islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. सूरए अम्बिया, आयतें 25-29, (कार्यक्रम 573)

    सूरए अम्बिया, आयतें 25-29, (कार्यक्रम 573)

    सूरए अम्बिया, आयतें 25-29, (कार्यक्रम 573)
    Rate this post

    आइये पहले सूरए अम्बिया की 25वीं आयत की तिलावत सुनें।

    وَمَا أَرْسَلْنَا مِنْ قَبْلِكَ مِنْ رَسُولٍ إِلَّا نُوحِي إِلَيْهِ أَنَّهُ لَا إِلَهَ إِلَّا أَنَا فَاعْبُدُونِ (25)

    (हे पैग़म्बर!) हमने आपसे पहले जो भी पैग़म्बर भेजा अवश्य ही उसकी ओर अपना विशेष संदेश वहि भेज कर कहा कि मेरे अतिरिक्त कोई पूज्य नहीं है। तो केवल मेरी ही उपासना करो। (21:25)

    इससे पहले कहा गया था कि यदि सृष्टि की रचना व संचालन कई ईश्वरों द्वारा होता तो संपूर्ण सृष्टि अस्त-व्यस्त हो जाती। इसी प्रकार यह भी कहा गया कि सृष्टि में पाई जाने वाली व्यवस्था और समन्वय, रचयिता के एक व अनन्य होने का चिन्ह है। यह आयत भी कहती है कि सभी पैग़म्बरों को अनन्य ईश्वर की ओर से भेजा गया है और उन सभी का दायित्व था कि लोगों को एक ईश्वर की ओर बुलाएं तथा अनन्य ईश्वर की उपासना का निमंत्रण दें।

    हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने अपने पुत्र इमाम हसन अलैहिस्सलाम से कहा कि हे मेरे पुत्र! यदि संसार पर अन्य ईश्वरों का भी शासन होता तो वे भी अपने पैग़म्बरों को भेजते ताकि लोग उन्हें पहचानें और उनका आज्ञापालन करें।

    इस आयत से हमने सीखा कि एकेश्वरवाद सभी ईश्वरीय पैग़म्बरों के कार्यक्रमों में सर्वोपरि रहा है अतः तीन ईश्वरों पर ईसाइयों की आस्था, अनन्य ईश्वर की ओर हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के निमंत्रण से मेल नहीं खाती।

    ईमान, कर्म से अलग नहीं है। जो कोई अनन्य ईश्वर पर आस्था रखता है वह किस प्रकार उसकी उपासना से इन्कार कर सकता है?

    आइये अब सूरए अम्बिया की 26वीं और 27वीं आयतों की तिलावत सुनें।

    وَقَالُوا اتَّخَذَ الرَّحْمَنُ وَلَدًا سُبْحَانَهُ بَلْ عِبَادٌ مُكْرَمُونَ (26) لَا يَسْبِقُونَهُ بِالْقَوْلِ وَهُمْ بِأَمْرِهِ يَعْمَلُونَ (27)

    और अनेकेश्वरवादियों ने कहा कि दयावान (ईश्वर) ने (फ़रिश्तों को अपनी) सन्तान (के रूप में) ग्रहण किया है। (इससे) पवित्र है वह! बल्कि वे तो प्रतिष्ठित बन्दे हैं। (21:26) (जो) बात में उससे आगे नहीं बढ़ते और केवल उसी के आदेश का पालन करते हैं। (21:27)

    पिछली आयत में ईसाइयों द्वारा हज़रत ईसा मसीह को ईश्वर का पुत्र समझे जाने की आस्था को नकारने के बाद क़ुरआने मजीद इस आयत में अनेकेश्वरवादियों की ग़लत आस्थाओं की ओर संकेत करते हुए कहता है कि वे कहते थे कि ईश्वर ने फ़रिश्तों को अपनी संतान बना रखा है जबकि ईश्वर, भौतिकता से विरक्त है और उसने किसी को भी अपनी संतान नहीं बनाया है चाहे वे पैग़म्बर हों या फ़रिश्ते।

    आगे चलकर आयत कहती है कि फ़रिश्ते भी ईश्वर की रचना और उसके आज्ञापालक हैं। वे कथनी व कर्म में कभी ईश्वर से आगे बढ़ने का प्रयास नहीं करते तथा पूर्ण रूप से उसकी उपासना करते रहते हैं।

    पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम तथा उनके परिजनों के कथनों के अनुसार फ़रिश्ते पूर्ण रूप से बौद्धिक जीव हैं और उनमें मनुष्यों की भांति वासनाएं नहीं होतीं अतः उनके द्वारा ईश्वर के आदेशों का विरोध या अवहेलना संभव ही नहीं है।

    इन आयतों से हमने सीखा कि कुफ़्रयुक्त बातें सुनते समय हमें ईश्वर को हर प्रकार की कमी व त्रुटि से युक्त बताते हुए अपनी आस्था व्यक्त करनी चाहिए।

    मनुष्य की प्रतिष्ठा, ईश्वर के समक्ष नतमस्तक रहने और उसकी उपासना करने में है।

    आइये अब सूरए अम्बिया की 28वीं और 29वीं आयतों की तिलावत सुनें।

    يَعْلَمُ مَا بَيْنَ أَيْدِيهِمْ وَمَا خَلْفَهُمْ وَلَا يَشْفَعُونَ إِلَّا لِمَنِ ارْتَضَى وَهُمْ مِنْ خَشْيَتِهِ مُشْفِقُونَ (28) وَمَنْ يَقُلْ مِنْهُمْ إِنِّي إِلَهٌ مِنْ دُونِهِ فَذَلِكَ نَجْزِيهِ جَهَنَّمَ كَذَلِكَ نَجْزِي الظَّالِمِينَ (29)

    ईश्वर, फ़रिश्तों के भविष्य व अतीत को जानता है और वे ईश्वर की इच्छा के बिना किसी की सिफ़ारिश नहीं करते और वे उसके भय से डरते रहते हैं। (21:28) और उनमें से जो यह कहे कि ईश्वर को छोड़ कर मैं पूज्य हूँ, तो हम उसे बदले में नरक देंगे। (और) हम अत्याचारियों को ऐसा ही बदला दिया करते है। (21:29)

    पिछली आयतों में फ़रिश्तों के बारे में अनेकेश्वरवादियों की आस्थाओं का वर्णन करने के पश्चात इन आयतों में कहा गया है कि यद्यपि ईश्वर मनुष्यों सहित पूरी सृष्टि का संचालन फ़रिश्तों के माध्यम से करता है किंतु वे ईश्वरीय आदेश के अंतर्गत हैं और उसके आदेश का विरोध करने के विचार से भी भयभीत रहते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि ईश्वर अतीत व भविष्य में उनके सभी कर्मों से पूर्णतः अवगत है। वे ईश्वर की अनुमति के बिना न तो किसी को स्वर्ग में ले जा सकते हैं और न ही नरक की आग से मुक्ति दे सकते हैं।

    अनेकेश्वरवादियों की एक आस्था यह भी थी कि वे हर वस्तु के लिए एक ईश्वर के अस्तित्व को मानते थे, जैसे वर्षा का ईश्वर, सूर्य का ईश्वर तथा वे इन ईश्वरों को फ़रिश्ता समझते थे। आगे चलकर आयत इस ग़लत आस्था को नकारते हुए कहती है कि यदि फ़रिश्तों में से कोई इस प्रकार का दावा करे तो उसे कड़ा दंड मिलेगा तो तुम लोग किस प्रकार उन पर ऐसा आरोप लगाते हो?

    इन आयतों से हमने सीखा कि न केवल पैग़म्बर बल्कि फ़रिश्ते भी लोगों की सिफ़ारिश कर सकते हैं अलबत्ता केवल वही लोग उनकी सिफ़ारिश का पात्र बन सकते हैं जिनके धर्म, आस्था और कर्म से ईश्वर राज़ी हो।

    धर्म की संस्कृति में हर प्रकार की ग़लत आस्था का दावा करना या उसे स्वीकार करना, अत्याचार है। यह अत्याचार स्वयं पर भी होता है, ईश्वर पर होता है और मानव जाति के मार्गदर्शन के लिए आने वाले पैग़म्बरों पर भी होता है जिन्होंने इस मार्ग में अत्यधिक कठिनाइयां सहन की हैं।