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    सूरए अम्बिया, आयतें 21-24, (कार्यक्रम 572)

    सूरए अम्बिया, आयतें 21-24, (कार्यक्रम 572)
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    आइये पहले सूरए अम्बिया की 21वीं और 22वीं आयतों की तिलावत सुनें।

    أَمِ اتَّخَذُوا آَلِهَةً مِنَ الْأَرْضِ هُمْ يُنْشِرُونَ (21) لَوْ كَانَ فِيهِمَا آَلِهَةٌ إِلَّا اللَّهُ لَفَسَدَتَا فَسُبْحَانَ اللَّهِ رَبِّ الْعَرْشِ عَمَّا يَصِفُونَ (22)

    या अनेकेश्वरवादियों ने धरती से कुछ पूज्य बना लिए हैं जो उन्हें जीवित करते हैं?(21:21) यदि आकाशों और धरती में ईश्वर के अतिरिक्त दूसरे पूज्य भी होते तो निश्चित रूप से इन दोनों की व्यवस्था बिगड़ जाती। तो पवित्र है अर्श का पालनहार अल्लाह, उन बातों से जो ये बयान करते है। (21:22)

    पिछली आयतों में बताया गया कि इस संसार की सृष्टि एक निर्धारित लक्ष्य व कार्यक्रम के अंतर्गत की गई है और न तो यह संयोग का परिणाम है और न ही लक्ष्यहीन है। ये आयतें सृष्टि की व्यवस्था की एकजुटता पर बल देते हुए कि जो पालनहार के अनन्य होने का एक प्रमाण है, कहती हैं कि जब अनेकेश्वरवादी, ईश्वर को सृष्टि के रचयिता के रूप में स्वीकार करते हैं तो फिर वे पत्थर और लकड़ी की बनी मूर्तियों के सामने क्यों झुकते हैं और धरती के इन तथाकथित पूज्यों की क्यों उपासना करते हैं? क्या उनके पास भी अनन्य ईश्वर की भांति सृष्टि की रचना करने की शक्ति है?

    आगे चलकर आयतें कहती हैं कि यदि ईश्वर को छोड़ कर भी कुछ अन्य पूज्य होते तो सृष्टि की व्यवस्था भंग हो जाती और इतनी विशाल सृष्टि में जो आश्चर्यजनक समन्वय दिखाई पड़ता है उसका कहीं अस्तित्व न होता। इसका कारण भी स्पष्ट है क्योंकि दो लोग, चाहे उनमें जितना समन्वय और जितनी समरसता हो, दो लोग ही होते हैं और उनमें विभिन्न अंतर पाए जाते हैं और यदि यह मान लिया जाए कि उनकी सभी बातें एक समान हों तो फिर वे दो नहीं बल्कि एक होंगे।

    ये आयतें इसी प्रकार उन लोगों के उत्तर में जो हर वस्तु और हर बात के लिए पालनहार और युक्तिकर्ता के अस्तित्व की बात करते हैं, कहती हैं कि अनन्य ईश्वर ही अर्श अर्थात संपूर्ण सृष्टि का पालनहार है और सृष्टि के संचालन में किसी अन्य की कोई भूमिका नहीं है।

    इन आयतों से हमने सीखा कि सृष्टि के संचालन में समन्वय व एकजुटता, रचयिता व पालनहार के एक एवं अनन्य होने का प्रमाण है।

    यदि सृष्टि में एक से अधिक इरादे का शासन होता तो उनमें से प्रत्येक का कुछ आदेश होता जो दूसरे के आदेश से टकराता और इस प्रकार पूरी सृष्टि नष्ट हो जाती।

    आइये अब सूरए अम्बिया की 23वीं आयत की तिलावत सुनें।

    لَا يُسْأَلُ عَمَّا يَفْعَلُ وَهُمْ يُسْأَلُونَ (23)

    जो कुछ ईश्वर करता है उससे उसकी कोई पूछ नहीं हो सकती किन्तु इनसे (इनके कार्यों के बारे में) पूछा जाएगा।  (21:23)

