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    सूरए अम्बिया, आयतें 38-41, (कार्यक्रम 576)

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    आइये पहले सूरए अम्बिया की 38वीं और 39वीं आयतों की तिलावत सुनें।

    وَيَقُولُونَ مَتَى هَذَا الْوَعْدُ إِنْ كُنْتُمْ صَادِقِينَ (38) لَوْ يَعْلَمُ الَّذِينَ كَفَرُوا حِينَ لَا يَكُفُّونَ عَنْ وُجُوهِهِمُ النَّارَ وَلَا عَنْ ظُهُورِهِمْ وَلَا هُمْ يُنْصَرُونَ (39)

    और काफ़िर कहते हैं कि यदि तुम सच्चे हो तो (प्रलय का) यह वादा कब पूरा होगा? (21:38) यदि काफ़िरों को ज्ञात होता कि प्रलय में वे आग को न तो अपने चहरों से रोक सकेंगे और न ही अपनी पीठों से और न उनकी कोई सहायता की जाएगी (तो वे प्रलय के दंड की जल्दी न मचाते।) (21:39)

    इससे पहले बताया गया कि ईश्वर पर ईमान लाने हेतु निमंत्रण दिए जाने पर बहुत से काफ़िर कहते थे कि हम ईमान नहीं लाएंगे और यदि तुम्हारा ईश्वर हमें दंडित करना चाहता है तो वह अपना दंड शीघ्र ही क्यों नहीं भेज देता? ये आयतें भी इसी विषय को आगे बढ़ाते हुए कहती हैं कि प्रलय का इन्कार करने वाले, उसके आने के समय के बारे में प्रश्न करते हैं और इसे अपने दावे में ईमान वालों के सच्चे होने की शर्त बताते हैं जबकि किसी घटना के घटित होने के समय का न जानना, उसके घटित न होने का तर्क नहीं हो सकता। विशेष कर इस लिए कि विभिन्न बौद्धिक तर्क प्रलय आने की आवश्यकता की पुष्टि करते हैं और सभी पैग़म्बरों ने, जो अपने अपने काल में सच्चाई के प्रतीक थे, प्रलय के आने की सूचना दी है।

    प्रलय का इन्कार करने वालों के उत्तर में ईश्वर कहता है कि जो लोग बुद्धि और तर्क को स्वीकार नहीं करते वे केवल उसी समय उसे मानेंगे जब नरक की आग उन्हें अपने घेरे में ले लेगी और वे उसका आभास अपने चेहरे पर करेंगे किंतु उस समय देर हो चुकी होगी और उन्हें उसका कोई लाभ नहीं होगा तथा कोई भी उन्हें नरक से मुक्ति नहीं दिला सकेगा।

    इन आयतों से हमने सीखा कि काफ़िर स्वयं को सच्चा और ईमान वालों को झूठा कहते हैं तथा यह समझते हैं कि जो कोई प्रलय के बारे में बात करता है वह बहुत बड़ा झूठ कहता है।

    प्रलय का इन्कार, वास्तविकता के संबंध में अनभिज्ञता के कारण होता है और सभी पैग़म्बर तथा आसमानी किताबें लोक-परलोक की सच्चाई के वर्णन के प्रयास में हैं किंतु अधिकांश लोग उसे स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होते।

    आइये अब सूरए अम्बिया की 40वीं आयत की तिलावत सुनें।

    بَلْ تَأْتِيهِمْ بَغْتَةً فَتَبْهَتُهُمْ فَلَا يَسْتَطِيعُونَ رَدَّهَا وَلَا هُمْ يُنْظَرُونَ (40)

    बल्कि (प्रलय का) वह दिन (और उसका दंड) सहसा ही उनपर आ पड़ेगा और उन्हें स्तब्ध कर देगा। फिर न तो वे उसे लौटा सकेंगे और न ही उन्हें मोहलत मिलेगी। (21:40)

