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    सूरए अम्बिया, आयतें 62-67, (कार्यक्रम 581)

    सूरए अम्बिया, आयतें 62-67, (कार्यक्रम 581)
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    आइये पहले सूरए अम्बिया की 62वीं और 63वीं आयतों की तिलावत सुनें।

     قَالُوا أَأَنْتَ فَعَلْتَ هَذَا بِآَلِهَتِنَا يَا إِبْرَاهِيمُ (62) قَالَ بَلْ فَعَلَهُ كَبِيرُهُمْ هَذَا فَاسْأَلُوهُمْ إِنْ كَانُوا يَنْطِقُونَ (63)

    उन्होंने कहाः(हे इब्राहीम!) क्या तुमने हमारे पूज्यों के साथ यह काम किया है?(21:62) उन्होंने कहाः बल्कि उनके इस बड़े (अर्थात सबसे बड़ी मूर्ति) ने यह काम किया होगा, तो उन्हीं से पूछ लो, यदि वे बोल सकती हों। (21:63)

    इससे पहले हमने बताया कि जब हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की जाति के लोग ईद मनाने के लिए नगर से बाहर गए तो उन्होंने उपासना स्थल में जाकर कुल्हाड़ी से सभी मूर्तियों को तोड़ दिया और सबसे बड़ी मूर्ति को छोड़ दिया तथा उसके कंधे पर कुल्हाड़ी रख कर वहां से चले गए। जब लोग वापस आए और उन्होंने यह स्थिति देखी तो हज़रत इब्राहीम को बुलाया गया ताकि उन पर मुक़द्दमा चलाया जाए। आजके कार्यक्रम में आप इस संबंध में हज़रत इब्राहीम और अनेकेश्वरवादियों के बीच होने वाली बात-चीत सुनेंगे।

    हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने लोगों को उनकी आस्थाओं पर पुनर्विचार करने पर बाध्य करने हेतु सबसे बड़ी मूर्ति के सुरक्षित रह जाने को लक्ष्य बनाया और कहा कि तुम लोग किसी अन्य अभियुक्त की खोज में क्यों हो। निश्चित रूप से इस मूर्ति ने ही यह काम किया है ताकि अपने प्रतिद्वंद्वियों को मैदान से हटा दे और स्वयं सभी लोगों की उपासना का पात्र बन जाए। यदि तुम्हें मेरी बात पर विश्वास नहीं है तो इन टूटी हुई मूर्तियों से पूछ लो और देखो कि वे तुम्हें क्या उत्तर देती हैं।

    इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वरीय पैग़म्बर, लोगों को जागृत करने के लिए केवल बात नहीं करते थे बल्कि कई अवसरों पर वे बड़े बड़े क़दम उठाया करते थे।

    धार्मिक शिक्षाओं को लोगों तक पहुंचाने के लिए नाटक, प्रदर्शनी और इसी प्रकार के अन्य काम सराहनीय हैं। हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम द्वारा बड़ी मूर्ति पर आरोप लगाना झूठ नहीं था बल्कि वे निश्चेत हृदयों को जगाने के लिए एक प्रकार से नाटक कर रहे थे।

    आइये अब सूरए अम्बिया की 64वीं और 65वीं आयतों की तिलावत सुनें।

     فَرَجَعُوا إِلَى أَنْفُسِهِمْ فَقَالُوا إِنَّكُمْ أَنْتُمُ الظَّالِمُونَ (64) ثُمَّ نُكِسُوا عَلَى رُءُوسِهِمْ لَقَدْ عَلِمْتَ مَا هَؤُلَاءِ يَنْطِقُونَ (65)

    तब वे सच्चाई को समझ गए और उन्होंने कहाः वास्तव में अत्याचारी तो तुम्हीं लोग हो। (21:64) फिर उन्होंने सिर झुका दिया (और हज़रत इब्राहीम से कहने लगे) निश्चय ही तुम्हें तो ज्ञात है कि ये (मूर्तियां) बोलती नहीं। (21:65)

    हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम द्वारा अपनाई गई युक्ति सफल रही और लोगों की अंतरात्मा जागृत हो गई। वे समझ गए कि इब्राहीम ने मूर्तियों को तोड़ कर उन पर अत्याचार नहीं किया है बल्कि वे स्वयं अत्याचारी थे जो निर्जीव मूर्तियों को ईश्वर समझ कर उनकी उपासना कर रहे थे।

    किंतु उनकी यह स्थिति जारी नहीं रही और वे अपने पूर्वजों की आस्थाओं और अपनी परंपराओं का बचाव करने के लिए हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम से बहस करने लगे। उन्होंने कहा कि तुम किस प्रकार अभियुक्त की पहचान हेतु हमें मूर्तियों से पूछने के लिए कह रहे हो जबकि तुम भली भांति जानते हो कि वे बोल नहीं सकतीं? क्या तुम हमारा परिहास कर रहे हो?