    पिछली आयतों में ईश्वर के अनन्य होने को सिद्ध करने के पश्चात क़ुरआने मजीद इस आयत में कहता है कि उसने सृष्टि की इस प्रकार रचना की है और तत्वदर्शिता के आधार पर उसे इतना सुव्यवस्थित बनाया है कि उसमें किसी भी प्रकार का कोई संदेह नहीं है और कोई भी उसके कार्य पर न तो आपत्ति कर सकता है और न ही उससे प्रश्न कर सकता है जबकि दूसरे लोग कदापि इस प्रकार नहीं हैं और उनके कार्यों में अत्यधिक त्रुटि होती है जिसके बारे में उनसे प्रश्न किया जा सकता है।

    इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर के कार्य ज्ञान व तत्वदर्शिता के आधार पर होते हैं तथा उनमें किसी भी प्रकार की त्रुटि या कमी नहीं होती अतः उनके बारे में किसी भी प्रकार का प्रश्न नहीं किया जा सकता।

    मनुष्य, अपने कर्मों के प्रति उत्तरदायी है और उसे प्रलय के दिन उनका उत्तर देना होगा।

    आइये अब सूरए अम्बिया की 24वीं आयत की तिलावत सुनें।

    أَمِ اتَّخَذُوا مِنْ دُونِهِ آَلِهَةً قُلْ هَاتُوا بُرْهَانَكُمْ هَذَا ذِكْرُ مَنْ مَعِيَ وَذِكْرُ مَنْ قَبْلِي بَلْ أَكْثَرُهُمْ لَا يَعْلَمُونَ الْحَقَّ فَهُمْ مُعْرِضُونَ (24)

    या (अनेकेश्वरवादियों ने) अनन्य ईश्वर को छोड़कर दूसरे पूज्य बना लिए हैं?) (हे पैग़म्बर!) कह दीजिए कि (यदि ऐसा है तो) अपने तर्क ले आओ। यह (मेरी और) उनकी बात है जो मेरे साथ हैं और जो (पैग़म्बर) मुझसे पहले थे उनका भी यही कहना था किन्तु बात यह है कि इनमें से अधिकतर (तर्क को स्वीकार नहीं करते हैं अतः) सत्य को जानते भी नहीं तो उससे मुंह मोड़ लेते हैं। (21:24)

    ईश्वर के एक व अनन्य होने के प्रमाण व तर्क प्रस्तुत करने के बाद यह आयत कहती है कि हमने अपने तर्क प्रस्तुत कर दिए है और यदि तुम अनेकेश्वरवादियों के पास भी कोई तर्क या प्रमाण हो तो उसे प्रस्तुत करो। स्पष्ट है कि उनके पास अपने अनेकेश्वरवाद के संबंध में कोई तर्कसंगत प्रमाण नहीं है और यदि वे अपने पूर्वजों का अंधा अनुसरण करने के स्थान पर विचार व चिंतन-मनन करते तो सत्य को पहचान लेते और इस प्रकार पथभ्रष्टता व अंधविश्वासों में ग्रस्त न होते।

    आगे चलकर आयत कहती है कि एकेश्वरवाद पर आस्था, केवल मुसलमानों की बात नहीं है बल्कि इससे पहले के सभी धर्मों व पैग़म्बरों की भी यही आस्था रही है और उन्होंने भी अनेकेश्वरवादियों से इसी प्रकार की बातें कही हैं और उनसे अनेकेश्वरवाद के प्रमाण व तर्क की मांग की है।

    इस आयत से हमने सीखा कि अनेकेश्वरवादियों और काफ़िरों के साथ पैग़म्बरों का व्यवहार तर्कसंगत रहा है और वे उनसे तर्क व प्रमाण प्रस्तुत करने को कहते थे।

    एकेश्वरवाद को सिद्ध करने के लिए अनेक तर्क व प्रमाण हैं किंतु अनेकेश्वरवाद का कोई भी तर्कसंगत एवं बौद्धिक सहारा नहीं है।

    किसी भी बात का सत्य या असत्य होना, बहुमत या अल्पमत के अनुसार नहीं बल्कि बुद्धि व तर्क के अधीन होता है। अनेक बार ऐसा होता है कि सच बोलने वाले अल्पमत में होते हैं जबकि बहुमत का मार्ग ग़लत होता है।