islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. सूरए अम्बिया, आयतें 100-104, (कार्यक्रम 588)

    सूरए अम्बिया, आयतें 100-104, (कार्यक्रम 588)

    सूरए अम्बिया, आयतें 100-104, (कार्यक्रम 588)
    Rate this post

     

    आइये पहले सूरए अम्बिया की 100वीं आयत की तिलावत सुनें।

    لَهُمْ فِيهَا زَفِيرٌ وَهُمْ فِيهَا لَا يَسْمَعُونَ (100)

    नरक में अनेकेश्वरवादी हृदय विदारक चीत्कार करेंगे और कुछ भी नहीं सुन पाएंगे। (21:100)

    इससे पहले की आयतों में प्रलय में अनेकेश्वरवादियों की स्थिति की ओर संकेत किया गया था। यह आयत कहती है कि नरकवासियों की पीड़ा इतनी अधिक होगी कि वे सदैव अपनी मुक्ति के लिए चिल्लाते और सहायता की गुहार लगाते रहेंगे किंतु उन्हें कोई उत्तर नहीं मिलेगा और उनके बचने की कोई आशा नहीं होगी।

    यद्यपि सभी नरकवासी चीख़-पुकार मचा रहे होंगे किंतु उन्हें मिलने वाला दंड इतना व्यापक होगा कि इस चीख़-पुकार से उनकी पीड़ा में कोई कमी नहीं होगी क्योंकि वे एक दूसरे की आवाज़ नहीं सुनेंगे कि उन्हें पता चले कि यह सार्वजनिक दंड है और इसके परिणाम स्वरूप दंड सहना उनके लिए कुछ सरल हो जाए।

    इस आयत से हमने सीखा कि नरक में चीत्कार का कोई उत्तर नहीं दिया जाएगा और यह स्वयं अपने आपमें एक पीड़ादायक दंड है कि मनुष्य की चीत्कार को न सुना जाए।

    आइये अब सूरए अम्बिया की आयत क्रमांक 101 और 102 की तिलावत सुनें।

    إِنَّ الَّذِينَ سَبَقَتْ لَهُمْ مِنَّا الْحُسْنَى أُولَئِكَ عَنْهَا مُبْعَدُونَ (101) لَا يَسْمَعُونَ حَسِيسَهَا وَهُمْ فِي مَا اشْتَهَتْ أَنْفُسُهُمْ خَالِدُونَ (102)

    निश्चित रूप से जिन लोगों को पहले ही हमारी ओर से (अच्छे कर्मों पर) अच्छे (प्रतिफल) का वादा किया जा चुका है वे नरक से दूर रखे जाएंगे। (21:101) वे उसकी (लपटों की) आवाज़ भी नहीं सुनेंगे और अपनी मनचाही चीज़ों के मध्य सदैव रहेंगे। (21:102)

    नरक वालों की स्थिति के वर्णन के पश्चात इन आयतों में स्वर्ग के लोगों की स्थिति की ओर संकेत किया गया है। इन आयतों में ईश्वर कहता है कि हमने संसार में ईमान वालों को जो भी वचन दिया था, उसे पूरा करेंगे तथा उन्हें नरक से सुरक्षित रखेंगे। वे लोग न केवल यह कि नरक में नहीं जाएंगे बल्कि नरक की आग की लपटों की आवाज़ भी नहीं सुनेंगे और उन्हें किसी प्रकार के ख़तरे का आभास नहीं होगा।

    ईमान वाले लोग, स्वर्ग की सभी नेमतों व अनुकंपाओं से संपूर्ण शांति व सुरक्षा के साथ लाभान्वित होंगे और उन्हें जिस वस्तु की भी इच्छा होगी वह प्रदान की जाएगी। इसके अतिरिक्त उन्हें यह भी ज्ञात होगा कि स्वर्ग में उनकी उपस्थिति, सीमित व अस्थायी नहीं है अतः वे भविष्य की ओर से भी चिंतित नहीं होंगे।

    इन आयतों से हमने सीखा कि जो लोग स्वर्ग में प्रवेश कर जाएंगे वे कभी भी नरक में नहीं जाएंगे किंतु नरक में जाने वाले बहुत से लोग दंड सहन करने और पाप से पवित्र होने के बाद स्वर्ग में आ जाएंगे।

