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    सूरए अम्बिया, आयतें 42-45, (कार्यक्रम 577)

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    आइये पहले सूरए अम्बिया की 42वीं और 43वीं आयतों की तिलावत सुनें।

    قُلْ مَنْ يَكْلَؤُكُمْ بِاللَّيْلِ وَالنَّهَارِ مِنَ الرَّحْمَنِ بَلْ هُمْ عَنْ ذِكْرِ رَبِّهِمْ مُعْرِضُونَ (42) أَمْ لَهُمْ آَلِهَةٌ تَمْنَعُهُمْ مِنْ دُونِنَا لَا يَسْتَطِيعُونَ نَصْرَ أَنْفُسِهِمْ وَلَا هُمْ مِنَّا يُصْحَبُونَ (43)

    और (हे पैग़म्बर! ईश्वर का इन्कार करने वालों से) कह दीजिए कि दयावान (ईश्वर के दंड) के मुक़ाबले में कौन रात-दिन तुम्हारी रक्षा करेगा? बल्कि बात यह है कि वे अपने पालनहार की याद से मुंह मोड़ रहे हैं। (21:42) या हमसे हटकर उनके और भी पूज्य हैं जो उन्हें (हमारे दंड से) बचा लेंगे? वे तो स्वयं अपनी ही सहायता नहीं कर सकते हैं और न हमारे मुक़ाबले में उनका कोई साथ ही दे सकता है। (21:43)

    इससे पहले बताया गया कि काफ़िर व अनेकेश्वरवादी, जो प्रलय का इन्कार करते थे, सदैव स्वर्ग व नरक के बारे में मुसलमानों की आस्थाओं का परिहास करते थे और उन्हें अंधविश्वास समझते थे। इसी कारण ईश्वर मुसलमानों से कहता है कि विरोधियों के इस प्रकर के व्यवहार से दुखी न हों और अपने ईमान को कमज़ोर न होने दें कि प्रलय में वे दंड में ग्रस्त होंगे।

    ये आयतें कहती हैं कि न केवल प्रलय में बल्कि इस संसार में भी वे ईश्वरीय दंड से सुरक्षित नहीं हैं और ईश्वर जिस क्षण भी चाहे उन्हें दंडित कर सकता है और उनके तथाकथित और काल्पनिक पूज्य, जिन पर उन्हें बहुत अधिक भरोसा है, ईश्वरीय दंड को उनसे दूर नहीं कर सकते।

    रोचक बात यह है कि इन आयतों में अल्लाह शब्द के स्थान पर रहमान अर्थात दयावान शब्द का प्रयोग किया गया है, मानो क़ुरआने मजीद यह कहना चाहता है तुम काफ़िरों के कार्य ने ईश्वर तक को, जो प्रेम व दया का प्रतीक है, क्रोधित कर दिया है और तुम लोगों ने अपने कर्मों से स्वयं को उसके कोप का पात्र बना लिया है।

    इन आयतों से हमने सीखा कि यदि मनुष्य ईश्वर की याद से मुंह मोड़ ले तो वह ईश्वरीय दया को स्वयं से दूर करके अपने आपको उसके दंड का पात्र बना लेता है।

    ईश्वर के अतिरिक्त कोई भी व्यक्ति या वस्तु, स्वयं अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करने की क्षमता नहीं रखती, दूसरों की सहायता करने की तो बात ही अलग है।

    आइये अब सूरए अम्बिया की 44वीं आयत की तिलावत सुनें।

    بَلْ مَتَّعْنَا هَؤُلَاءِ وَآَبَاءَهُمْ حَتَّى طَالَ عَلَيْهِمُ الْعُمُرُ أَفَلَا يَرَوْنَ أَنَّا نَأْتِي الْأَرْضَ نَنْقُصُهَا مِنْ أَطْرَافِهَا أَفَهُمُ الْغَالِبُونَ (44)

    बल्किबात यह है कि हमने उन्हें और उनके पूर्वजों को (सांसारिक) संपन्नता प्रदान की, यहाँतक कि (इसी दशा में) उनकी एक लम्बी आयु गुज़र गई, (और उन्होंने सोचा की यह संपन्नता और उनकी आयु समाप्त नहीं होगी) तो क्या वे देखते नहींकि हम इस धरती की ओर बढ़ रहे हैं और (मृत्यु के माध्यम से) इसके चारों ओर को कम कर रहे हैं? तो क्या वेहम पर विजयी रहेंगे? (21:44)