    पिछली आयतों में नरकवासियों के आग में घिर जाने की ओर संकेत करने के बाद इस आयत में कहा गया है कि प्रलय की सभी बातें जो मृत्यु से आरंभ होती हैं, आकस्मिक होती हैं। किसी को भी अपने मरने के समय का ज्ञान नहीं है और मौत अचानक ही आती है।

    बरज़ख़ अर्थात मृत्यु के बाद और प्रलय से पहले के दंड और उसके बाद प्रलय में कर्मों के हिसाब-किताब के बाद के दंड की, जो काफ़िरों और अत्यचारियों को अपने घेरे में ले लेगा, समय की दृष्टि से किसी प्रकार की कोई भविष्यवाणी नहीं की जा सकती और अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि न तो इस दंड को रोका जा सकता है और न ही टाला जा सकता है किंतु इन सबके बावजूद अपराधी, ईश्वरीय दंड की ओर तनिक भी ध्यान नहीं देते।

    इस आयत से हमने सीखा कि काफ़िरों को मोहलत देना इस संसार में ईश्वर की परंपरा है किंतु प्रलय में उन्हें किसी भी प्रकार का समय या मोहलत नहीं दी जाएगी।

    जो लोग आज स्वयं को बुद्धिमान और बुद्धिजीवी समझते हैं और साथ ही धर्म को स्वीकार नहीं करते वे प्रलय के चिन्हों को देख कर स्तब्ध रह जाएंगे और उनकी बुद्धि काम करना छोड़ देगी।

    आइये अब सूरए अम्बिया की 41वीं आयत की तिलावत सुनें।

    وَلَقَدِ اسْتُهْزِئَ بِرُسُلٍ مِنْ قَبْلِكَ فَحَاقَ بِالَّذِينَ سَخِرُوا مِنْهُمْ مَا كَانُوا بِهِ يَسْتَهْزِئُونَ (41)

    (हे पैग़म्बर!) आपसे पहले (वाले) पैग़म्बरों का भी परिहास कि जा चुका है किन्तु उनमें से जिन लोगों ने उनका परिहास किया था उन्हें उसी चीज़ ने आ घेरा जिसका वे परिहास करते थे। (21:41)

    यह आयत पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को सांत्वना देती है कि यदि मक्के के अनेकेश्वरवादी आपकी बातों और वादों का परिहास करते हैं तो आप दुखी न हों क्योंकि आपसे पहले वाले पैग़म्बरों को भी इसी प्रकार के लोगों का सामना करना पड़ा था और उनका भी सदैव उपहास किया जाता था किंतु इस प्रकार के अज्ञानतापूर्ण व्यवहार से उन्हें कोई लाभ नहीं हुआ और इसी संसार में या मृत्यु के पश्चात वे ईश्वरीय दंड में ग्रस्त हुए।

    महत्वपूर्ण विषय पिछले पैग़म्बरों द्वारा अपने मार्ग पर डटे रहना और धर्म के प्रति कटिबद्धता है। उन्होंने विरोधियों द्वारा अपना मज़ाक़ उड़ाए जाने के कारण कदापि अपने विचारों और मार्ग को नहीं छोड़ा तथा सत्य बात कहते ही रहे। यह बात उनके अनुयाइयों के लिए आदर्श होनी चाहिए।

    इस आयत से हमने सीखा कि जो लोग तर्कहीन प्रवृत्ति के होते हैं वे पैग़म्बरों के तर्कसंगत निमंत्रण के मुक़ाबले में अपमान और परिहास की शैली अपनाते हैं। आज भी लिखने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बहाने कार्टून व फ़िल्में बना कर या तथाकथित कलात्मक शैलियों के माध्यम से आसमानी धर्मों की मान्यताओं का परिहास किया जाता है।

    पिछले पैग़म्बरों के इतिहास की जानकारी उनके सच्चे अनुयाइयों के लिए मार्ग की कठिनाइयों को सरल बना देती है।