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    सूरए अम्बिया, आयतें 109-112, (कार्यक्रम 590)

    सूरए अम्बिया, आयतें 109-112, (कार्यक्रम 590)
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    आइये पहले सूरए अम्बिया की 109वीं आयत की तिलावत सुनें।

    فَإِنْ تَوَلَّوْا فَقُلْ آَذَنْتُكُمْ عَلَى سَوَاءٍ وَإِنْ أَدْرِي أَقَرِيبٌ أَمْ بَعِيدٌ مَا تُوعَدُونَ (109)

    तो (हे पैग़म्बर!) यदि वे (आपके निमंत्रण से) मुँह मोड़ लें तो (उनसे) कह दीजिए कि मैंने तुम सबको समान रूप से सचेत कर दिया है और मुझे इस बात का ज्ञान नहीं है कि जिस (दंड) का तुमसे वादा किया गया है वह निकट है या दूर? (21:109)

    इससे पहले की आयतों में कहा गया कि पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्ल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को पैग़म्बर बना कर भेजा जाना, पूरे संसार के लिए ईश्वर की ओर से साक्षात दया है। यह आयत पैग़म्बर व अन्य ईमान वालों को संबोधित करते हुए कहती है कि इस बात की अपेक्षा नहीं रखनी चाहिए कि संसार के सभी लोग एकेश्वरवाद के निमंत्रण को स्वीकार कर लेंगे बल्कि इतिहास में सदैव ही ऐसे लोग रहे हैं जो सदैव ही सत्य का विरोध और उससे संघर्ष करते रहे हैं।

    ईमान वालों का दायित्व लोगों को सचेत करना है और यह बात न तो उन्हें ज्ञात है और न ही उनके हाथ में है कि काफ़िर कब ईश्वरीय दंड में ग्रस्त होंगे। संभव है कि ईश्वर उन्हें इसी संसार में दंडित करे कि इस स्थिति में उनके दंड का समय बहुत निकट है और यदि वह उन्हें प्रलय में दंडित करेगा तो फिर यह समय काफ़ी दूर है।

    इस आयत से हमने सीखा कि पैग़म्बर का अस्तित्व और उनका मार्गदर्शन, दया की वर्षा के समान है कि जो बरसती तो हर स्थान पर है किंतु उससे बंजर ज़मीन पर फूल नहीं उगते।

    ईश्वर ने मनुष्य को चयन का जो अधिकार दिया है वह इस बात का कारण बनता है कि कुछ लोग स्वयं ईश्वर के ही अस्तित्व का इन्कार कर दें और उसके आदेशों की अवहेलना करें।

    आइये अब सूरए अम्बिया की 110वीं आयत की तिलावत सुनें।

    إِنَّهُ يَعْلَمُ الْجَهْرَ مِنَ الْقَوْلِ وَيَعْلَمُ مَا تَكْتُمُونَ (110)

    निश्चय ही ईश्वर ऊँची आवाज़ में कही हुई बात को भी जानता है और उस बात को भी जानता है जिसे तुम छिपाते हो। (21:110)

    यह आयत कहती है कि यदि तुम्हारे दंड में विलम्ब हो रहा है तो यह मत सोचो कि ईश्वर तुम्हारे कार्यों से अवगत नहीं है क्योंकि वह तो हर बात का जानने वाला है चाहे तुम किसी बात को स्पष्ट रूप से कहो या एकांत में और छिपा कर कोई काम करो।

    सैद्धांतिक रूप से ईश्वर के लिए, जो तुम्हारा भी और इस विशाल संसार का भी रचयिता है, गुप्त और प्रकट का कोई अर्थ नहीं है। उसका ज्ञान असीम है और उसके ज्ञान में किसी भी प्रकार की कोई सीमा नहीं है। ये हम मनुष्य हैं जिनकी आंखें, कान और अन्य इंद्रियां समय व स्थान में सीमित हैं और जो अज्ञात बातों से अनभिज्ञ हैं। ईश्वर के लिए हर गुप्त बात भी प्रकट है अतः उसके लिए अज्ञात शब्द का कोई अर्थ नहीं है।

    इस आयत से हमने सीखा कि कथनी व करनी में विरोधाभास ईश्वर के निकट स्पष्ट है चाहे वह लोगों की दृष्टि में न आए और यही विरोधाभास मनुष्य के अपमान का कारण भी बन सकता है।

