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    सूरए अम्बिया, आयतें 34-37, (कार्यक्रम 575)

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    आइये पहले सूरए अम्बिया की 34वीं और 35वीं आयतों की तिलावत सुनें।

    وَمَا جَعَلْنَا لِبَشَرٍ مِنْ قَبْلِكَ الْخُلْدَ أَفَإِنْ مِتَّ فَهُمُ الْخَالِدُونَ (34) كُلُّ نَفْسٍ ذَائِقَةُ الْمَوْتِ وَنَبْلُوكُمْ بِالشَّرِّ وَالْخَيْرِ فِتْنَةً وَإِلَيْنَا تُرْجَعُونَ (35)

    और (हे पैग़म्बर!) हमने आपसे पहले भी किसी मनुष्य के लिए अमर जीवन नहीं रखा है। तो क्या यदि आप मर गए तो वे सदैव रहने वाले हैं? (21:34) हर जीव मृत्यु का स्वाद चखने वाला है और हम बुराई और अच्छाई के माध्यम से तुम्हारी परीक्षा लेते हैं। और अन्ततः तुम्हें लौटकर हमारी ही ओर आना है। (21:35)

    इससे पहले बताया गया कि इस सूरे की आयतें ईश्वर और उसके पैग़म्बरों के बारे में अनेकेश्वरवादियों के निराधार संदेहों और अनुचित अपेक्षाओं का उत्तर देती हैं। अनेकेश्वरवादियों की एक आशा यह थी कि पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम का शीघ्र ही देहांत हो जाएगा और फिर कोई उनकी मूर्तियों और हाथों के बनाए हुए देवताओं के बारे में कुछ नहीं कहेगा और परिणाम स्वरूप उन्हें पैग़म्बर से मुक्ति मिल जाएगी।

    ये आयतें उनके उत्तर में कहती हैं कि यह मत सोचो कि पैग़म्बर चले जाएंगे और तुम लोग रह जाओगे। ईश्वर के पैग़म्बरों सहित सभी लोगों को मरना है और कोई भी इस नश्वर संसार में सदा बाक़ी रहने वाला नहीं है। इसी प्रकार तुम यह भी मत सोचो कि उनके चले जाने से उनका धर्म भी मिट जाएगा। जैसा कि हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम इस संसार से चले गए किंतु उनके द्वारा आरंभ किया गया हज का संस्कार हज़ारों वर्षों के बाद भी बाक़ी है और तुम अनेकेश्वरवादी भी, कुछ अंधविश्वासों के साथ ही सही, यह संस्कार अंजाम देते हो।

    इस आधार पर सांसारिक जीवन सभी मनुष्यों के लिए सीमित है और इस बीच वास्तविक विजय उसी को प्राप्त होती है जो जीवन के उतार-चढ़ाव और कटु व मधुर घटनाओं से, जो लोगों की परीक्षा का साधन हैं, सफलतापूर्वक बाहर निकल आए क्योंकि सभी को ईश्वर की ओर लौटना है जहां उन्हें अपने कर्मों का फल देखने को मिलेगा।

    इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वर की एक परंपरा, जन्म से मृत्यु के बीच मनुष्य के जीवन को सीमित रखना है।

    जीवन की कटु घटनाएं और दरिद्रता भी परीक्षा का साधन है और मधुर घटनाएं एवं धन संपन्नता भी परीक्षा का माध्यम है। दरिद्र व धन संपन्न तथा दुर्बल व मज़बूत हर व्यक्ति की परीक्षा होती है।

    मृत्यु, मनुष्य के जीवन का अंत नहीं है बल्कि यह एक अन्य संसार में प्रवेश का चरण है जिसमें हमें ईश्वर के समक्ष उपस्थित होना है।

    आइये अब सूरए अम्बिया की 36वीं आयत की तिलावत सुनें।

    وَإِذَا رَآَكَ الَّذِينَ كَفَرُوا إِنْ يَتَّخِذُونَكَ إِلَّا هُزُوًا أَهَذَا الَّذِي يَذْكُرُ آَلِهَتَكُمْ وَهُمْ بِذِكْرِ الرَّحْمَنِ هُمْ كَافِرُونَ (36)

