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    सूरए अम्बिया, आयतें 16-20, (कार्यक्रम 571)

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    आइये पहले सूरए अम्बिया की सोलहवीं और सत्रहवीं आयतों की तिलावत सुनें।

    وَمَا خَلَقْنَا السَّمَاءَ وَالْأَرْضَ وَمَا بَيْنَهُمَا لَاعِبِينَ (16) لَوْ أَرَدْنَا أَنْ نَتَّخِذَ لَهْوًا لَاتَّخَذْنَاهُ مِنْ لَدُنَّا إِنْ كُنَّا فَاعِلِينَ (17)

    और हमने आकाश और धरती को और जो कुछ उनके मध्य है, खेल-तमाशे के लिए नहीं बनाया है। (21:16) यदि हम कोई खेल-तमाशा करना चाहते तो (अपने अनुकूल) और अपने ही पास से उसका चयन करते, यदि हम ऐसा करने ही वाले होते। (21:17)

    इससे पहले हमने इस संसार में अत्याचारियों को मिलने वाले कड़े दंड के बारे में बात की थी। ये आयतें कहती हैं कि मानो ये अत्याचारी यह समझ बैठे हैं कि संसार की सृष्टि बिना लक्ष्य व उद्देश्य के की गई है और ईश्वर ने इस संसार की रचना खेल-तमाशे के लिए की है और इसी लिए वे स्वयं को अपने व्यवहार व कर्मों के प्रति उत्तरदायी नहीं समझते तथा खेल-तमाशे में ही व्यस्त रहते हैं। जबकि यदि ईश्वर का लक्ष्य यही होता तो वह अपने स्तर की कोई वस्तु समय बिताने के लिए पैदा करता। क्या इस बात की कल्पना की जा सकती है कि इतनी महान सृष्टि की रचना अकारण और बिना किसी लक्ष्य के हुई हो और इसका कोई ज्ञानी व तत्वदर्शी रचयिता न हो?

    जो लोग सृष्टि के आरंभ व अंत का इन्कार करते हैं उनके विचार में यह संसार संयोग से बिना किसी पूर्व कार्यक्रम के अस्तित्व में आया है और यह ज्ञात नहीं है कि यह किस ओर जा रहा है और इसका अंत किस प्रकार का होगा। इन लोगों के विचार में जब संपूर्ण सृष्टि का कोई लक्ष्य व कार्यक्रम नहीं है तो फिर मनुष्य अपने लिए क्यों लक्ष्य व कार्यक्रम निर्धारित करे और अपने दायित्वों का निर्धारण करे?

    इन आयतों से हमने सीखा कि सृष्टि की रचना लक्ष्यपूर्ण है और मनुष्य उसे खेल-तमाशा नहीं समझ सकता और जैसा मन में आए वैसा व्यवहार नहीं कर सकता।

    अत्याचार इस बात का कारण बनता है कि मनुष्य, संसार को लक्ष्यहीन समझे और प्रलय का इन्कार कर दे या फिर उसके प्रति निश्चेत रहे।

    आइये अब सूरए अम्बिया की अट्ठारहवीं आयत की तिलावत सुनें।

    بَلْ نَقْذِفُ بِالْحَقِّ عَلَى الْبَاطِلِ فَيَدْمَغُهُ فَإِذَا هُوَ زَاهِقٌ وَلَكُمُ الْوَيْلُ مِمَّا تَصِفُونَ (18)

    बल्कि हम तो सत्य को असत्य पर दे मारते हैं तो वह उसे तबाह कर देता है। फिर मिट कर रह जाता है और धिक्कार हो तुम पर इस प्रकार (की तर्कहीन) बातें करने के लिए। (21:18)