    पिछली आयतों में ईश्वरीय दंड से काफ़िरों के सुरक्षित न रहने की बात कही गई थी। यह आयत कहती है कि ये लोग मृत्यु को रोकने की क्षमता नहीं रखते जो इस धरती के सभी लोगों और सभी समुदायों के लिए ईश्वर का अटल क़ानून है किंतु शारीरिक शक्ति एवं स्वास्थ्य के कारण वे घमंड और निश्चेतना में ग्रस्त हो गए हैं और सोचते हैं कि वे ईश्वरीय परंपरा पर विजयी हो गए हैं तथा उनसे बड़ी कोई शक्ति है ही नहीं।

    क्या वे नहीं देखते कि पिछली जातियां और समुदाय जो उनसे अधिक शक्तिशाली थे और धरती पर शासन किया करते थे सबके सब इस संसार से चले गए? तो फिर ईश्वर प्रभुत्वशाली है या वे लोग?

    इस आयत से हमने सीखा कि काफ़िरों का भौतिक अनुकंपाओं से लाभान्वित होना, उन पर ईश्वर की कृपा का चिन्ह नहीं है। ईश्वर, संसार की हर वस्तु को अपनी अनुकंपाओं से लाभान्वित करता है और इसमें काफ़िर और ईमान वाले के बीच कोई अंतर नहीं है।

    अतीत के लोगों के इतिहास का अध्ययन, आगामी पीढ़ियों के लिए पाठ सामग्री है इस नश्वर संसार पर मोहित नहीं होना चाहिए और ब्रह्मांड के रचयिता और पालनहार के आदेशों की अवहेलना से बचना चाहिए।

    आइये अब सूरए अम्बिया की 45वीं आयत की तिलावत सुनें।

    قُلْ إِنَّمَا أُنْذِرُكُمْ بِالْوَحْيِ وَلَا يَسْمَعُ الصُّمُّ الدُّعَاءَ إِذَا مَا يُنْذَرُونَ (45)

    (हे पैग़म्बर!) कह दीजिए कि मैं तो बस ईश्वरीय संदेश वहि के आधार पर तुम्हें सावधान करता हूँ। किन्तु जो बहरे होते हैं उन्हें जब सावधान किया जाता है तो वे बात को नहीं सुनते। (21:45)

    यह आयत विरोधियों की निश्चेतना व घमंड के मूल कारण की ओर संकेत करते हुए पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को संबोधित करती है और कहती है कि जो कुछ आप कहते हैं वह ईश्वरीय संदेश है जिसमें उन्हें उनके कर्मों के अंजाम के प्रति चेतावनी दी जाती है ताकि वे सचेत हो जाएं और ईश्वरीय परंपरा के समक्ष सिर झुका दें किंतु क्या किया जाए कि बहरे लोग चेतावनियों को नहीं सुनते और ख़तरे का आभास नहीं करते।

    स्पष्ट है कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के विरोधी बहरे नहीं थे और उनकी बातों को सुनते थे अतः क़ुरआने मजीद की इस आयत और इसी जैसी अन्य आयतों का तात्पर्य यह है कि कुछ लोग सत्य बात के मुक़ाबले में इतने तटस्थ रहते हैं कि उनमें और बहरे लोगों में कोई अंतर नहीं होता, मानो उन्होंने कुछ सुना ही नहीं है।

    बुद्धिमान व्यक्ति अपने बारे में सचेत करने वाले व्यक्ति की बात सुनते ही उस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करता है और अपनी रक्षा के लिए आवश्यक क़दम उठाता है किंतु ये काफ़िर अपने बुरे कर्मों के बारे में पैग़म्बरों की इतनी अधिक चेतावनियों के बावजूद, न केवल उन कर्मों को नहीं छोड़ते बल्कि उन पर आग्रह भी करते हैं।

    इस आयत से हमने सीखा कि पैग़म्बरों की बातें और उनका निमंत्रण, उनके अपने विचारों व आस्थाओं के आधार पर नहीं बल्कि ईश्वरीय संदेश के आधार पर होता है।

    जिसके कान और आंखें हों किंतु वह वास्तविकताओं को देखने, सुनने या स्वीकार करने के लिए तैयार न हो तो वह वास्तव में बहरा भी है और अंधा भी।