    हमें ईश्वर के ज्ञान की तुलना अपने ज्ञान से नहीं करनी चाहिए क्योंकि हम अपने व्यवहार में ग़लती करते हैं और फिर उस ग़लती को छिपाने का प्रयास करते हैं।

    आइये अब सूरए अम्बिया की 111वीं आयत की तिलावत सुनें।

    وَإِنْ أَدْرِي لَعَلَّهُ فِتْنَةٌ لَكُمْ وَمَتَاعٌ إِلَى حِينٍ (111)

    और मुझे ज्ञात नहीं, शायद (दंड में) यह (विलम्ब) तुम्हारे लिए एक परीक्षा हो और एक नियत समय तक जीवन का सुख (उठाने के लिए मोहलत) हो। (21:111)

    पिछली आयतों के क्रम को जारी रखते हुए यह आयत एक बार फिर उन लोगों को संबोधित करते हुए, जिन्होंने पैग़म्बरों के निमंत्रण की ओर से मुंह मोड़ लिया है, कहती है कि संभव है कि दंड में विलम्ब, परीक्षा का साधन हो कि तुम मृत्यु का समय आने से पहले तक अपने चयन से जो चाहो करो और स्वयं को विवश न समझो। यह ईश्वर की परम्परा है कि वह दंडित करने में जल्दी नहीं करता ताकि हर व्यक्ति अपने आपको वैसा ही दिखाए जैसा वह वास्तव में है और उसके पास कोई बहाना न रह जाए।

    एक अन्य बिंदु यह है कि यह मोहलत, मनुष्य को तौबा व प्रायश्चित का अवसर उपलब्ध कराती है क्योंकि ईश्वर ने वचन दिया है कि पाप के पश्चात तौबा करने वाले उसकी दया के पात्र बनेंगे और वह उन्हें दंडित नहीं करेगा।

    इस आयत से हमने सीखा कि संसार की आयु छोटी और इस नश्वर संसार से आनंद और लाभ उठाने का समय सीमित है अतः उचित है कि हम माया मोह में ग्रस्त न हों और अपनी ग़लतियों के परिणामों की ओर से चिंतित रहें।

    आइये अब सूरए अम्बिया की 112वीं आयत की तिलावत सुनें।

    قَالَ رَبِّ احْكُمْ ‎بِالْحَقِّ وَرَبُّنَا الرَّحْمَنُ الْمُسْتَعَانُ عَلَى مَا تَصِفُونَ (112)

    पैग़म्बर ने कहाः हे मेरे पालनहार! (हमारे और अनेकेश्वरवादियों के बीच) सत्य का फ़ैसला कर दे! और (हे अनेकेश्वरवादियो! जान लो कि) हमारा पालनहार अत्यंत कृपाशील (ईश्वर) है जिससे हम तुम्हारी अनुचित बातों के मुक़ाबले में सहायता चाहते हैं। (21:112)

    यह आयत, जो इस सूरे की अंतिम आयत है, पैग़म्बर के उस कथन का वर्णन करती है जिसमें वे अनेकेश्वरवादियों द्वारा सत्य को देखने के बाद भी उससे मुंह मोड़ने तथा शत्रुता करने के कारण ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि वह अपने सही फ़ैसले से उन्हें उनके कर्मों का दंड दे तथा उन्हें इस बात की अनुमति न दे कि वे दंड में विलम्ब से अनुचित लाभ उठा कर पैग़म्बर के साथियों तथा अनुयाइयों का परिहास करें और उनकी भावनाओं को कमज़ोर बनाने का प्रयास करें।

    आगे चल कर आयत विरोधियों को संबोधित करते हुए कहती है कि तुम्हारे हठधर्म ने मामला यहां तक पहुंचा दिया है कि दया के प्रतीक पैग़म्बर ने भी तुम्हें श्राप दे दिया है और ईश्वर से तुम्हारे विरुद्ध सहायता चाही है।

    इस आयत से हमने सीखा कि शत्रुओं के बारे में भी न तो ग़लत फ़ैसला करना चाहिए और न ही ग़लत आशा रखनी चाहिए। इसी प्रकार सत्य की सीमा से आगे नहीं बढ़ना चाहिए और हद से अधिक दंड की मांग नहीं करनी चाहिए।

    पैग़म्बर व उनके अनुयाई केवल ईश्वर से ही सहायता मांगते हैं जबकि अनेकेश्वरवादी और काफ़िर असहाय मनुष्यों, पत्थरों और लकड़ियों से सहायता मांगते हैं।