islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. सूरए अम्बिया, आयतें 46-50, (कार्यक्रम 578)

    सूरए अम्बिया, आयतें 46-50, (कार्यक्रम 578)

    सूरए अम्बिया, आयतें 46-50, (कार्यक्रम 578)
    Rate this post

    आइये पहले सूरए अम्बिया की 46वीं और 47वीं आयतों की तिलावत सुनें।

    وَلَئِنْ مَسَّتْهُمْ نَفْحَةٌ مِنْ عَذَابِ رَبِّكَ لَيَقُولُنَّ يَاوَيْلَنَا إِنَّا كُنَّا ظَالِمِينَ (46) وَنَضَعُ الْمَوَازِينَ الْقِسْطَ لِيَوْمِ الْقِيَامَةِ فَلَا تُظْلَمُ نَفْسٌ شَيْئًا وَإِنْ كَانَ مِثْقَالَ حَبَّةٍ مِنْ خَرْدَلٍ أَتَيْنَا بِهَا وَكَفَى بِنَا حَاسِبِينَ (47)

    और यदि तुम्हारे पालनहार के दंड का कोई झोंका भी उन्हें छू जाए तो निश्चित रूप से वे कहेंगे कि हाय!हमारा दुर्भाग्य! कि निश्चय ही हम अत्याचारी थे। (21:46) औरहम प्रलय के दिन न्याय की तुलाएं स्थापित करेंगे तो किसी व्यक्ति पर कोई भी अत्याचार न होगा। चाहे उसका कर्म राई के दाने के बराबर होगा तो हम उसे (हिसाब के लिए) उपस्थित कर देंगे। और हिसाब करने के लिए हम पर्याप्त हैं। (21:47) इससे पहले बताया गया कि प्रलय का इन्कार करने वाले लोग घमंड और निश्चेतना में ग्रस्त हैं, वे न तो मृत्यु को देखते हैं और न ही पैग़म्बरों की बातों को सुनते हैं। ये आयतें कहती हैं कि यदि संसार में ईश्वरीय दंड मात्र उन्हें छू भी जाए तो वे निश्चेतना की निद्रा से जाग जाएंगे और अपनी उद्दंडता व पापों को स्वीकार कर लेंगे किंतु ईश्वरीय पैग़म्बरों की सच्ची और तर्कसंगत बातें उन पर प्रभाव नहीं डालतीं और वे पाठ नहीं सीखते। अलबत्ता यह बातें संसार से संबंधित हैं और प्रलय में हर किसी को अपने कर्मों के अनुसार बदला दिया जाएगा। प्रलय का न्यायालय ऐसा होगा जिसमें मनुष्य के कण बराबर के कर्म भी दर्ज होंगे और किसी भी कर्म को बिना हिसाब के नहीं छोड़ा जाएगा। अब प्रश्न यह है कि प्रलय में मनुष्यों के कर्मों का किस माध्यम से हिसाब किया जाएगा और उसकी तुला क्या होगी? पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के कथनों में आया है कि पैग़म्बरों, इमामों तथा ईश्वर के प्रिय बंदों को, जो परिपूर्ण मनुष्य हैं, अन्य लोगों के कर्मों का मानदंड बनाया जाएगा और उनके कर्मों की तुला में अन्य लोगों के कर्मों को तौला जाएगा। इन आयतों से हमने सीखा कि संसार में ईश्वरीय दंड मनुष्य को अपने पाप को स्वीकार करने और क्षमा मांगने पर विवश कर देता है किंतु यदि हम ध्यान न रखें तो पुनः घमंड और निश्चेतना में ग्रस्त हो जाते हैं और हमारे पापों का बोझ भारी होने लगता है। ईश्वर, ज्ञानी भी है और न्याय करने वाला भी है अतः कोई भी कर्म उसके संपूर्ण ज्ञान से छिपा नहीं रह सकता और प्रलय में वह अपने न्याय के आधार पर सभी को बदला देगा। आइये अब सूरए अम्बिया की 48वीं और 49वीं आयतों की तिलावत सुनें।

    وَلَقَدْ آَتَيْنَا مُوسَى وَهَارُونَ الْفُرْقَانَ وَضِيَاءً وَذِكْرًا لِلْمُتَّقِينَ (48) الَّذِينَ يَخْشَوْنَ رَبَّهُمْ بِالْغَيْبِ وَهُمْ مِنَ السَّاعَةِ مُشْفِقُونَ (49)

