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    सूरए अम्बिया, आयतें 51-56, (कार्यक्रम 579)

    सूरए अम्बिया, आयतें 51-56, (कार्यक्रम 579)
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    आइये पहले सूरए अम्बिया की 51वीं और 52वीं आयतों की तिलावत सुनें।

     وَلَقَدْ آَتَيْنَا إِبْرَاهِيمَ رُشْدَهُ مِنْ قَبْلُ وَكُنَّا بِهِ عَالِمِينَ (51) إِذْ قَالَ لِأَبِيهِ وَقَوْمِهِ مَا هَذِهِ التَّمَاثِيلُ الَّتِي أَنْتُمْ لَهَا عَاكِفُونَ (52)

    और इससे पहले हमने इब्राहीम को बौद्धिक प्रगति प्रदान कर दी थी और हम उन (की योग्यताओं) को भली-भाँति जानते थे। (21:51) जब उन्होंने अपने बाप और अपनी जाति (के लोगों) से कहा कि ये मूर्तियाँ क्या हैं जिन (की उपासना) पर तुम जमे हुए हो। (21:52)

    इससे पहले बताया गया कि इस सूरे में सोलह ईश्वरीय पैग़म्बरों के जीवन की ओर संकेत किया गया है। इन पैग़म्बरों में हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम का विशेष स्थान है और उनके तथा मूर्तिपूजा करने वालों के बीच होने वाली बात चीत इस सूरे की कई आयतों में मौजूद है।

    इन आयतों के आरंभ में कहा गया है कि ईश्वर, पैग़म्बरी का दायित्व संभालने हेतु हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की योग्यता व क्षमता से अवगत था अतः उसने उनकी बौद्धिक प्रगति एवं विकास के साधन उन्हें उपलब्ध कराए। उनकी योग्यता का चिन्ह यह था कि उन्होंने किशोरावस्था में ही अपनी जाति के लोगों से कहा कि वे क्यों निर्जीव मूर्तियों की पूजा करते हैं और रात दिन उनके समक्ष झुके रहते हैं?

    स्पष्ट है कि वही व्यक्ति बड़ा हो कर ईश्वरीय पैग़म्बरी का भारी दायित्व उठा सकता है और लोगों को अनेकेश्वरवाद एवं अंधविश्वास से मुक्ति दिलाने के लिए खड़ा हो सकता है जो किशोरावस्था में भी अपनी जाति के बड़े लोगों के सामने इस प्रकार दृढ़ता के साथ बात कर सकता हो।

    इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वर किसी को भी तब तक कोई अनुकंपा नहीं देता जब तक उसमें उसकी प्राप्ति की क्षमता नहीं होती।

    लोगों को उपदेश देने और उनके मार्गदर्शन का काम अपने निकटवर्ती लोगों और परिजनों से आरंभ करना चाहिए।

    सबसे बड़ा पाप अनेकेश्वरवाद है और धर्म का प्रचार करने वालों को हर बात से पूर्व इस समस्या पर ध्यान देना चाहिए।

    आइये अब सूरए अम्बिया की 53वीं और 54वीं आयतों की तिलावत सुनें।

     قَالُوا وَجَدْنَا آَبَاءَنَا لَهَا عَابِدِينَ (53) قَالَ لَقَدْ كُنْتُمْ أَنْتُمْ وَآَبَاؤُكُمْ فِي ضَلَالٍ مُبِينٍ (54)

    (अनेकेश्वरवादियों ने उत्तर में) कहाः हमने अपने बाप-दादा को इन्हीं की उपासना करते पाया है। (21:53) (हज़रत इब्राहीम ने) कहाः निश्चित रूप से तुम भी और तुम्हारे बाप-दादा भी खुली पथभ्रष्टता में रहे हो। (21:54)

