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    सूरए अम्बिया, आयतें 30-33, (कार्यक्रम 574)

    सूरए अम्बिया, आयतें 30-33, (कार्यक्रम 574)
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    आइये पहले सूरए अम्बिया की 30वीं आयत की तिलावत सुनें।

    أَوَلَمْ يَرَ الَّذِينَ كَفَرُوا أَنَّ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ كَانَتَا رَتْقًا فَفَتَقْنَاهُمَا وَجَعَلْنَا مِنَ الْمَاءِ كُلَّ شَيْءٍ حَيٍّ أَفَلَا يُؤْمِنُونَ (30)

    क्या काफ़िरों ने नहीं देखा कि ये आकाश और धरती बन्द थे तो हमने उन्हें खोल दिया? और हमने पानी से हर जीवित चीज़ बनाई, तो क्या वे फिर भी ईमान नहीं लाते?(21:30)

    इससे पहले बताया गया कि यह बात बौद्धिक रूप से असंभव है कि संसार की सृष्टि व संचालन कई ईश्वरों के हाथ में हो। यह आयत और इसके बाद की आयतें सृष्टि की व्यवस्था में ईश्वर की युक्ति के कुछ चिन्हों की ओर संकेत करती हैं और पहले सृष्टि के आरंभ के संबंध में काफ़िरों का ध्यान आकृष्ट करते हुए कहती हैं कि क्या वे नहीं जानते कि आकाश और धरती एक दूसरे से जुड़े हुए थे और हमने उन्हें अलग किया?

    इस आयत में धरती व आकाश के जुड़े होने और फिर उन्हें अलग किए जाने की जो बात कही गई है उसके संबंध में क़ुरआने मजीद के व्याख्याकारों के कई दृष्टिकोण हैं जिनमें से दो का हम उल्लेख कर रहे हैं। एक विचार यह है कि संसार आरंभ में भाप का एक बड़ा भंडार था और उसके भीतर होने वाले विस्फोटों के कारण धीरे धीरे उसमें विभाजन होता गया और फिर सितारे, सौर्य मंडल तथा धरती इत्यादि अस्तित्व में आ गए।

    एक अन्य विचार यह है कि आरंभ में आकाश से वर्षा नहीं होती थी और धरती से पौधे नहीं उगते थे मानो दोनों बंद थे किंतु ईश्वर ने दोनों को खोल दिया। उसने आकाश से वर्षा भेजी और धरती से विभिन्न प्रकार के पौधों एवं वनस्पतियों को उगाया। पैगम़्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम तथा उनके परिजनों की ओर से इस संबंध में जो हदीसें हैं उनमें दूसरे विचार की ओर अधिक संकेत किया गया है क्योंकि यह बात आंखों से भी देखी जा सकती है कि किस प्रकार आकाश से पानी बरसता है और धरती से पौधे उगते हैं और इसी प्रकार यह बात आयत के अगले भाग से पूर्णतः समन्वित है जिसमें कहा गया है कि हमने हर जीवित वस्तु को पानी से पैदा किया है।

    इस आयत से हमने सीखा कि प्रकृति की व्यवस्था की पहचान, मनुष्य को ईश्वर की पहचान तथा उसके अनंत ज्ञान व शक्ति की पहचान तक पहुंचाती है।

    पानी, मनुष्य तथा सभी जीवों के जीवन का स्रोत है जो ईश्वरीय युक्ति द्वारा आकाश से धरती के सभी भागों तक पहुंचता है।

    आइये अब सूरए अम्बिया की 31वीं और 32वीं आयतों की तिलावत सुनें।

    وَجَعَلْنَا فِي الْأَرْضِ رَوَاسِيَ أَنْ تَمِيدَ بِهِمْ وَجَعَلْنَا فِيهَا فِجَاجًا سُبُلًا لَعَلَّهُمْ يَهْتَدُونَ (31) وَجَعَلْنَا السَّمَاءَ سَقْفًا مَحْفُوظًا وَهُمْ عَنْ آَيَاتِهَا مُعْرِضُونَ (32)

    और हमने धरती में अटल पहाड़ रख दिए ताकि कहीं वह उन्हें हिला कर न रख दे और हमने पहाड़ों में व्यापक मार्ग बना दिए ताकि उनके माध्यम से वे राह पाएँ। (21:31) और हमने आकाश को एक सुरक्षित छत बनाया किन्तु ये हैं कि उसकी निशानियों की ओर से मुंह मोड़ लेते हैं। (21:32)

