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    सूरए अम्बिया, आयतें 105-108, (कार्यक्रम 589)

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    आइये पहले सूरए अम्बिया की 105वीं आयत की तिलावत सुनें।

    وَلَقَدْ كَتَبْنَا فِي الزَّبُورِ مِنْ بَعْدِ الذِّكْرِ أَنَّ الْأَرْضَ يَرِثُهَا عِبَادِيَ الصَّالِحُونَ (105)

    और निश्चित रूप से हमने (तौरैत के बाद) ज़बूर में भी लिख दिया कि धरती के उत्तराधिकारी मेरे अच्छे बन्दे ही होंगे। (21:105)

    इससे पहले की आयतों में प्रलय में स्वर्ग व नरक वालों की स्थिति का वर्णन करते हुए ईश्वर ने ईमान वालों को लोक-परलोक में भले अंत की शुभ सूचना दी थी। यह आयत कहती है कि न केवल हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की किताब तौरैत में बल्कि हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम की किताब ज़बूर में भी ईश्वर ने उल्लेख कर दिया है कि धरती के वास्तविक उत्तराधिकारी भले लोग ही होंगे और वही धरती पर शासन करेंगे।

    ज़बूर, हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम की दुआओं, प्रार्थनाओं व नसीहतों का संग्रह है। इस ईश्वरीय पुस्तक में पांच स्थानों पर ईश्वर ने भले लोगों का शासन स्थापित होने का वादा किया है। हज़रत दाऊद, बनी इस्राईल के बड़े पैग़म्बरों में से एक थे जिन्होंने सरकार गठित की थी और वर्तमान सीरिया के क्षेत्र में भले लोगों के शासन का एक उदाहरण प्रस्तुत किया था।

    पैग़म्बरे इस्लाम व उनके परिजनों के कथनों के अनुसार संसार के अंतिम काल में हज़रत इमाम महदी अलैहिस्सलाम के हाथों, जो पैग़म्बरे इस्लाम के वंश से हैं, एक ऐसी सरकार गठित होगी जो पूरे संसार में न्याय स्थापित करेगी और अत्याचारियों को जड़ से उखाड़ फेंकेगी।

    इस आयत से हमने सीखा कि पिछली आसमानी किताबों और क़ुरआने मजीद ने संसार के अंत के बारे में भविष्यवाणी की है और धरती पर ईश्वर के भले बंदों के शासन की सूचना दी है।

    संसार पर शासन की दो शर्तें हैं, प्रथम, ईश्वर तथा उसके आदेशों के समक्ष नतमस्तक रहना और दूसरे सरकार के संचालन के लिए आवश्यक वैज्ञानिक व व्यवहारिक योग्यता व क्षमता प्राप्त करना।

    आइये अब सूरए अम्बिया की 106ठी आयत की तिलावत सुनें।

    إِنَّ فِي هَذَا لَبَلَاغًا لِقَوْمٍ عَابِدِينَ (106)

    निश्चित रूप से इसमें ईश्वर की उपासना करने वाले लोगों के लिए एक स्पष्ट संदेश है। (21:106)

    इस आयत में ईश्वर कहता है कि मेरे निष्ठापूर्ण बंदों को जान लेना चाहिए कि केवल उपासना के माध्यम से अत्याचारियों के हाथों से शासन नहीं लिया जा सकता बल्कि इसके लिए प्रयास करना चाहिए और विश्व समुदाय के संचालन के लिए स्वयं में आवश्यक क्षमताएं पैदा करनी चाहिए, चाहे वह ज्ञान व ईश्वर से भय जैसी व्यक्तिगत क्षमताएं हों या फिर सामाजिक, राजनैतिक व सांस्कृतिक क्षेत्रों में समाज के संचालन की सामाजिक क्षमताएं हों।

    इस आयत से हमने सीखा कि धरती पर शासन, ज़ोर-ज़बरदस्ती करने वालों और अत्याचारियों का नहीं अपितु ईमान वालों और भले कर्म करने वालों का अधिकार है, अतः ईमान वालों को सत्ता व शासन हाथ में लेने का प्रयास करना चाहिए।

    ईमान वाले व्यक्ति व समाज के लिए जो कुछ आवश्यक है, उसे ईश्वर ने आसमानी किताब में बयान कर दिया है और ईमान वाले स्वयं को ईश्वरीय संदेश को समझने और उसे व्यवहारिक बनाने के प्रति कटिबद्ध समझते हैं।

