देता है।

    इन आयतों से हमने सीखा कि धार्मिक व आध्यात्मिक हस्तियों के विरुद्ध प्रचारिक आक्रमण करना व निरंतर आरोप लगाना, धर्म के शत्रुओं की एक मुख्य शैली है।

    शत्रुओं द्वारा लगाए जाने वाले आरोपों में विरोधाभास होता है, उदाहरण स्वरूप वे पैग़म्बर को कवि तथा क़ुरआन को उनकी रचना बताते हैं जबकि क़ुरआन और कविता में कोई समानता ही नहीं है।

    आइये अब सूरए अम्बिया की छठी आयत की तिलावत सुनते हैं।

    مَا آَمَنَتْ قَبْلَهُمْ مِنْ قَرْيَةٍ أَهْلَكْنَاهَا أَفَهُمْ يُؤْمِنُونَ (6)

    इनसे पहले वाली कोई भी बस्ती जिसे हमने विनष्ट किया, (अपने दृष्टिगत चमत्कार देखने के बावजूद) ईमान न लाई। तो क्या ये ईमान लाएँगे? (21:6)

    यह आयत ईश्वर की एक परंपरा की ओर संकेत करते हुए कहती है कि जब भी लोग, पैग़म्बर से किसी चमत्कार की मांग करें और पैग़म्बर वह चमत्कार प्रस्तुत कर दें तो यदि वे लोग फिर भी ईमान न लाएं तो ईश्वरीय कोप उन्हें आ लेगा और उस पूरी जाति को तबाह कर देगा।

    क्या मक्के के अनेकेश्वरवादी भी पिछली जातियों की भांति नहीं हैं और अपने दृष्टिगत चमत्कार को देख कर ईमान ले आएंगे या फिर कोई अन्य बहाना बना कर किसी अन्य चमत्कार की मांग करेंगे? ईश्वर सूचना देता है कि ये लोग भी पिछली जातियों की भांति ही हैं और चमत्कार देख कर ईमान नहीं लाएंगे बल्कि अपनी शत्रुता और हठधर्मी पर बाक़ी रहेंगे।

    इस आयत से हमने सीखा कि बहानेबाज़ी और हठधर्मी, पूरे इतिहास में सभी काफ़िरों और अनेकेश्वरवादियों की शैली रही है। स्वार्थ और घमंड उनके द्वारा सत्य को स्वीकार करने में बाधा बनता है।

    काफ़िरों के वादे झूठे होते हैं। यदि उनकी मांगों को पूरा भी कर दिया जाए तब भी वे ईमान नहीं लाएंगे।