    और (हे पैग़म्बर!) जब काफ़िर आपको देखते हैं तो आपका परिहास करते हैं। (वे कहते हैं) क्या यही वह व्यक्ति है जो तुम्हारे पूज्यों की (बुराई के साथ) चर्चा करता है? जबकि स्वयं वे दयावान (ईश्वर) की याद से इन्कार करते हैं। (21:36)

    यह आयत पैग़म्बरे इस्लाम के संबंध में अनेकेश्वरवादियों के व्यवहार की ओर संकेत करते हुए कहती है कि उनका काम केवल पैग़म्बर और उनके कथनों का मज़ाक़ उड़ाना है क्योंकि उनके पास अपने अनेकेश्वरवाद और मूर्तिपूजा के लिए कोई बौद्धिक तर्क नहीं है। उन्हें इस बात से चिढ़ है कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम मूर्तियों को विवेकहीन कहते हैं और उपासना योग्य नहीं समझते तथा इस संबंध में लोगों का मार्गदर्शन करते रहते हैं।

    आगे चलकर आयत कहती है कि अनेकेश्वरवादी ईश्वर के पैग़म्बर का तो इन्कार करते हैं किंतु इस बात के लिए तैयार नहीं हैं कि उनके पालनहार ने अपनी दया व कृपा से उन्हें जो अनुकंपाएं प्रदान की हैं उन्हें याद करके ईश्वर के प्रति आभार प्रकट करें और उसकी उपासना करें।

    इस आयत से हमने सीखा कि पैग़म्बरों के विरोधियों का तर्क परिहास व उपहास के अतिरिक्त कुछ नहीं है तथा उनके दावों का कोई वैज्ञानिक एवं तर्कसंगत आधार नहीं होता।

    काफ़िरों के निकट, महान ईश्वर के इन्कार में कोई बुराई नहीं है किंतु पत्थर व लकड़ी की बनी प्रतिमाओं का अनादर उनके लिए सहनीय नहीं है।

    आइये अब सूरए अम्बिया की 37वीं आयत की तिलावत सुनें।

    خُلِقَ الْإِنْسَانُ مِنْ عَجَلٍ سَأُرِيكُمْ آَيَاتِي فَلَا تَسْتَعْجِلُونِ (37)

    मनुष्य उतावलेपन से पैदा किया गया है। मैं तुम्हें शीघ्र ही अपनी निशानियाँ दिखाऊंगा तो इसके लिए जल्दबाज़ी न करो। (21:37)

    यह आयत कार्यों में जल्दबाज़ी करने संबंधी मुनष्य की एक विशेषता की ओर संकते करते हुए कहती है कि मनुष्य इतना उतावला है कि मानो उसे उतावलेपन में ही पैदा किया गया है और उसका आधार ही जल्दबाज़ी पर रखा गया है। निश्चित रूप से भले कर्मों में जल्दबाज़ी अच्छी बात है किंतु बुरे कार्य और पाप करने में उतावलेपन का क्या कारण हो सकता है?

    जब काफ़िरों से कहा जाता था कि पाप न करो अन्यथा ईश्वरीय दंड तुम्हें आ लेगा तो वे कहते थे कि यह दंड जल्दी क्यों नहीं आ जाता। ईश्वर कहता है कि यदि उन्हें दंड में ग्रस्त होने में जल्दी है तो हमें दंड भेजने में कोई जल्दी नहीं है क्योंकि वे हमारे हाथ से निकल कर कहीं जाने वाले नहीं हैं और अंततः उन्हें दंड की निशानियां देखनी ही होंगी।

    इस आयत से हमने सीखा कि किसी भी कार्य में जल्दबाज़ी अच्छी नहीं होती सिवाय यह कि उसके लिए कोई बौद्धिक या धार्मिक तर्क पाया जाता हो।

    जल्दबाज़ी को भी अन्य बातों की भांति नियंत्रित किया जा सकता है और यही कारण है कि ईश्वर आदेश देता है कि अकारण उतावलापन न दिखाओ।