    ये आयतें सृष्टि के संचालन व युक्ति में ईश्वर की कुछ अन्य निशानियों की ओर संकेत करती हैं। सबसे पहले पर्वतों के अस्तित्व के बारे में बात की गई है। पर्वत बड़ी सीमा तक धरती को भीषण कंपनों से, जो धरती के भीतर गैसों के दबाव के कारण अस्तित्व में आते हैं, सुरक्षित रखते हैं। यदि पहाड़ न होते तो धरती की सतह समतल होती और फिर बड़े बड़े बवंडर, बंजर क्षेत्र और शुष्क मरुस्थल अस्तित्व में आ जाते।

    आगे चलकर आयत कहती है कि अलबत्ता पर्वत इस प्रकार के नहीं हैं कि लोगों को धरती के एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने से रोक दें बल्कि इन बड़े बड़े पर्वतों के बीच विभिन्न प्रकार की घाटियां, दर्रे और मार्ग पाए जाते हैं ताकि यात्रियों को रास्ता मिल जाए और वे अपने गंतव्य तक पहुंच सकें।

    इसके बाद की आयत कहती है कि धरती के चारों ओर का वातावरण जिसे हम आकाश कहते हैं, यद्यपि गैसों से बना है किंतु एक अत्यंत मज़बूत एवं ठोस ढाल की भांति धरती को रात के समय उलकाओं की बमबारी से सुरक्षित रखता है जो गोलों और बमों की भांति ख़तरनाक होती हैं। धूप और सूरज का प्रकाश, जिसमें अनेक घातक किरणें होती हैं धरती के वातावरण के माध्यम से छन कर लोगों तक पहुंचता है और धरती का वातावरण इन किरणों के घातक तत्वों को धरती की सतह और लोगों तक नहीं पहुंचने देता।

    इन आयतों से हमने सीखा कि आकाश, धरती और पर्वतों की रचना संयोग नहीं है बल्कि ये ईश्वरीय युक्ति से अस्तित्व में आए हैं।

    यह बात किस प्रकार स्वीकार की जा सकती है कि तत्वदर्शी ईश्वर ने धरती को कंपन से रोकने के लिए बड़े बड़े पहाड़ बनाए हैं किंतु लोगों को लड़खड़ाने से रोकने के लिए धार्मिक एवं वैचारिक नेताओं का निर्धारण न किया है?

    आकाश और धरती के वातावरण की अन्य वस्तुएं ईश्वर की शक्ति व तत्वदर्शिता की निशानियां हैं किंतु मनुष्य इन निशानियों पर ध्यान देने के स्थान पर इनकी ओर से मुंह मोड़ लेता है।

    आइये अब सूरए अम्बिया की 33वीं आयत की तिलावत सुनें।

    وَهُوَ الَّذِي خَلَقَ اللَّيْلَ وَالنَّهَارَ وَالشَّمْسَ وَالْقَمَرَ كُلٌّ فِي فَلَكٍ يَسْبَحُونَ (33)

    और वही है जिसने रात, दिन, सूर्य और चन्द्रमा की रचना की। इनमें से प्रत्येक अपने-अपने कक्ष में तैर रहा है। (21:33)

    यह आयत कहती है कि रात-दिन का आना, सूर्य व चंद्रमा का उदय व अस्त होना और इसी प्रकार सूर्य, चंद्रमा तथा सितारों का अपने निर्धारित कक्ष में परिक्रमा करना यह सब सृष्टि के संबंध में ईश्वर की व्यापक युक्ति के चिन्ह हैं। मनुष्य प्रतिदिन इन आश्चर्यजनक वस्तुओं को देखता है और इनसे लाभान्वित भी होता है किंतु इनके संचालक और युक्तिकर्ता की ओर से निश्चेत रहता है।

    इस आयत से हमने सीखा कि रात और दिन, ईश्वर की दो बड़ी अनुकंपाएं हैं और यदि मनुष्य केवल यह सोच ले कि इनमें से कोई भी एक समाप्त हो जाए तो फिर इनका महत्व वह बेहतर ढंग से समझ सकेगा।

    पूरे वर्ष सूर्य एवं चंद्रमा के उदय व अस्त होने का सटीक कार्यक्रम, ईश्वरीय सृष्टि में आश्चर्यजनक व्यवस्था एवं युक्ति का सूचक है किंतु बहुत से लोग सूर्योदय व सूर्यास्त के सुंदर दृश्य को देखने के बावजूद उसके रचयिता की महानता के समक्ष शीश नवाने के लिए तैयार नहीं होते।