    इन आयतों से हमने सीखा कि सोई हुई अंतरात्माओं को जगाना और उन्हें पवित्र ईश्वरीय प्रवृत्ति की ओर उन्मुख करना, पैग़म्बरों के सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्यों में से है।

    लोगों के मार्गदर्शन के लिए परोक्ष शैलियों से लाभ उठाना और उनके अनुचित व्यवहार व कर्म के बारे में प्रश्न करना, पैग़म्बरों की प्रशिक्षणिक शैलियों में से है।

    हठधर्म और सांप्रदायिकता, सच्चाई को समझने के बावजूद उसे स्वीकार करने में बाधा बनती है।

    आइये अब सूरए अम्बिया की 66वीं और 67वीं आयतों की तिलावत सुनें।

     قَالَ أَفَتَعْبُدُونَ مِنْ دُونِ اللَّهِ مَا لَا يَنْفَعُكُمْ شَيْئًا وَلَا يَضُرُّكُمْ (66) أُفٍّ لَكُمْ وَلِمَا تَعْبُدُونَ مِنْ دُونِ اللَّهِ أَفَلَا تَعْقِلُونَ (67)

    इब्राहीम ने कहाः तो क्या तुम ईश्वर को छोड़ कर ऐसी वस्तुओं की उपासना करते हो जो न तुम्हें कुछ लाभ पहुँचा सकती हैं और न तुम्हें कोई हानि पहुँचा सकती है। (21:66) धिक्कार है तुम पर भी और उन पर भी जिनकी तुम ईश्वर को छोड़ कर उपासना करते हो! तो क्या तुम बुद्धि से काम नहीं लेते? (21:67)

    जब हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम यह समझ गए कि लोग सच्चाई से अवगत हो गए हैं किंतु फिर भी अपने और अपने पूर्वजों के ग़लत कार्यों और आस्थाओं को छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं तो उन्होंने आरंभ में बौद्धिक तर्कों का सहारा लेते हुए कहा कि तुम किस तर्क से मूर्तियों की उपासना करते हो जबकि तुम्हारे जीवन में उनकी कोई भूमिका नहीं है, न तो वे तुम्हें कोई लाभ पहुंचा सकती हैं और न ही कोई हानि, इसी प्रकार वे तुम पर आने वाले किसी ख़तरे को टालने की भी क्षमता नहीं रखतीं?

    इसके बाद उन्होंने स्पष्ट रूप से उनके कार्यों से अपनी विरक्तता की घोषणा की ताकि वे जान लें कि इब्राहीम अपनी आस्था पर अडिग हैं और कभी भी अनेकेश्वरवाद से संघर्ष करना नहीं छोड़ेंगे। हज़रत इब्राहीम को न केवल यह कि अपने कार्य पर कोई पछतावा नहीं था क्योंकि वे अपने मार्ग के सच्चे होने पर भी बल देते थे। वे लोगों से कहते थे कि हठधर्म और अंधे अनुसरण के स्थान पर सोच विचार से काम क्यों नहीं लेते और अपने पूर्वजों का अनुसरण करने के बजाए अपनी बुद्धि का प्रयोग क्यों नहीं करते?

    इन आयतों से हमने सीखा कि भौतिक वस्तुओं की उपासना, लाभ की प्राप्ति या फिर घाटे व ख़तरे से बचने के लिए की जाती है और इस कार्य की क्षमता सृष्टि के रचयिता के अतिरिक्त किसी अन्य में नहीं है।

    भावनाओं से लाभ उठाना और बुरे कर्मों पर क्रोध प्रकट करना एक अच्छा कार्य है।

    जो लोग द्वेष और हठधर्म के कारण सत्य को स्वीकार नहीं करते वे दंड का पात्र बनने के योग्य होते हैं।