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    सूरए अम्बिया, आयतें 11-15, (कार्यक्रम 570)

    सूरए अम्बिया, आयतें 11-15, (कार्यक्रम 570)
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    आइये पहले सूरए अम्बिया की ग्यारहवीं और बारहवीं आयतों की तिलावत सुनें।

    وَكَمْ قَصَمْنَا مِنْ قَرْيَةٍ كَانَتْ ظَالِمَةً وَأَنْشَأْنَا بَعْدَهَا قَوْمًا آَخَرِينَ (11) فَلَمَّا أَحَسُّوا بَأْسَنَا إِذَا هُمْ مِنْهَا يَرْكُضُونَ (12)

    और कितनी ही बस्तियों को, जो अत्याचारी थीं, हमने विनष्ट कर दिया और उनके बाद हमने दूसरी जातियों को पैदा किया। (21:11) फिर जब अत्याचारियों को हमारे दंड का आभास हुआ तो वे सहसा ही वहाँ से भागने लगे। (21:12)

    इससे पहले हमने कहा कि मक्के के अनेकश्वरवादी विभिन्न रूपों में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम का विरोध किया करते थे। ये आयतें उन्हें सचेत करती हैं कि ईश्वरीय आयतों का इन्कार तथा पैग़म्बरों को झुठलाना एवं उन्हें यातनाएं देना सबसे बड़ा अत्याचार है और जिस समाज में भी अत्याचार प्रचलित हो जाता है उसे ईश्वरीय दंड की प्रतीक्षा में रहना चाहिए।

    यह ईश्वर की अटल परम्परा है कि वह अत्याचारियों को तबाह करके अन्य लोगों को उनके स्थान पर ले आता है। अलबत्ता अत्याचारी इतने अहंकारी व हठधर्म होते हैं कि उन्हें इस बात पर विश्वास ही नहीं आता कि वे ईश्वरीय दंड में ग्रस्त हो सकते हैं। जब वे अपनी आंखों से ईश्वरीय दंड के चिन्हों को देख लेते हैं तब भागने का प्रयास करते हैं किंतु उस समय उनकी मुक्ति का कोई मार्ग बाक़ी नहीं बचता।

    इन आयतों से हमने सीखा कि समाज में अत्याचार का प्रचलन, तबाही और विनाश का कारण बनता है और यह ईश्वर की अटल परम्परा है।

    ईश्वर, अत्यचारियों को इसी संसार में दंडित करता है ताकि यह बात दूसरों के लिए पाठ बन जाए।

    आइये अब सूरए अम्बिया की तेरहवीं आयत की तिलावत सुनें।

    لَا تَرْكُضُوا وَارْجِعُوا إِلَى مَا أُتْرِفْتُمْ فِيهِ وَمَسَاكِنِكُمْ لَعَلَّكُمْ تُسْأَلُونَ (13)

    उनसे कहा जाएगा, भागो नहीं! और उसी भोग-विलास की ओर, जो तुम्हें प्राप्त था और अपने (वैभवशाली) घरों की ओर लौट चलो कि शायद तुमसे पूछा जाए। (21:13)

    यह आयत अत्याचारियों को डराते हुए कहती है कि जब ईश्वरीय दंड को देख कर वे भागने लगेंगे तो मानो दंड लाने वाले फ़रिश्ते उनसे कह रहे होंगे कि कहां भाग रहे हो? कम से कम अपने उन्हीं घरों में वापस हो जाओ और जो कुछ तुमने अपने भोग विलास के लिए एकत्रित कर रखा है उसी से लाभ उठाओ, संभव है कि कोई दरिद्र व्यक्ति तुम्हारे पास आ जाए तो तुम अपनी आदत के विपरीत उसकी आवश्यकता पूरी कर दो और इस प्रकार तुम्हारे दंड में कमी हो जाए।

    इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वरीय दंड से बचना संभव नहीं है अतः हमें अपने व्यवहार को सुधारने का प्रयास करना चाहिए।

    ऐशवर्य और भोग-विलास में अतिशयोक्ति, समाज के दरिद्र एवं वंचित वर्ग की ओर से निश्चेतना का कारण बनती है और ईश्वरीय दंड में ग्रस्त होने का मार्ग प्रशस्त करती है।

    आइये अब सूरए अम्बिया की 14वीं और 15वीं आयतों की तिलावत सुनें।

    قَالُوا يَاوَيْلَنَا إِنَّا كُنَّا ظَالِمِينَ (14) فَمَا زَالَتْ تِلْكَ دَعْوَاهُمْ حَتَّى جَعَلْنَاهُمْ حَصِيدًا خَامِدِينَ (15)

    उन्होंने कहा, धिक्कार हो हम पर! निश्चित रूप से हम अत्याचारी थे। (21:14) फिर वे निरन्तर यही बात कहते रहे यहाँ तक कि हमने उन्हें ऐसा कर दिया जैसे कटी हुई खेती (और) बुझी हुई आग हो। (21:15)

    ईश्वर के दंड के चिन्ह देखने के बाद अत्याचारी पैग़म्बर की बातों की पुष्टि करने लगते हैं कि शायद उनके दंड में कुछ कमी हो जाए किंतु अब उनकी पुष्टि और स्वीकारोक्ति का कोई लाभ नहीं है क्योंकि यह अपने चयन से नहीं बल्कि विवशता के कारण की गई है।

    यदि ईश्वरीय दंड को देखने से पूर्व अत्याचारी निश्चेतना की निद्रा से जाग जाएं और उन्हें अपने किए पर पश्चाताप हो जाए तथा वे प्रायश्चित करने का संकल्प कर लें तो ईश्वर उनकी तौबा को स्वीकार कर लेता है और उन्हें क्षतिपूर्ति का अवसर देता है किंतु जब ईश्वरीय दंड आ जाए तब पश्चाताप स्वीकार्य नहीं होता। जैसा कि उद्दंडी व घमंडी फ़िरऔन ने, जो ईश्वर होने का दावा करता था, नील नदी में डूबते समय अपने पछतावे और पश्चाताप की घोषणा की किंतु इससे उसे कोई लाभ नहीं हुआ।

    इन आयतों के अनुसार यद्यपि अत्याचारी, धिक्कार हो हम पर, जैसे शब्द कह कर अपनी ग़लती व अत्याचार को स्वीकार करते हैं और उसे निरंतर दोहराते रहते हैं किंतु ईश्वरीय दंड उन्हें तबाह कर देता है और उन्हें बोलने की अनुमति नहीं देता।

    इन आयतों से हमने सीखा कि अत्याचार का अंत पछतावे के अतिरिक्त कुछ और नहीं होता किंतु उस समय पछताने का कोई लाभ नहीं होता।

    अत्याचार, एक विनाशकारी अभिशाप है और अत्यचारी की जड़ तक को तबाह कर देता है।