    और निश्चित रूप से हमने मूसा और हारून को (सत्य व असत्य के बीच) अंतर करने वाली (ऐसी किताब) प्रदान की जो ईश्वर से डरने वालों के लिए प्रकाश तथा उसकी याद (का साधन) थी। (21:48) (ईश्वर से डरने वाले वे लोग हैं) जो एकांत में भी अपने पालनहार से डरते है और प्रलय का भय रखते हैं। (21:49) पिछली आयतों में एकेश्वरवाद और प्रलय के बारे में कुछ बातों का वर्णन करने के पश्चात क़ुरआने मजीद इस आयत के बाद की कुछ आयतों में कुछ ईश्वरीय पैग़म्बरों के जीवन के बारे में संक्षेप में उल्लेख करता है। इन आयतों में ईश्वरीय किताब तौरैत की ओर संकेत किया गया है जिसे हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को प्रदान किया गया था। क़ुरआने मजीद सहित सभी ईश्वरीय किताबों की तीन प्रमुख विशेषताएं हैं। प्रथम यह कि वे सत्य और असत्य के बीच अंतर करने वाली होती हैं और ईश्वर तक पहुंचने के मार्ग को अन्य सभी मार्गों से अलग करती हैं। दूसरे यह कि जब मार्ग स्पष्ट हो जाता है तो सही मार्ग पर चलने के लिए प्रकाश की आवश्यकता होती है, ईश्वरीय किताबें वस्तुतः सत्य के मार्ग का प्रकाश होती हैं। तीसरे यह कि जो लोग सही मार्ग पर होते हैं और ईश्वरीय प्रकाश के सहारे आगे बढ़ रहे होते हैं वे भी कभी कभी निश्चेतना का शिकार हो कर लड़खड़ा सकते हैं, ईश्वरीय किताबें इस प्रकार के लोगों को सचेत करती रहती हैं। आगे चलकर आयतें ईश्वर से डरने वालों की विशेषताओं का उल्लेख करते हुए कहती हैं कि ईश्वर के प्रति उनका ईमान इतना सुदृढ़ है कि वे एकांत में भी किसी प्रकार का कोई पाप नहीं करते बल्कि हर प्रकार के अप्रिय व्यवहार से दूर रहते हैं क्योंकि उन्हें प्रलय में अपने कर्मों की ओर से भय सताता रहता है। इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वरीय किताब और ईश्वरीय पंथ वाले पैग़म्बर सीमित रहे हैं और अन्य पैग़म्बर उन्हीं के पंथ और किताब के प्रचारक रहे हैं जिस प्रकार से कि हज़रत हारून अलैहिस्सलाम, लोगों तक तौरैत की शिक्षाओं को पहुंचाते थे। लोगों के बीच अपने व्यवहार को नियंत्रित रखना, ईश्वर से वास्तविक भय का प्रमाण नहीं है क्योंकि बहुत से ऐसे लोग होते हैं जो लज्जा और लोगों के बीच अपने सम्मान की रक्षा के कारण सबके सामने अपने व्यवहार को नियंत्रित रखते हैं। वस्तुतः ईश्वर से सच्चे भय का चिन्ह, एकांत में भी उससे डरना है जहां उसे ईश्वर के अतिरिक्त कोई अन्य नहीं देख रहा होता है। आइये अब सूरए अम्बिया की 50वीं आयत की तिलावत सुनें।

    وَهَذَا ذِكْرٌ مُبَارَكٌ أَنْزَلْنَاهُ أَفَأَنْتُمْ لَهُ مُنْكِرُونَ (50)

    और यह (क़ुरआन) अनुग्रह वाला उपदेश है जिसे हमने (तुम्हारे मार्गदर्शन के लिए) भेजा है। तो क्या तुम इसका इन्कार करने वाले हो? (21:50) ईश्वरीय किताबों की सबसे बड़ी विशेषता उनका लोगों के लिए उपदेश होना और उन बातों को याद दिलाना है जिन्हें ईश्वर ने सभी मनुष्यों की पवित्र प्रवृ   त्ति में रखा है और आंतरिक इच्छाओं के कारण मनुष्य उन्हें भूल कर उनकी ओर से निश्चेत हो जाता है। ईश्वरीय पैग़म्बर भी इसी लिए समाज में आए हैं और उन्होंने अपनी सचेत करने वाली शिक्षाओं से लोगों को निश्चेतना की नींद से जगाने का प्रयास किया है। ईश्वरीय पैग़म्बरों को इस लिए भेजा गया है ताकि वे समाज में भलाइयों व सदकर्मों को प्रचलित करें जिन्हें सभी लोग पसंद करते हैं और इसी प्रकार बुराइयों को रोकें जिनसे हर मनुष्य की प्रवृत्ति घृणा करती है। इसके बावजूद बहुत से लोग कुफ़्र एवं हठधर्म के कारण पैग़म्बरों का इन्कार करते हैं और सत्य बात को स्वीकार नहीं करते। इस आयत से हमने सीखा कि यदि क़ुरआने मजीद की तिलावत के समय हम उससे शिक्षा लेने का इरादा रखते हों तो यह ईश्वरीय किताब हमारे लिए लाभदायक सिद्ध होगी। ईश्वरीय किताबों और पैग़म्बरों का इन्कार वस्तुतः एक ऐसी दवा लेने से इन्कार है जिसे मनुष्यों से प्रेम करने वाले उपचारकों ने घमंड, स्वार्थ व निश्चेतना जैसे लोगों के मानसिक रोगों के उपचार के लिए प्रस्तुत किया है।