    आइये अब सूरए अम्बिया की 107वीं आयत की तिलावत सुनें।

    وَمَا أَرْسَلْنَاكَ إِلَّا رَحْمَةً لِلْعَالَمِينَ (107)

    और (हे पैग़म्बर!) हमने तो आपको पूरे ब्रह्मांड के लिए केवल संपूर्ण दया बना कर ही भेजा है। (21:107)

    यह शुभ सूचना देने के बाद कि अंततः ईमान वाले ही संसार पर शासन करेंगे, इस आयत में ईश्वर कहता है कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को पैग़म्बर बना कर भेजा जाना, जिनके उत्तराधिकारी विश्व में न्याय का शासन स्थापित करेंगे, पूरे संसार के लिए दया का कारण है। अपने व्यक्तिगत व दलगत हितों के लिए काम करने वाले अन्य शासकों के विपरीत ईश्वर के भले बंदे, लोगों की सेवा और समाज में हर स्तर पर न्याय स्थापित करने के प्रयास में रहते हैं। इस प्रकार के शासन में काफ़िर तक पूरी शांति व सुरक्षा के साथ जीवन बिताते हैं और उन पर अत्याचार नहीं किया जाता।

    सैद्धांतिक रूप से पैग़म्बरों का अस्तित्व सभी लोगों के लिए, चाहे वे मोमिन हों या काफ़िर, दया व कृपा का कारण है क्योंकि वे ईश्वर की इच्छा के अतिरिक्त कोई अन्य काम नहीं करते और ईश्वर अपने सभी बंदों के प्रति दयावान है और उनकी भलाई व कल्याण का इच्छुक है। अलबत्ता सदैव ही लोगों का एक गुट अपनी भलाई व कल्याण की पहचान में ग़लती कर बैठता है या फिर द्वेष और हठ धर्म के कारण सत्य और वास्तविकता को स्वीकार नहीं करता और चाहे अनचाहे में स्वयं को क्षति पहुंचा देता है।

    इस आयत से हमने सीखा कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ईश्वर की ओर से जो कुछ लोगों के लिए लाए हैं वह मानव समाज की मुक्ति व कल्याण का कारण है।

    हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम केवल अरब जाति के नहीं बल्कि संसार के सभी लोगों के पैग़म्बर हैं अतः इस्लाम धर्म की शिक्षाएं, विश्व व्यापी हैं और किसी क्षेत्र से विशेष नहीं हैं।

    आइये अब सूरए अम्बिया की 108वीं आयत की तिलावत सुनें।

    قُلْ إِنَّمَا يُوحَى إِلَيَّ أَنَّمَا إِلَهُكُمْ إِلَهٌ وَاحِدٌ فَهَلْ أَنْتُمْ مُسْلِمُونَ (108)

    (हे पैग़म्बर! लोगों से) कह दीजिए कि मेरे पास बस यही वहि आती है कि तुम्हारा ईश्वर, अनन्य ईश्वर है। तो क्या तुम नतमस्तक होते हो (और इस्लाम स्वीकार करते हो)? (21:108)

    पिछली आयत में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के अस्तित्व को पूरे विश्व के लिए दया बताने के पश्चात यह आयत पैग़म्बरों की सबसे महत्वपूर्ण एवं मूल बात अर्थात एकेश्वरवाद के निमंत्रण की ओर संकेत करते हुए कहती है कि पैग़म्बर लोगों को अपनी ओर नहीं बल्कि ईश्वर की ओर आने और उसकी उपासना करने का निमंत्रण देते हैं ताकि उन्हें मूर्तियों की पूजा और अंधविश्वास से मुक्ति दिलाएं।

    दूसरे शब्दों में ईश्वरीय पैग़म्बर, लोगों को अनन्य ईश्वर के आज्ञापालन का निमंत्रण देते थे ताकि उन्हें अत्याचारियों और ज़ोर-ज़बरदस्ती करने वालों के वर्चस्व से मुक्ति दिला कर वास्तविक स्वतंत्रता तक पहुंचा दें।

    इस आयत से हमने सीखा कि लोगों को एकेश्वरवाद का निमंत्रण देना, धरती में ईश्वरीय दया का एक चरण है।

    ईश्वरीय आदेशों के समक्ष नतमस्तक होना, एकेश्वरवाद की आस्था का अटूट अंग है। निश्चित रूप से ईमान, कर्म से अलग नहीं है।