    जो लोग इस संसार में अपनी आतंरिक इच्छाओं को नियंत्रित रखते हैं और हराम काम नहीं करते, ईश्वर प्रलय में उनकी हर इच्छा को पूरा करेगा और वे जो भी चाहेंगे उन्हें बड़ी सरलता से मिल जाएगा।

    आइये अब सूरए अम्बिया की आयत क्रमांक 103 की तिलावत सुनें।

    لَا يَحْزُنُهُمُ الْفَزَعُ الْأَكْبَرُ وَتَتَلَقَّاهُمُ الْمَلَائِكَةُ هَذَا يَوْمُكُمُ الَّذِي كُنْتُمْ تُوعَدُونَ (103)

    उस दिन का सबसे बड़ा आतंक उन्हें दुखी नहीं करेगा। फ़रिश्ते उनका स्वागत करेंगे (और कहेंगे) यह वही दिन है जिसका तुमसे वादा किया जाता रहा है। (21:103)

    प्रलय के दिन का भय व आतंक, मनुष्य के जीवन का सबसे बड़ा आतंक है किंतु ईमान वाले इसका पात्र नहीं बनेंगे। वे संपूर्ण शांति व सुरक्षा की छाया में स्वर्ग पहुंचेंगे जहां फ़रिश्ते उनका स्वागत करेंगे और उन्हें बधाई देंगे।

    हज़रत अली अलैहिस्सलाम अपने एक अत्यंत सुंदर कथन में कहते हैं कि हे ईमान वालो! सद्कर्म करने में एक दूसरे से आगे बढ़ो ताकि प्रलय में ईश्वर के पड़ोसी बनो, ईश्वर के पैग़म्बर तुम्हारे मित्र बनें और ईश्वर के फ़रिश्ते तुम्हारे दर्शन को आएं।

    इस आयत से हमने सीखा कि संसार में भय व आतंक के कारण जो भी हों, प्रलय में होने वाली पीड़ा और डर के समक्ष कुछ भी नहीं हैं।

    प्रलय का दिन, ईमान वालों की प्रतिष्ठा व गौरव तथा काफ़िरों के अपमान व तुच्छता का दिन है।

    आइये अब सूरए अम्बिया की आयत क्रमांक 104 की तिलावत सुनें।

    يَوْمَ نَطْوِي السَّمَاءَ كَطَيِّ السِّجِلِّ لِلْكُتُبِ كَمَا بَدَأْنَا أَوَّلَ خَلْقٍ نُعِيدُهُ وَعْدًا عَلَيْنَا إِنَّا كُنَّا فَاعِلِينَ (104)

    जिस दिन हम आकाश को उस प्रकार लपेट देंगे जिस प्रकार लिखे हुए पन्ने लपेटे जाते हैं, जिस प्रकार पहले हमने सृष्टि का आरम्भ किया था उसी प्रकार हम उसे लौटा देंगे। यह हमारे ज़िम्मे एक वादा है जिसे हम निश्चय ही पूरा करने वाले हैं। (21:104)

    ये आयतें इस महान सृष्टि को एक किताब व पत्र की भांति बताती हैं कि एक समय इसके काग़ज़ों को खोला जाता है और उन पर कुछ बातें लिखी जाती हैं, फिर कुछ समय के बाद उन काग़ज़ों को लपेट दिया जाता है। जिस प्रकार से किताब या पत्र के काग़ज़ों को लपेटना उनमें लिखी गई बातों के समाप्त होने के अर्थ में नहीं है ठीक उसी प्रकार जब संसार को लपेट दिया जाएगा तो वह भी समाप्त नहीं होगा बल्कि नई व्यवस्था और नए क़ानूनों के साथ उसका पुनः जन्म होगा।

    यही कारण है कि आगे चल कर आयत कहती है कि जिस प्रकार से संसार में सृष्टि का आरंभ किया गया है उसी प्रकार अंत में उसे लपेट भी दिया जाएगा। फिर ईश्वर उसे प्रलय में पुनः लौटा देगा और यह कार्य उसके लिए तनिक भी कठिन नहीं है।

    इस आयत से हमने सीखा कि संसार की वर्तमान व्यवस्था अमर नहीं है बल्कि इसमें मूल परिवर्तन आएगा।

    ईश्वर के लिए प्रलय लाना, एक पत्र के काग़ज़ों को लपेट देने जितना ही सरल है।