    अनेकेश्वरवादियों से हज़रत इब्राहीम अलैहिसस्लाम के इस स्पष्ट प्रश्न के मुक़ाबले में कि तुम किस तर्क के आधार पर इन वस्तुओं की उपासना करते हो, उनके पास इसके अतिरिक्त कोई उत्तर नहीं था कि यह हमारे पूर्वजों की रीति व परंपरा रही है और हम अपने आपको इस बात की अनुमति नहीं दे सकते कि उनके मार्ग से हट जाएं। जबकि इस बात का कोई तर्क नहीं है कि पूर्वजों से ग़लती नहीं हो सकती या यह कि वे आने वाली पीढ़ियों से अधिक बुद्धिमान एवं जानकार रहे हों बल्कि वैज्ञानिक मामलों में प्रायः इसके विपरीत ही होता है और आज की पीढ़ी पिछली पीढ़ियों की तुलना में अधिक जानकार है।

    यही कारण है कि हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने उनके तर्कहीन उत्तर पर प्रतिक्रिया जताते हुए कहा कि यदि तुम्हारा तर्क अपने पूर्वजों की परंपरा का पालन है तो इस ग़लती में तुम सब भागीदार हो।

    इन आयतों से हमने सीखा कि पूर्वजों के अनुचित व्यवहार का प्रभाव बच्चों के प्रशिक्षण पर पड़ता है और इससे आगामी पीढ़ियों की पथभ्रष्टता का मार्ग प्रशस्त होता है।

    जाति व क़बायली परंपराओं और संस्कारों के नाम पर पूर्वजों के कार्यों का अंधा अनुसरण और इसी प्रकार उनके ग़लत कर्मों पर बिना किसी तर्क के आग्रह एक अनुचित व तर्कहीन कार्य है।

    आस्था के मामले में ठोस तर्क आवश्यक है और पूर्वजों की परंपरा, स्वीकार्य तर्क नहीं हो सकती।

    आइये अब सूरए अम्बिया की 55वीं और 56वीं आयतों की तिलावत सुनें।

     قَالُوا أَجِئْتَنَا بِالْحَقِّ أَمْ أَنْتَ مِنَ اللَّاعِبِينَ (55) قَالَ بَل رَبُّكُمْ رَبُّ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ الَّذِي فَطَرَهُنَّ وَأَنَا عَلَى ذَلِكُمْ مِنَ الشَّاهِدِينَ (56)

    अनेकेश्वरवादियों ने कहाः क्या तुम हमारे पास सत्य (व गंभीर बात) लेकर आए हो या यूँ ही खेल कर रहे हो? (21:55) उन्होंनेकहाः नहीं बल्कि बात यह है कि तुम्हारा पालनहार आकाशों और धरती का पालनहार है जिसने उनकी रचना की है और मैं इस पर तुम्हारे सामने गवाही देने वालों में से हूँ। (21:56)

    मूर्तिपूजा के विरुद्ध हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की ठोस बातों के कारण कुछ अनेकेश्वरवादियों ने उनसे यह पूछा कि वे मज़ाक़ में उनके पूर्वजों को पथभ्रष्ठ कह रहे हैं या वस्तुतः उनका यही विचार है? क्योंकि उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था कि किसी में इतना साहस हो सकता है कि वह उनके पूर्वजों की आस्था के विपरीत बात करे किंतु हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने खुल कर अपनी आस्था की घोषणा की कि मेरी दृष्टि में तुम्हारा और संसार का पालनहार अनन्य ईश्वर ही है और सृष्टि में इन मूर्तियों की कोई भूमिका नहीं है।

    इन आयतों से हमने सीखा कि वैचारिक पथभ्रष्टता के बारे में खुल कर और ठोस ढंग से बात करनी चाहिए कि शायद इस प्रकार पथभ्रष्ट लोग निश्चेतना की नींद से जाग जाएं।

    जिसने इस संसार और मनुष्य की रचना की है, उसी के हाथ में सृष्टि का संचालन भी है। ऐसा नहीं है कि सृष्टि की रचना तो उसने की है किंतु उसका संचालन दूसरों के हाथ में दे दिया है।