    यह आयत कहती है कि सृष्टि सत्य व तथ्य के आधार पर है और तत्वदर्शी ईश्वर ने पूरे संसार को सत्य के आधार पर बनाया है और सृष्टि में किसी प्रकार के असत्य को स्थान नहीं दिया है। अतः वही वस्तु बाक़ी रहने वाली है जो सत्य पर आधारित हो। असत्य थोड़े समय के लिए बुलबुले की भांति उभर कर सामने आ सकता है किंतु अंततः वह मिट ही जाता है क्योंकि वह सृष्टि की व्यवस्था से विरोधाभास रखता है। सदैव ही सत्य को असत्य पर विजय प्राप्त होती है और वह उसे उखाड़ फेंकता है किंतु ऐसा कभी नहीं होता कि असत्य, सत्य को पराजित कर दे।

    आयत के अंत में कहा गया है कि किस प्रकार संसार के कुछ लोग, संसार को लक्ष्यहीन समझते हैं और उसे खेल-तमाशा बताते हैं? वे सृष्टि के गहरे रहस्यों पर क्यों नहीं विचार करते और उन्हें देख कर तत्वदर्शी रचयिता के अस्तित्व तक क्यों नहीं पहुंचते?

    इस आयत से हमने सीखा कि सत्य सदैव असत्य पर विजयी रहता है और असत्य का अंत, ईश्वर की अटल परम्परा है।

    ईश्वर की ओर से मनुष्य को दिए गए चयन के अधिकार और ईश्वर की ओर से पापियों को मोहलत देने के अंतर्गत असत्य सामने आता है किंतु अंततः उसे मिटना ही होता है जबकि सत्य, अमर होता है।

    आइये अब सूरए अम्बिया की 19वीं और 20वीं आयतों की तिलावत सुनें।

    وَلَهُ مَنْ فِي السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَمَنْ عِنْدَهُ لَا يَسْتَكْبِرُونَ عَنْ عِبَادَتِهِ وَلَا يَسْتَحْسِرُونَ (19) يُسَبِّحُونَ اللَّيْلَ وَالنَّهَارَ لَا يَفْتُرُونَ (20)

    और जो कोई आकाशों और धरती में है, उसी का है। और जो उसके पास हैं वे न तो अकड़ कर उसकी उपासना से मुँह मोड़ते है औऱ न वे थकते हैं। (21:19) वे रात और दिन बिना रुके हुए उसका गुणगान करते रहते हैं। (21:20)

    ये आयतें सृष्टि पर ईश्वर के संपूर्ण स्वामित्व पर बल देते हुए कहती हैं कि क्या ईश्वर का इन्कार करने वाले तथा अत्याचारी यह नहीं जानते कि वे और सभी मनुष्य बल्कि सभी फ़रिश्ते और जिन उसकी रचनाएं हैं और वह उन सभी का स्वामी है तथा कोई भी वस्तु उसके प्रभुत्व से बाहर नहीं है। दूसरी ओर ईश्वर को विरोधियों की उपासना और उनके ईमान की कोई आवश्यकता नहीं है।

    फ़रिश्ते और उसके प्रिय बंदे सदैव उसकी उपासना और गुणगान करते रहते हैं तथा वे कभी भी उसकी उपासना से नहीं थकते। यदि ईश्वर विरोधियों को ईमान लाने और भले कर्म करने का निमंत्रण देता है तो यह स्वयं उन्हीं की प्रगति एवं परिपूर्णता के लिए है तथा ईश्वर को उनकी उपासना की कोई आवश्यकता नहीं है।

    इन आयतों से हमने सीखा कि उपासना न करने का मूल कारण, घमंड व अहंकार है। जब दूसरे लोगों के मुक़ाबले में मनुष्य के भीतर घमंड निंदनीय है तो फिर अपने रचयिता के मुक़ाबले में घमंड का क्या अर्थ है?

    मनुष्य, ईश्वर से जितना अधिक निकट होता जाता है, ईश्वर के प्रति उसकी पहचान बढ़ती चली जाती है और वह उसकी अधिक से अधिक उपासना करता है तथा तनिक भी थकन का आभास नहीं करता।